ट्रंप की सद्बुद्धि के लिए 'वीज़ा मंदिर' में यज्ञ

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- Author, इमरान क़ुरैशी
- पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
पिछले हफ़्ते अमरीका में इंजीनियर श्रीनिवास कुचीवोतला की हत्या होने के बाद आईटी हब हैदराबाद में आईटी पेशेवर और छात्र समुदाय के बीच चिंता और आशंका का माहौल है.
मंगलवार को श्रीनिवास के अंतिम संस्कार के दौरान एक अजीब बात देखने को मिली.
उनकी अंतिम यात्रा में शामिल लोग अपने हाथों में तख्तियां थामे खड़े थे. इन तख्तियों पर लिखा था, 'नस्लवाद मुर्दाबाद', 'ट्रंप मुर्दाबाद', 'हम घृणा जनित अपराध की निंदा करते हैं', और 'श्रीनिवास को श्रद्धांजलि'.

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इन तख्तियों को थामे हुए लोग सिर्फ़ युवा तबके के आईटी पेशेवर ही नहीं थे बल्कि अधेड़ उम्र के लोग भी इसमें शामिल थे जो आईटी पेशेवर नहीं थे.
यह इस बात को दिखाता है कि सिर्फ़ आईटी पेशेवर ही इस घटना से प्रभावित नहीं हुए हैं बल्कि वे परिवार भी प्रभावित हुए हैं जो अपने बच्चों को विदेश भेजने की योजना बना रहे हैं या फिर जिनके बच्चे विदेशों में पहले से मौजूद हैं.
जो लोग अमरीका जाने का ख़्वाब देखते हुए बड़े हुए हैं उनकी मन:स्थिति का अंदाज़ा चिलकूर के बालाजी मंदिर में साफ़ तौर पर लग जाता है.
यह मंदिर हैदराबाद के बाहरी इलाके में मौजूद है. इसे 'वीज़ा' मंदिर के तौर पर भी जाना जाता है क्योंकि वो हर शख़्स जो अमरीका जाने का सपना देखता है वो अपना पासपोर्ट लेकर इस मंदिर में आता है.
यह मंदिर इसलिए मशहूर हुआ है क्योंकि मान्यता है कि यहां आने वाले सभी लोग फिर चाहे वो छात्र, आईटी पेशेवर, नर्स, शिक्षक या फिर कोई दूसरे लोग हों, उन सभी को वीज़ा मिल जाता है.

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पिछले दो महीनों में यहां आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या में कोई गिरावट नहीं देखी गई है. हैदराबाद और चेन्नई जैसे शहरों में मौजूद अमरीकी सेंटर के बाहर लगने वाली भीड़ का भी यही हाल है.
चिंतित मां-बाप
ये दोनों ही शहर भारत में सबसे ज्यादा वीज़ा पाने वाले शहर हैं.
इस मंदिर में आने वाले श्रद्धालु परंपरागत तौर पर मंदिर में 11 फेरे लेते हैं.

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इस मंदिर के मुख्य पुजारी सीएस रंगराजन ने बीबीसी से कहा, "श्रद्धालुओं की तदाद में गिरावट नहीं आई है, लेकिन हुआ यह है कि उनके फेरों की संख्या बढ़ गई है. उनकी सुरक्षा के लिए हमने भी प्रार्थनाएं करनी शुरू कर दी हैं. हमने डोनल्ड ट्रंप की सोच बचलने के लिए भी पूजा-पाठ करना शुरू कर दिया है. हमारे बच्चे कुशल कामगार हैं. वे अमरीका पर बोझ नहीं हैं."
ना ही कोई आईटी पेशेवर और ना ही उनके मां-बाप इस मुद्दे पर डर के कारण बात करने को तैयार हैं.
लेकिन इनमें से एक आईटी पेशेवर के पिता ने नाम नहीं ज़ाहिर करने की शर्त पर कहा, "मेरी बेटी को वीजा मिल गया है, लेकिन हम निश्चित तौर पर चिंतित हैं. हम तय नहीं कर पा रहे हैं कि उसे जाने दें या नहीं. अगर वो जाने से इंकार करती है तो फिर दूसरी कंपनियां यहां उन्हें नौकरी नहीं देंगी जैसे सवाल से भी हम पेरेशान हैं."
हैदराबाद में आईटी पेशेवरों के एक फ़ोरम के मुखिया किरण चंद्र श्रीनिवास की मां के हवाले से कहते हैं, "वो नहीं चाहती हैं कि उनका दूसरा बेटा वापस अमरीका जाए. वो डरी हुई हैं. लेकिन सिर्फ़ श्रीनिवास की मां अकेली नहीं हैं जो उनकी मौत से प्रभावित हुई हैं. आईटी पेशेवरों का पूरा समुदाय सदमे में है. इसमें अमरीका जाने का सपना देख कर बड़े हुए छात्र और पेशेवर दोनों ही शामिल हैं."

