पूर्वाग्रहों से प्रभावित होते हैं रेप से जुड़े फैसले
- Author, सौतिक बिस्वास
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
भारतीय महिलाएं रेप के बारे में कोई झूठा आरोप नहीं लगा सकती हैं. भारत की सुप्रीम कोर्ट ने एक बार इसे लेकर कई दिलचस्प कारण गिनाये थे. 1983 के इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि भारत और पश्चिमी देशों की महिलाओं में अंतर होता है.
कोर्ट ने कहा था, "पश्चिमी देशों में कोई महिला किसी पुरुष पर छेड़खानी या यौन हमले की झूठी शिकायत कर सकती है क्योंकि वह पैसे के लिए अमीर पुरुष से संबंध बना सकती है या फिर उससे शादी कर सकती है. वह मनोरोगी हो सकती है. वह ईर्ष्या की वजह से किसी पर ऐसा आरोप लगा सकती है. मशहूर होना चाहती हो...."
फैसला लिखने वाले जज ने कहा था, "कुल मिलाकर ये कारण भारत में प्रासंगिक नहीं हैं."
कोर्ट ने कहा था कि एक भारतीय महिला परंपराओं से बंधी होती है, वह यौन हमले के बारे में झूठ नहीं कहेगी क्योंकि ऐसा आरोप लगाने पर वह सामाजिक रूप से बहिष्कृत की जा सकती है. इससे परिवार और पति से मिलने वाला मान-सम्मान वो खो सकती है. और अगर वह अविवाहित है तो शादी होने की संभावनाएं धूमिल पड़ सकती हैं.
मृणाल सतीश ने येल लॉ स्कूल से डॉक्टरेट की पढ़ाई की है और फिलहाल वे दिल्ली की नैशनल लॉ यूनिवर्सिटी में पढ़ाते हैं. उन्होंने 1983 के इस फैसले के अलावा सभी अदालतों के 800 ऐसे मुकदमों का अध्ययन किया और पाया कि देश में बलात्कार के मामलों में दी जाने वाली सजा पर मिथकों और भ्रांतियों का अक्सर असर होता है.
भारत में रेप की सजा में सुधार पर किए गए अपने हाल के काम को लेकर डॉक्टर सतीश कहते हैं, "रेप से जुड़े मिथक बलात्कार पीड़ितों के लिए बेहद नुकसानदेह हैं. ये रेप, बलात्कार पीड़ितों और बलात्कारियों के बारे में पूर्वाग्रह, भ्रांतियों और गलत मान्यताएं हैं."
रत्ना कपूर जैसी कानूनी जानकारों के अनुसार भारतीय अदालतें लंबे समय तक बलात्कार पीड़िताओं को 'पतिव्रता, पवित्र, एक साथी से वफादार, आदरणीय और घर की चहारदीवारी में बंधकर रहने वाली महिला' के तौर पर देखती रहीं. ये माना गया कि पीड़िता या तो 'कुंवारी होगी या फिर वफादार बीवी.'

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अदालतों में पीड़िताओं की 'अमूमन होने वाली प्रतिक्रियाओं' को भी नोटिस में लिया जाता है. एक मामले में तो कोर्ट ने महिला की चाल-चलन का भी हवाला दिया था.
तमिलनाडु के इस केस में एक गुरु ने महिलाओं का बलात्कार किया था. अदालत में गवाही देते समय दो महिलाएं बुरी तरह से रोने लगी थीं और एक महिला को चक्कर आ गया था. एक अन्य मामले में सुप्रीम कोर्ट ने माना कि बलात्कार पीड़िता 'शर्म से मर जाती' है.
डॉक्टर सतीश मेडिकल ज्यूरिप्रूडेंस की लोकप्रिय किताबों की तरफ भी इशारा करते हैं. ज्यादातर अदालतें अपने फैसलों में इनका हवाला देती हैं.

