इबोबी सिंहः निर्दलीय विधायक से 15 साल लगातार मुख्यमंत्री

ओकराम इबोबी सिंह, मणिपुर, विधानसभा चुनाव

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    • Author, दिलीप शर्मा
    • पदनाम, इंफाल से, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए

पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर में इस साल 4 मार्च से होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए कांग्रेस के मुख्यमंत्री पद का चेहरा फिर से ओकराम इबोबी सिंह ही हैं.

मणिपुर में कांग्रेस की चुनावी नैया को पार लगाने की जिम्मेदारी भी मुख्यमंत्री इबोबी के कंधों पर है. अगर 60 सीटों वाली विधानसभा में कांग्रेस फिर से जीत दर्ज करती है तो इबोबी लगातार चौथी बार प्रदेश के मुख्यमंत्री बनेंगे.

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मणिपुर को 1972 में राज्य का दर्जा मिला था लेकिन राजनीतिक उथल-पुथल के कारण इस छोटे से राज्य में 18 बार सरकारें बदलीं. ऐसी परिस्थितियों में केवल 20 विधायकों को साथ लेकर 2002 में इबोबी प्रदेश के मुख्यमंत्री बने और इस तरह वे पिछले 15 सालों से लगातार शासन करने वाले नेता बन गए.

पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को पूर्ण बहुमत के साथ जीत दिलाने का श्रेय इबोबी को ही दिया जाता है. पिछले चुनाव में कांग्रेस को 42 सीटें मिली थीं.

68 साल के इबोबी ने 1984 में एक निर्दलीय विधायक के रूप में अपना राजनीतिक सफर शुरू किया था. खंगाबोक विधानसभा क्षेत्र से चुनाव जीतने के कुछ समय बाद इबोबी कांग्रेस में शामिल हो गए. इस बीच उन्हें खादी और ग्रामोद्योग बोर्ड का अध्यक्ष बनाया गया.

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मणिपुर के थाउबल अथोकपाम में जन्मे इबोबी छात्र जीवन से ही कई प्रमुख सामाजिक संगठनों से जुड़े रहें हैं. थाउबल के साउथ ईस्टर्न ट्रांसपोर्ट कोआपरेटिव सोसाइटी लिमिटेड में 1981 में सचिव बनने के बाद इबोबी को एक राजनेता के रूप में पहचान मिली.

गुवाहाटी विश्वविद्यालय से बीए की पढ़ाई पूरी करने के बाद इबोबी घर का खर्च चलाने के लिए सरकारी विभागों में ठेकेदारी का काम भी किया करते थे.

साल 1990 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की सीट पर जीतकर आए इबोबी को आरके दोरेंद्रो की सरकार में पहली बार मंत्री बनने का मौका मिला. मंत्री के तौर पर उन्हें नगर निगम प्रशासन, आवास और शहरी विकास विभाग की जिम्मेवारी सौंपी गई.

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राजनीति में इबोबी को काफी भाग्यशाली कहा जाता है. अपनी विनम्रता से इबोबी ने दिल्ली में गांधी परिवार का भरोसा जीता और उसके सहारे प्रदेश की राजनीति में आगे बढ़ते चले गए.

कांग्रेस ने 1995 में इबोबी को मणिपुर प्रदेश कांग्रेस कमेटी का उपाध्यक्ष बनाया तो उन्होंने पार्टी में कई अहम जिम्मेदारियां निभाई और महज तीन साल के भीतर सभी वरिष्ठ नेताओं को पीछे छोड़ते हुए प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी हासिल कर ली.

राजनीति के जानकारों का कहना है कि यहीं से उनके मुख्यमंत्री बनने का रास्ता खुल गया. मुख्यमंत्री इबोबी सिंह बहुसंख्यक मैती समुदाय से है जो अनुसूचित जनजाति में शामिल नहीं है.

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इबोबी की पत्नी लानधोनी देवी भी मौजूदा विधानसभा में कांग्रेस की विधायक हैं. वह दो बार खंगाबोक विधानसभा क्षेत्र से चुनी जा चुकी हैं. अपनी पत्नी को विधायक बनाने के लिए इबोबी ने खंगाबोक सीट खाली कर दी थी और अब वे थाउबल सीट से चुनाव लड़ते हैं.

कांग्रेस ने इस बार इबोबी की पत्नी की जगह उनके बेटे केनेडी सिंह को खंगाबोक से टिकट दी है.