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किरण चंद्र को इस बात में कोई संदेह नहीं है कि, "यह सब इसलिए हो रहा है क्योंकि डोनल्ड ट्रंप ग़ैर-अमरीकियों के ख़िलाफ़ नफ़रत फैलाने की ख़ुद अगुवाई कर रहे हैं. और इसकी शुरुआत तब से हुई जब ओबामा प्रशासन में अमरीकियों की नौकरी के लिए एक राजनीतिक पहल शुरू हुई."
यह एक राजनीतिक प्रोजेक्ट था जिसका मकसद था अमरीकियों के लिए नई नौकरियां पक्का करना.
किरण चंद्र कहते हैं, "भारत की आईटी कंपनियां अपने बहुत सारे कर्मचारियों को अमरीका भेजती हैं. सबसे अहम यह है कि भारतीय छात्र करीब ढाई खरब अमरीकी डॉलर वहां के विश्वविद्यालयों को सलाना देते हैं. अमरीकी कंपनियां भारत में आकर अपनी दुकाने खोलती हैं और अपने देश में मुनाफा ले जाती है. तो फिर भारतीय आईटी पेशेवर अमरीका में क्यों नहीं ख़ुद को साबित कर सकते हैं."
नई वीज़ा नीति का सवाल
लेकिन आईटी कंपनी हेडहंटर के सीईओ कृष लक्ष्मीकांत का कुछ अलग ही मानना है.

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वो कहते हैं, "वाकई में अमरीका जाने वाले भारतीय आईटी पेशेवरों की संख्या में नई एच1बी नीति की वजह से गिरावट आने वाली है. ज्यादातर आईटी कंपनियां अपने कर्मचारियों के लिए यह वीजा नहीं लेना चाहेंगी क्योंकि इस वीजा का शुल्क 65 हज़ार अमरीकी डॉलर से बढ़कर एक लाख बीस हज़ार अमरीकी डॉलर लगभग दोगुनी हो चुकी है. "
लक्ष्मीकांत इस बात पर सहमत है कि लोग नौकरियों को लेकर चिंतित है. मई के महीने में जब एच1बी वीज़ा लागू हो जाएगा तब इसे लेकर सही आंकड़े सामने आएंगे.
डर का माहौल
लेकिन अमरीका जाने के बारे में सोचने वाले छात्र क्या सोचते हैं?

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बाहर के देशों में पढ़ाई करने को लेकर सलाह देने वाली कंस्लटिंग कंपनी द चोपड़ा के बिंदू चोपड़ा का कहना है, "राष्ट्रपति डोनल्ट ट्रंप की नई नीति के आने के बाद थोड़ा डर का माहौल है. आम तौर पर बाहर जाने वाले छात्र आवेदन देने के बाद जवाब आने का इंतज़ार करते हैं. लेकिन अब वो एक विकल्प लेकर चल रहे हैं. वे कनाडा और ऑस्ट्रेलिया के विश्वविद्यालयों में भी आवेदन दे रहे हैं."
चोपड़ा यह भी मानते हैं कि बच्चों के साथ-साथ उनके मां-बाप भी अपने बच्चों को लेकर आशंकित हैं.
सीएस रंगराजन कहते हैं, "लोगों का पक्के तौर पर मानना है कि श्रीनिवास की बेवजह हुई हत्या राजनीतिक माहौल की वजह से हुई है. अमरीका में अवैध तरीके से रह रहे लोगों के ख़िलाफ़ डोनल्ड ट्रंप की कानूनी कार्रवाई की बात अपनी जगह ठीक है. लेकिन कृपया किसी ख़ास देश के आदमी को ख़तरनाक तो मत कहिए."
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