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एक किताब में कहा गया है, "महिला के जरूरी है कि वह बलात्कार का पूरी ताकत के साथ विरोध करे. अगर वह आधे-अधूरे मन से इसका विरोध करती है और सहमति देती है तो यह बलात्कार नहीं माना जाएगा."
एक फैसले में सामाजिक तबके का भी हवाला दिया गया है. कहा गया कि 'मजदूर तबके की महिला' कड़ी मेहनत करने की आदी होती है इसलिए वह अपने यौन हमलावर से निपटने में सक्षम होती है और ऐसी कोशिश को वह नाकाम कर सकती है लेकिन किसी खाते-पीते घर की महिला ज्यादा समय तक विरोध नहीं कर पाएगी और जल्द ही पस्त हो जाएगी.
डॉक्टर सतीश बताते हैं, "कुछ हाई कोर्ट्स ने रेप के मामलों में इसी बिना पर सही और गलत का फैसला किया है. पीड़िता के शरीर पर चोट के निशानों की गैरमौजूदगी का मतलब उनकी सहमति से निकाला गया."

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वह कहते हैं, "ये परेशान करने वाली बात है कि इन किताबों को डॉक्टर लोग मेडिकल ज्यूरिसप्रूडेंस के प्रामाणिक स्रोत मानते हैं. इसलिए मुमकिन है कि डॉक्टरों को ये यकीन करना सिखाया गया है कि पीड़िता के शरीर पर चोटों की मौजूदगी रेप को साबित करने के लिए एक जरूरी शर्त है."
डॉक्टर सतीश का कहना है कि पिछले चार दशकों में सुप्रीम कोर्ट रेप के मामलों में संवेदनशीलता बरतने के बारे में लगातार कहती रही है लेकिन जब सजा देने की बारी आती है तो ऐसी संवेदनशीलता दिखाने में नाकाम रही है.
उन्होंने कहा, "मेरी स्टडी दिखलाती है कि कौमार्य/कुंवारापन खोना रेप का पहला नुकसान है. हालांकि अगर महिला को खराब चाल-चलन वाला माना गया तो इससे सजा पर फर्क पड़ जाता है. चूंकि कानून सुनवाई के दौरान चाल-चलन से जुड़ी बातों का जिक्र करने से कोर्ट को रोकता है इसलिए इसका असर अब सजा देने में दिखने लगा है. इस मामले में अदालतों को हाल तक काफी विवेकाधिकार थे."

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फैसलों के अध्ययन में डॉक्टर मृणाल सतीश ने पाया कि उन मामलों में दोषी करार दिए गए व्यक्तियों को ज्यादा लंबी सजा दी गई जहां पीड़िता के शरीर पर प्रतिरोध के निशान पाए गए थे. इतना ही नहीं अविवाहित महिलाओं के बलात्कार के मामलों में विवाहित महिलाओं के बलात्कारियों की तुलना में ज्यादा सजा दी गई.
वह कहते हैं, "इसलिए मालूम पड़ता है कि अविवाहित महिलाओं को कौमार्य खोने से होने वाले नुकसान के कारण बलात्कारियों को ज्यादा बड़ी सजाएं दी गईं."
जिन मामलों में पीड़िता के रिश्तेदार, पड़ोसी या किसी करीबी पर रेप के आरोप लगे हों, वहां अजनबियों के बनिस्बत कम सजा दी गई. लड़की के साथ भागने वाले बलात्कार के आरोपियों को निचली अदालतों, हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने कम सजा दी.
इन मामलों में हाई कोर्ट्स ने ये कहते हुए सजा कम की कि 'दोनों एक दूसरे के लिए आकर्षित थे' और 'जवानी में बहक गए.'
महिला अधिकारों के लिए काम करने वाली वकील फ्लेविया एग्नेस ने बताया कि 2012 के निर्भया कांड के बाद बने नए कानून की वजह से हालात काफी सुधरे हैं. हालांकि इसके बावजूद देश भर में बलात्कार की घटनाएं होती रही हैं.
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