जल्लीकट्टू नहीं तो सांड की नस्लों पर खतरा

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- Author, स्वामीनाथन नटराजन
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
जल्लीकट्टू का समर्थन करने वालों के अनुसार तमिलनाडु में बुल फाइटिंग यानी सांडों की लड़ाई के खेल को ज़िंदा रखना ज़रूरी है. उनका तर्क है कि इससे स्थानीय मवेशियों की प्रजातियों को बचाया जा सकता है.
स्पेन की बुल फाइट से अलग जल्लीकट्टू हज़ारों साल से खेला जाने वाला खेल है. इसमें सांड को मारा नहीं जाता. सारा खेल तीखे सींग वाले सांड पर बांधे गए सोने या पैसे को खोलने का होता है.
लेकिन जानवरों के अधिकारों के लिए काम कर रहे कार्यकर्ताओं की गुज़ारिश पर साल 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने इस खेल पर रोक लगा दी. कार्यकर्ताओं ने इस खेल को पशुओं पर अत्याचार बताया था.
खेल पर लगे प्रतिबंध के विरोध में चेन्नई के मरीना बीच समेत कई इलाकों में प्रदर्शन हो रहे हैं. इस विरोध के बीच तमिलनाडु के मुख्यमंत्री ओ पनीरसेल्वम ने गुरुवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की.
पीएम नरेंद्र मोदी ने उनसे कहा है कि ये मामला न्यायालय के अधीन है, हालांकि वो समझते हैं कि जल्लीकट्टू तमिलनाडु की परंपरा का अभिन्न अंग रहा है.

स्थानीय नस्लों का बचाव
जल्लीकट्टू में सिर्फ़ सांड की स्थानीय नस्लों का ही इस्तेमाल किया जाता है.
इस खेल का समर्थन करने वाले बालकुमारन सोमू कहते हैं, "तमिलनाडु में छह स्थानीय नस्लें थीं. उनमें से एक नस्ल अलामबदी को तो आधिकारिक तौर पर विलुप्त घोषित कर दिया गया है. ये बैन लगा रहा तो बची नस्लें भी ख़त्म हो जाएंगी."

'सांड पालतू जानवर नहीं है'
सांडों को पालने वालों का कहना है कि जल्लीकट्टू और बैलगाड़ी की दौड़ के कारण इलाके में स्थानीय नस्लों में मादा और नर मवेशियों का अनुपात बना रहा है.
कार्तिकेयन शिव सेनापति कहते हैं, "जल्लीकट्टू ने लोगों को उत्साहित किया है कि वो अपने बैलों, सांड़ों को पालें. चूंकि ये परिवार और समुदाय की इज़्ज़त की बात है, किसान उनका अच्छा ख़्याल रखते हैं. ये बैन लागू रहा तो लोगों में सांडों को रखने का उत्साह नहीं बचेगा."
सेनापति कंगायम नस्ल के सांड पालने वाले कुछ लोगों में से एक हैं.
वो बताते हैं कि साल 1990 में हमारे यहां क़रीब दस लाख कंगायम नस्ल के सांड थे, अब यहां इस नस्ल के केवल 15,000 सांड ही बचे हैं.

सांडों की ज़रूरत किसे?
तमिलनाडु देश का सबसे शहरीकृत राज्य है. खेती में आधुनिक मशीनों का उपयोग होता है और सांड को रखने की आर्थिक वजहें कम ही हैं.
दूध के लिए मवेशियां पालने वाले भी अभी उन्नत किस्म के मवेशियों का रुख़ कर रहे हैं. ऐसे छोटे किसान अब केवल गाय ही रखने लगे हैं और ज़रूरत पड़ने पर पैसे दे कर जल्लीकट्टू के सांडों की सेवाएं लेते हैं.
सेनापति बताते हैं, "पहले हम 4:1 के अनुपात में अपने पास गाय और सांड रखा करते थे, अब यह अनुपात 8:1 तक पहुंच गया है और यह और बढ़ेगा. किसान केवल पालने भर के लिए इस तरह के बड़े जानवर नहीं ख़रीद सकते."

