आशिक-माशूक की मज़ार, जहां दुआ मांगते हैं प्रेमी जोड़े

वाराणसी में आशिक-माशूक की मज़ार पर सजदा करते युवा.

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    • Author, रोशन जायसवाल
    • पदनाम, वाराणसी से,बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए

कहते हैं दो दिल मिल जाएं तो फिर मोहब्बत कहां? शायद इसीलिए दुनिया की सभी लोकप्रिय प्रेम-कथाओं का अंजाम जुदाई ही रहा है.

इन्ही में से एक प्रेमकथा वाराणसी के आशिक-माशूक की भी है.

शहर के औरंगाबाद इलाक़े में आशिक-माशूक की मज़ार उन्हीं दो प्रेमियों की मिसाल है, जो ज़िंदा रहते तो नहीं मिल सके, लेकिन मौत ने उनको मिला दिया. अब ये जगह प्यार करने वालों के लिए किसी धार्मिक स्थल से कम नहीं है.

यूं तो गाहे-बगाहे आशिक-माशूक की मज़ार पर छुप-छुपाकर या खुले में प्यार के परिंदे उड़ते हुए आ जाते हैं. लेकिन वेलेंटाइन डे पर यहां आने वालों की संख्या कुछ बढ़ जाती है.

अनुराधा ने बीबीसी हिंदी से कहा, "मंदिर-मस्जिद में तो लोग दुआएं मांगने जाते हैं, लेकिन आशिक-माशूक की मज़ार ऐसी जगह है, जो प्यार करने वालों के लिए बनाई गई है. यहां लोग अपने प्यार की हिफ़ाज़त की दुआ मांगने आते हैं. यही देखने-जानने मैं भी यहां आई हूं."

परी.

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इस मज़ार पर पहुंची परी ने बताया, " जो मिल नहीं पाते वे यहां आते हैं. मैं भी जिसे चाहती हूं उसे पाने की दुआ करने यहां आई हूं."

राहुल.

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इस मज़ार पर सजदा करने आए राहुल कहते हैं, " ये उन मोहब्बत करने वालों की मज़ार है जो मिल तो नहीं सके लेकिन अपनी जान देकर अमर हो गए. वेलेंटाइन डे पर बाकी जगहों पर भीड़ और शोर रहता है. लेकिन यहां आने से शांति मिलती है. प्यार और बेहतर होता है.''

मजार की देखभाल करने वाली कमेटी के प्रमुख शिराज अहमद.

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मज़ार की देखभाल करने वाली कमेटी के प्रमुख शिराज़ अहमद ने बताया, " ये उस प्रेमी-प्रेमिका की मज़ार है, जो मिल नहीं पाए तो गंगा में डूबकर जान दे दी. जब उनकी लाश निकाली गई तो वो एक-दूसरे के साथ थे. इसके बाद उन दोनों की क़ब्र यहां एक साथ बनाई गई.''

वेलेंनटाइन डे और बृहस्पतिवार को यहां ज़्यादा लोग आते हैं. शादी-ब्याह और औलाद जैसी मुरादें पूरी होने पर लोग यहां चादर और फूल चढाते हैं."

वाराणसी में आशिक-माशूक की मज़ार.

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शहर-ए-मुफ़्ती मौलाना अब्दुल बातिन नोमानी ने बनारस की धरोहरों पर 'तारीख़ असारे-बनारस' नाम से किताब लिखी है. साल 2015 में इस किताब का पांचवां और संशोधित संस्करण प्रकाशित हुआ.

अब्दुल बातिन नोमानी

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इस किताब में आशिक और माशूक की मोहब्बत और मज़ार का भी ज़िक्र है.

उन्होंने बताया कि ये क़रीब 400 साल से भी पुरानी घटना है. उस समय बनारस के एक व्यापारी अब्दुल समद किसी काम के सिलसिले में कुछ दिनों के लिए शहर के बाहर गए. इस दौरान उनके नौजवान लड़के मोहम्मद यूसुफ़ को एक लड़की से मोहब्बत हो गई.

मजार पर दी गई एक अर्जी.

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लड़की के परिवारवालों को जब पता चला तो उन्होंने लड़की को अपने एक रिश्तेदार के यहां भेज दिया. लेकिन यूसुफ़ भी नाव पर सवार होकर पीछे हो लिया.

वाराणसी में आशिक-माशूक की मज़ार.

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लड़की के साथ दूसरे नाव पर बैठी बूढ़ी औरत ने लड़की की जूती को पानी में फेंक दिया और यूसुफ़ से कहा कि अगर तुम्हारी मोहब्बत सच्ची है तो जूती लेकर आओ. ये सुनते ही यूसुफ़ नदी में कूद गया, लेकिन वापस नहीं आया. कुछ दिनों बाद वापस घर जाते वक्त ठीक उसी जगह पर लड़की ने भी कूदकर अपनी जान दे दी. दोनों की लाश एक साथ नदी में मिली.

प्रेमी-प्रेमिका ने मरने के बाद भी एक-दूसरे का हाथ थाम रखा था. दोनों को शहर के औरंगाबाद इलाक़े में दफ़न किया गया. इसे ही अब आशिक-माशूक का मकबरा कहा जाता है.

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