इबोबी के बारे में इम्फाल फ्री प्रेस के संपादक प्रदीप फनजौबम ने बीबीसी से कहा कि मणिपुर के लोग मुख्यमंत्री इबोबी को एक कद्दावर नेता के तौर पर देखते हैं. वह देश के अन्य बड़े नेताओं की तरह जन सभाओं और रैलियों में लंबा भाषण नहीं देते. लेकिन प्रदेश में उनकी राजनीतिक हैसियत के सामने अबतक दूसरा कोई नेता खड़ा नही हो सका है. फिर चाहे उनकी खुद की पार्टी के नेता ही क्यों न हो.

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लंबे समय से मणिपुर की राजनीति पर नजर रखते आ रहे प्रदीप का कहना है कि इबोबी के इतने लंबे समय से एक स्थिर सरकार चलाने के पीछे दलबदल विरोधी कानून भी मददगार रहा है.

प्रदीप कहते हैं, "वह उस समय प्रदेश के मुख्यमंत्री बने थे जब देश में दसवीं अनुसूची, जिसे आमतौर पर दलबदल विरोधी कानून कहा जाता है को लागू किया गया था. उससे पहले मणिपुर की सत्ता को लेकर यहां की राजनीतिक पार्टियों में काफी टकराव था, जिसके चलते कोई सरकार टिक नहीं पाती थी."

मणिपुर में उग्रवाद, फर्जी मुठभेड़ समेत आर्थिक नाकेबंदी, आम हड़ताल, विवादित आफ्स्पा कानून, पहाड़ी और वैली की जनजातियों के बीच टकराव जैसे कई मुद्दे है जो प्रत्येक बार चुनाव में उठाए जाते है लेकिन इन सबसे इबोबी की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ा.

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इस संदर्भ में प्रदीप कहते है कि इबोबी शुरू से काफी कम बोलते है. यह एक तरह से विवादों से दूर रहने का उनका एक तरीका भी रहा है. लेकिन राजनीति में आने वाले ऐसे संकट को समझने का उनका तजुर्बा कमाल का हैं.

इबोबी को यह पता होता है कि किस मुद्दे को कैसे हैंडल करना है. मणिपुर में 121 दिन तक आर्थिक नाकेबंदी का रिकार्ड रहा है लेकिन फिर भी मुख्यमंत्री की कुर्सी पर कोई आंच नही आती.

इन उपलब्धियों के साथ ही इबोबी की विफलता की बात करते हुए प्रदीप कहते है कि पहाड़ों पर रहने वाली जनजातियों और इम्फ़ाल घाटी में रहने वाले मैती लोगों के बीच संबंध हमेशा ही तनावपूर्ण रहे हैं. लेकिन इतने लंबे समय तक प्रदेश के मुख्यमंत्री रहने के बाद भी इबोबी ने इन टकरावों को दूर करने का प्रयास नहीं किया. जबकि उनके पास समय के साथ ही अच्छा मौका भी था.

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सितंबर 2006 में विकीलीक्स की ओर से जारी एक गोपनीय केबल का हवाला देते हुए कोलकाता में तैनात अमेरिकी वाणिज्य दूतावास के प्रधान अधिकारी हेनरी जार्डिन ने मणिपुर को भ्रष्ट राज्य के तौर पर रेखांकित किया था. अमेरिकी अधिकारी ने कहा था कि मुख्यमंत्री इबोबी 'मिस्टर टेन परसेंट' के नाम से जाने जाते है.

मुख्यमंत्री पर ठेकेदारों और सरकारी परियोजनाओं से कमीशन लेने का आरोप लगाया गया था. वहीं 2005 में मुख्यमंत्री पर राज्य में सक्रिय चरमपंथी समूहों को डेढ़ करोड़ रुपये देने का भी आरोप लगा था.

राजनीति विश्लेषक जेम्स खांगेंबम कहते है कि भ्रष्टाचार के आरोपों के कारण लोगों में इबोबी की चर्चा जरूर होती है. लेकिन भ्रष्टाचार को लेकर उनके खिलाफ आधिकारिक तौर पर कोई स्कैंडल सामने नहीं आया हैं.

जेम्स यह भी कहते है कि राजनीति में इस तरह के भ्रष्टाचार के आरोप लगाना एक आम बात होती है. इससे आगामी चुनाव में इबोबी को कोई खास नुकसान नहीं होगा.

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