लैला की सनी लियोनी आइटम गर्ल क्यों

- Author, स्वर्णकांता
- पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
भारत में स्त्रियों की यौन अभिव्यक्ति की बात पर आमतौर पर चुप्पी दिखाई देती है. लेकिन ये चुप्पी अब टूट रही है.
ताज़ा मिसाल है शाहरुख खान की फ़िल्म रईस. यह रिलीज़ हो चुकी है. इसका आइटम नंबर 'लैला मैं लैला' कई हफ्ते पहले रिलीज़ हो चुका है.
अभिनेत्री सनी लियोनी पर फ़िल्माए गए 'लैला मैं लैला' को यूट्यूब पर अब तक 8 करोड़ से भी अधिक लोग देख चुके हैं.
'लैला मैं लैला' हो या चिकनी चमेली, शीला की जवानी जैसे गाने.
ये कोई नई बात नहीं कि बेहद हिट होने के बावजदू इन गानों पर आरोप लगते रहे हैं कि ये महिलाओं को ऑब्जेक्ट या उपभोग की वस्तु की तरह दिखाते हैं.
बहस इस बात पर गर्म है कि ऐसे गीत औरतों को औब्जेक्टिफाई करते हैं, या उन्हें अपने शरीर के साथ सहज होना सिखाते हैं.
अभिनेत्री सनी लियोनी कहती हैं कि ऑब्जेक्टिफिकेशन शब्द से उन्हें कोई परेशानी नहीं हैं. उनका मानना है कि इस तरह की यौन अभिव्यक्ति किसी तरह से ग़लत नहीं है.

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तो वहीं मीना पांडेय को ऐसे आइटम सॉन्ग से शिकायत है. वे एक घरेलू महिला हैं. वे कहती हैं कि 'लैला मैं लैला' जैसे आइटम सॉन्ग वे बच्चों के साथ, या पूरे परिवार के साथ बैठकर नहीं देख सकती.
दूसरी ओर नई पीढ़ी की लड़कियां यौन अभिव्यक्ति या ऑब्जेक्टिफिकेशन को ग़लत नहीं मानतीं.
रईस का 'लैला मैं लैला' गाने वाली नौजवान गायिका पावनी पांडेय भी यही मानती हैं. पावनी कहती हैं, "पहले भी आइटम नंबर, जैसे पिया तू अब तो आजा, होते रहे हैं. वे कहानी का हिस्सा होते हैं. सनी ने इस गाने को बहुत अच्छे से पोट्रे किया है. इसमें वे कहीं से अश्लील नहीं लगी हैं."

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महिलावादी मुद्दों को अपने लेखन में उठाने वाली जानी मानी लेखिका मैत्रेयी पुष्पा को 'लैला मैं लैला' पर ज़रा आपत्ति है. उन्हें इस तरह के आइटम नंबर में जिस तरह से शरीर की मुद्राएं दिखाई जाती हैं, वो पसंद नहीं.
मैत्रेयी पुष्पा कहती हैं, "ऐसे गानों से युवा पीढ़ी बहुत उत्तेजित हो जाती है. वो विवेक भूल जाती है. जिस तरह का माहौल चल रहा है, हमें सोचना होगा कि लड़कियों के साथ रेप या छेड़छाड़ की घटनाएं आज इतनी क्यों बढ़ गई हैं."
उनका मानना है कि "अगर सनी लियोनी को इस तरह के नृत्य करने से ख़ुशी मिलती है तो वे करें. वो किसी का क़त्ल नहीं कर रहीं. लेकिन हमें यह भी देखना होगा कि हम जो कर रहे हैं उसका मक़सद क्या है. आपको कोई हक़ नहीं कि आप पूरे समाज को प्रभावित करें."
सोशल मीडिया पर नई तरह की औरतों पर लिखने वाली वत्सला श्रीवास्तव मानती हैं, "अगर हमारी देह खूबसूरत है तो उसे कहने के लिए हम कौन सा शब्द चुनेंगे ये मायने रखता है. औरत की देह को मशहूर पेंटर मकबूल फिदा हुसैन ने भी पेश किया. पर बहुत खुबसूरती और सेन्सुअस तरीके से. "
वत्सला का कहना है कि "गुलजार ने 'मैं चांद निगल गई दैया रे' गीत लिखा, इसमें कोई हल्कापन या अश्लीलता नहीं है. ऐसे गानों को देखकर लगता है कि बॉलीवुड के पास शब्दों की कमी है."

