आशंकाओं के भंवर में घिरी है समाजवादी पार्टी

समाजवादी पार्टी

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    • Author, शरद गुप्ता
    • पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए

समाजवादी पार्टी नेता मुलायम सिंह यादव अपनी जिंदगी की सबसे बड़ी लड़ाई अपने बेटे और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के खिलाफ लड़ रहे हैं. अब उनकी उम्मीद सिर्फ चुनाव आयोग पर टिकी है जो शुक्रवार को पार्टी के चुनाव निशान साईकिल पर दोनों के दावे पर सुनवाई शुरू करेगा.

बहुत संभव है कि यह सुनवाई एक दिन में ही खत्म हो जाए और चुनाव आयोग शुक्रवार को ही अपना फैसला सुना दे. इसका दारोमदार मुलायम सिंह के रुख पर निर्भर है. अगर वो बेटे के प्रति नरम रवैया अख़्तियार करते हैं और मान लेते हैं कि अखिलेश के पास ज्यादा समर्थन है तो मामला तुरंत निपट जाएगा.

ऑडियो कैप्शन, अखिलेश यादव अब अपने पिता मुलायम सिंह से कोई समझौता नहीं करेंगे.

उनके ताजे बयानों को देखते हुए ज्यादा संभावना इसी बात की लग रही है. मुलायम लगातार कह रहे हैं कि वे पार्टी को किसी हालत में बंटने नहीं देंगे और अखिलेश ही अगले मुख्यमंत्री होंगे. इससे दोनों गुटों के बीच समझौते के आसार बढ़ गए हैं.

दरअसल दोनों के बीच विवाद के दो ही मुद्दे हैं. पहला - मुलायम की नजर में अखिलेश पर उनके चाचा रामगोपाल का ज़रूरत से ज्यादा प्रभाव होना और दूसरा - अखिलेश के अनुसार मुलायम का अमर सिंह के खिलाफ एक शब्द भी न सुनना. मुलायम को लगता है कि अखिलेश ने उनसे ज्यादा महत्व रामगोपाल को देना शुरू कर दिया है.

वीडियो कैप्शन, 'नाटक कर रही है समाजवादी पार्टी'

इसी वजह से यदि मुलायम सिंह अखिलेश यादव द्वारा चुनाव आयोग के समक्ष पेश पार्टी पदाधिकारियों और चुने हुए जनप्रतिनिधियों के समर्थन पत्र को जाली बताते हैं तो यह सुनवाई आगे भी चल सकती है.

इससे पहले मुलायम सार्वजनिक रूप से कह चुके हैं कि अखिलेश के समर्थन में जिन लोगों ने शपथपत्र दिया है, उनमें से कई इससे साफ़ इंकार कर चुके हैं कि उन्होंने ऐसा कोई शपथपत्र नहीं दिया है.

ऑडियो कैप्शन, सुनिए - मुलायम कुनबे का संघर्ष

हालांकि अखिलेश के पास लगभग 90 फीसदी विधायकों, लोकसभा सांसदों, राज्यसभा सांसदों और पार्टी पदाधिकारियों का समर्थन है. लेकिन मुलायम सिंह जल्द हार नहीं मानने के लिए जाने जाते हैं और उनके मुख्य सलाहकार अमर सिंह भी किसी भी हद तक जाने के लिए मशहूर है.

इसलिए उनके द्वारा किसी भी तरह के तर्क का सहारा लिए जाने की संभावना है. झूठे एफिडेविट के आरोप का प्रतिकार भी अखिलेश कैंप के पास तैयार है. वे उनका समर्थन कर रहे सभी जनप्रतिनिधियों और पदाधिकारियों को चुनाव आयोग के सामने पेश कर सकते हैं.

ऑडियो कैप्शन, बीबीसी इंडिया बोल में बहस इसी पर हुई

लेकिन चूँकि राज्य पहले ही चुनाव के मोड में है, अधिकतर लोग अपने अपने चुनाव क्षेत्र में व्यस्त हैं. ऐसे में सभी को चुनाव आयोग के सामने पेश करने में एक या दो दिन का समय तो चाहिए ही. वैसे भी मंगलवार से पहले चरण के नामांकन की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी. इसलिए अखिलेश के लिए सबसे कीमती चीज समय है.

इन सबके बीच तीसरी संभावना चुनाव आयोग द्वारा साइकिल निशान को फ्रीज़ कर देने की है. चूँकि इलेक्शन कमीशन के पास भी समय नहीं है. झगडा बढ़ने पर वह दोनों को ही नया चुनाव निशान चुनने को कह सकता है. ऐसे में उम्मीद यही है कि मुलायम बेटे का नुकसान करने के बजाय खुद ही हथियार डाल दें.

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मुलायम एक मंझे हुए राजनेता हैं. उन्होंने वीपी सिंह, चंद्र शेखर, राजीव गांधी और अजित सिंह जैसे धुरंधर नेताओं से लड़ाइयां जीती हैं. इससे कहीं ज्यादा विकट परिस्थितियों का सामना किया है.

पहले के मुकाबले फर्क सिर्फ इ तना है कि इस बार सामने बेटा है. इसीलिए समझौते की संभावना ज्यादा लग रही है. अमर सिंह कितने भी बड़े दोस्त हों, बेटे की जगह नहीं ले सकते.

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