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किराया प्लेन वाला, रफ़्तार मालगाड़ी से बदतर
- Author, विभुराज चौधरी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
राजधानी एक्सप्रेस जैसी किसी वीआईपी ट्रेन में सफर करने के लिए आप वाजिब किराये से डेढ़ से दोगुना ज्यादा चुकाते हैं और फिर भी आपकी ट्रेन मंजिल पर घंटों लेट से पहुंचती है!
आपके साथ ऐसा हो तो कैसा महसूस करेंगे.
पेशे से बैंकर अतुल शेखर कहते हैं, "यह बेहद बुरा अनुभव है. पता नहीं रेलवे कैसे काम करता है."
किराये के इस फर्क को 'फ्लेक्सी फेयर' या 'डायनमिक प्राइसिंग' कहते हैं और इस मौसम में सफर में देरी की एक बड़ी वजह कोहरा है.
हालांकि रेलवे ट्रेनों के देर से चलने को यात्री सुरक्षा से जोड़कर देखा जाता है.
रेलवे के चीफ पीआरओ एके सक्सेना कहते हैं, "ट्रेनों को कायदे से वक्त पर चलना चाहिए, लेकिन कोहरे की वजह से होने वाली देरी एक-दो महीने की बात है. यात्रियों को सुरक्षित पहुंचाना रेलवे की ज्यादा बड़ी जिम्मेदारी है. कोहरा ट्रेनों में मेल और एक्सप्रेस के आधार पर भेदभाव नहीं करता."
पढ़ें- कोहरे का सवेरा, धुंध की चादर
नोटबंदी के इस दौर में ज्यादा किराया भरने के बाद ट्रेन का घंटों लेट होना लोगों के लिए भारी मुसीबत पैदा करता है.
तुसी कुमार एक लॉ फर्म के पार्टनर हैं. उनका कहना है, "पैसा देने में दिक्कत नहीं है पर बदले में जो सर्विस मिल रही है, वह ठीक नहीं है. रेलवे को सुधार की जरूरत है."
कोहरे के कहर का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि 11 दिसंबर से 15 दिसंबर के बीच 958 ट्रेनें पूरी तरह से और 306 ट्रेनें आंशिक रूप से रद्द की गई हैं.
फ्लेक्सी या निर्धारित से ज्यादा किराया देकर शताब्दी एक्सप्रेस का टिकट बुक कराने वाले दीपक कुमार की ट्रेन 4 अक्टूबर को अमृतसर से कैंसल हो गई थी.
वे कहते हैं, "इस हाल में तो एयरलाइन का विकल्प चुनना ज्यादा मुनासिब है."
एके सक्सेना इस पर जवाब देते हैं, "कोहरे में उड़ानें भी रद्द होती हैं और रेलवे देर से ही सही कम से कम मंजिल पर पहुंचा तो देता है."
ट्रेनों के मंजिल पर पहुंचने या शुरुआती स्टेशन से खुलने में होने वाली देरी दो-तीन घंटे से लेकर 25-30 घंटे तक कुछ भी हो सकती है. इसकी कोई गारंटी नहीं है.
पिछले दिनों असम के डिब्रूगढ़ से आने वाली राजधानी एक्सप्रेस ट्रेनें 10-11 घंटे तक की देरी से पहुँची हैं.
एके सक्सेना का कहना है, "कोहरे के दिनों में ट्रेनों को वक्त पर चलाने के लिए असरदार तकनीक की दिक्कत है. रेलवे में त्रिनेत्र टेक्नॉलॉजी पर ट्रायल चल रहा है और आने वाले दिनों में 3000 इंजनों में इसे इंस्टॉल किया जाएगा. एक त्रिनेत्र डिवाइस की लागत एक करोड़ रुपए के करीब बैठेगी."
तो क्या रेलवे इंफ्रारेड कैमरे वाली इस तीसरी आंख से कोहरे में भी देख पाएगा.
सक्सेना कहते हैं, "इसकी विज़िबिलीटी एक किलोमीटर होगी जिससे कोहरे के दिनों में रफ्तार बढ़ने की उम्मीद की जा सकती है."
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