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स्त्री की यौन अभिव्यक्ति को लेकर इसी तरह के बंधे बंधाए खांचे को तोड़ रही हैं गंभीर महिलावादी और प्रोफेसर नीलिमा चौहान.
नीलिमा चौहन की हाल ही में 'पतनशील पत्नियों के नोट्स' किताब आई है. इसमें पत्नियों की आदर्श छवि को ख़ारिज किया गया है.
सोशल मीडिया पर बेहद सक्रिय नीलिमा चौहान कहती हैं, "हम सच्चे फेमिस्ट नज़रिए से देखना चाहें तो यह जान पाना बहुत मुश्किल नहीं कि ऐसा क्यों हो रहा है. दरअसल मीडिया और बाज़ार स्त्री और पुरुष दोनों को ऑब्जेक्टिफाई करता है."
वहीं बॉलीवुड अदाकारा स्वरा भास्कर कहती हैं कि अगर ऑब्जेक्टिफिकेशन की बात करें तो पूरी की पूरी फिल्म इंडस्ट्री ही इसकी शिकार है.
स्वरा कहती हैं, "फिल्म ग्लैमर से जुड़ी इंडस्ट्री है. यहां ऑब्जेक्टिफाई होने से हीरो भी नहीं बचते. बेशक औरतें ज्यादा ऑब्जेक्टिफाई हो रही हैं. यहां औरतों के अनुभव और मर्दों के अनुभव में कोई समानता नहीं है."
उनका कहना है, "सनी की बात से सहमत हूं कि ये औरत का हक़ है. हमें भी आइटम नंबर करने में मज़ा आता है. आदमियों को शराब पीकर नाचने में जितना मज़ा आता है उतना ही मज़ा औरतों को भी शराब पीकर नाचने में आता है. कुल मिलाकर पार्टियों में हम एक ही गाने पर तो नाच रहे होते हैं. लेकिन ये ज़रूर कहना चाहूंगी कि कमर्शियल फ़िल्मों में आइटम नंबर करने वाली एक्ट्रेस शरीर का बस एक टुकड़ा है."

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उनके मुताबिक, "इस तरह की यौन अभिव्यक्ति पर माहौल ख़राब करने का जो आरोप लगाया जाता है वो ग़लत है. ये तो वही हुआ कि आपको अपराध रोकना है तो विक्टिम पर ही तमाम तरह की बंदिशें लगा दें."
सिनेमा पर लिखने वाले दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रोफेसर मिहिर पांड्या कहते हैं, "पहले आइटम सॉन्ग का आइकन हेलेन थीं. तब हीरोइन कोई और होती थी, आइटम गर्ल कोई और. माना जाता था कि हीरोइन अच्छी स्त्री है इसलिए वो आइटम नंबर नहीं करेगी. लड़की को सेक्शुएलिटी एक्सप्रेस करते हुए नहीं दिखाते थे."
मिहिर के मुताबिक़, "आज की फिल्में बदली हैं. अब वो विभाजन रेखा धुंधली हो गई है. आज सिनेमा उस स्टेज पर पहुंच गया है कि अब जो लड़की आइटम नंबर में खुद को सेक्शुअली एक्सप्रेस कर रही है वो आपकी फ़िल्म की, हीरो की, हीरोइन भी हो सकती है."
दरअसल हमारा समाज स्त्री की यौनिकता से डरता रहा है. तभी तो वह इसकी कड़ी पहरेदारी करता है. यही वजह है कि लड़कियां खुद अपनी इस इच्छा को लेकर अपराधबोध में रहती हैं. उसे दबाती हैं, नकारती हैं. और खुलकर अभिव्यक्त नहीं करती.
तो क्या स्त्रियां यौन अभिव्यक्ति (चाहे फ़िल्मी गानों में ही सही) के मामले में मुखर हो रही हैं. क्या इसे लेकर समाज में मौजूद वर्जनाएं टूट रही हैं?
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