जानवरों के अधिकार
कार्यकर्ताओं का कहना है कि यदि गांवों से स्थानीय नस्ल के सांडों को हटा दिया जाए तो किसान जानवरों में कृत्रिम गर्भाधान कराएंगे.
फिर बूढ़े बैलों को बेच दिया जाता है. लेकिन अब युवा सांड़ों को भी कसाइखानों को बेच दिया जाता है.
तेज़ी से बढ़ते इस आंकड़े को देखकर एक ग़ैरसरकारी पशु अधिकार संगठन ने 200 सांड ख़रीद लिए.
कोयंबटूर कैटल केयर एस निज़ामुद्दीन का कहना है, "किसी क़ानून के अंतर्गत बचाने की कोई कवायद नहीं की गई है. इसीलिए इन्हें अगर मांस के लिए बेच दिया गया तो हम इन्हें बचा नहीं सकते. एक ही रास्ता बचा है इन्हें बचाने का, वो ये कि हम इन्हें ख़रीद लें."
वो गायों में गर्भाधान में इन सांडों का इस्तेमाल करने पर विचार कर रहे हैं.

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'पता नहीं आगे क्या होगा'
तमिलनाडु जल्लीकट्टू फेडरेशन के अध्यक्ष पी राजशेकरन का कहना है, "मैंने जितने सांड ख़रीदे मुझे उनमें कोई चोट या घाव के निशान नहीं मिले. कई किसान उन्हें सिर्फ़ इसीलिए बेच रहे हैं क्योंकि उन्हें नहीं पता कि आगे क्या होगा."
वो कहते हैं, "अगर कोई सांड को मारता है, उसे चोट पहुंचाता है तो इसे पकड़ें, सज़ा दें - हमें इसमें कोई आपत्ति नहीं है. लेकिन इसके लिए पूरा बैन लगाना सही नहीं."

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सांड ना जिएं हिंसा भरा जीवन
पशु अधिकार कार्यकर्ताओं के अनुसार जल्लीकट्टू पर रोक लगाए जाने से काफी पहले आर्थिक कारणों स्थानीय नस्लों के मवेशियों की संख्या कम हुई है.
एनिमल वेलफ़ेयर बोर्ड ऑफ़ इंडिया के डॉ. एस चिन्नी कृष्णा कहते हैं, "हमारा मूल मुद्दा जानवरों की बेहतरी है, ना कि उनकी नस्ल बचाना."
वो कहते हैं कि वो सांडों को बचा रहे हैं और पशुपालन गृहों में उनका ध्यान रख रहे हैं ताकि ब्रीडिंग में उनसे मदद ले सकें.
हालांकि वो कहते हैं कि यह सही नहीं है कि एक जानवर को बस अपनी नस्ल बचाने के लिए एक हिंसा भरी ज़िंदगी जीनी पड़े.

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सांड को नहीं पहुंचती चोट
मदुरई में रहने वाले पांडियान रंजीत जल्लीकट्टू में हिस्सा लेते हैं. वो कहते हैं कि पशु अधिकार के लिए काम करने वाले कार्यकर्ता इसे बढ़ा-चढ़ा कर बता रहे हैं.
वे कहते हैं, "मैं बीते 20 सालों से सांडों के इस खेल में हिस्सा लेता हूं. मुझे कई बार चोट आई है. मैंने कई बुल फाइटरों को गंभीर रूप से घायल होते देखा, लेकिन मैंने कभी किसी सांड को कभी घायल होते नहीं देखा."
हालांकि पशु अधिकार कार्यकर्ताओं का आरोप है कि सांडों को खेल से पहले शराब पिलाई जाती है ताकि वो इधर-उधर भागें.

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घोड़ों की रेस का क्या?
जल्लीकट्टू का समर्थन करने वालों का कहना है कि घोड़ों की रेस पर क्यों कोई रोक नहीं लगाई जाती या मंदिरों में रखे जाने वाले हाथियों पर कोई कुछ क्यों नहीं करता.
तमिलनाडु में कोई राजनीतिक पार्टी इस खेल पर पूरे बैन का समर्थन नहीं करती. इस वजह से विरोध का आयोजन करने वालों को उम्मीद है कि अगले साल से पहले वो इस मामले में क़ानूनी नहीं तो कम से कम राजनीतिक हल तक पहुंच सकते हैं.
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