You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
कानपुर जैसे रेल हादसे की ये हो सकती हैं 5 वजहें
- Author, प्रदीप कुमार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
रविवार कानपुर के पास हुई रेल दुर्घटना में मरने वालों की संख्या 142 हो गई है. हादसा तब हुआ जब इंदौर से पटना जा रही एक्सप्रेस ट्रेन के 14 कोच पटरी से उतर गए. हादसे में हताहतों की संख्या बढ़ने की आशंका बनी हुई है.
रेल विभाग के पीआरओ (नॉर्दर्न सेंट्रल) अमित मालवीय ने स्थानीय पत्रकार रोहित घोष को बताया कि अब तक 142 शव बरामद किए जा चुके हैं, जबकि घायलों की संख्या 180 है.
रविवार रात तक 133 शव निकाले जा चुके थे और सोमवार को नौ और शव मिले.
रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने हादसे के कारणों की जांच के आदेश दिए हैं और कहा है कि ज़िम्मेदार लोगों पर कड़ी कार्रवाई होगी.
सबसे अहम सवाल यह कि ये हादसा क्यों हुआ? इस सवाल का जवाब रेलवे की जांच के बाद ही मालूम होगा, लेकिन शुरुआती तौर पर रेलवे ट्रैफिक और परिचालन से जुड़े विशेषज्ञों के मुताबिक़ संभव है कि ये रेलवे ट्रैक में फ्रैक्चर के चलते हुआ हो.
आएं नज़र डालें उन पांच अहम बातों पर जिनके कारण रेल हादसे होते हैं और जो रेलवे सुरक्षा व्यवस्था पर सवालिया निशान लगाते हैं.
रेलवे ट्रैक का फ्रैक्चर होना
शुरुआती आकलन के मुताबिक कानपुर हादसे की वजह रेलवे ट्रैक में फ्रैक्चर हो सकता है. भारतीय रेलवे बोर्ड (ट्रैफिक) के पूर्व सदस्य शांति नारायण ने बीबीसी से बातचीत में कहा है, "ये हादसा ट्रैक फ्रेक्चर की वजह से हुआ लगता है, हालांकि यह जांच से ही साबित किया जा सकता है कि असल वजह क्या रही है. लेकिन मिडिल ऑफ द ट्रेन की बोगियां पलटी हैं, ऐसा फ्रैक्चर के चलते ही संभव होता है."
लेकिन रेलवे ट्रैक में फ्रैक्चर हुआ हो, तो इसका पता ट्रेन के गुज़रने से पहले कैसे चलता है? भारतीय रेल इस पर किस तरह से नज़र रखती है, ये आम लोग शायद नहीं जानते होंगे.
रेलवे ट्रैक की नियमित तौर पर जांच होती है. ये जांच किस कदर होती है, इसके बारे में इंडियन रेलवे लोको रनिंग मेन आर्गेनाइजेशन के वर्किंग प्रेसीडेंट संजय पांधी ने बीबीसी हिंदी को जानकारी दी.
उन्होंने बताया, "हर मेन लाइन- जो ट्रंक रूट पर है, दिल्ली-मुंबई, दिल्ली-कोलकाता, दिल्ली-चेन्नई, कोलकाता-मुंबई, इन पर अल्ट्रासोनिक वॉल डिटेक्शन होता है. हर महीने, रेलगाड़ियों के चलने से छोटे-मोटे जो भी क्रैक हो सकते हैं, उनकी जांच होती है. माइक्रो लेवल स्तर की ख़ामियों का भी पता चल जाता है. दूसरे रूटों में यह डेढ़- दो महीने के अंतराल पर होता है."
हालांकि, कई बार ये तीन महीने तक भी खिंच जाता है. ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है इंदौर-पटना ट्रैक की आख़िरी जांच कब हुई थी. क्या इसे टाल दिया गया था? क्या जांच को बायपास कर ट्रेन चलाई जा रहीं थीं? माइक्रो क्रैक के चलते किसी भी ट्रैक पर कहीं भी ऐसा हादसा हो सकता है.
रेलवे ट्रैक पर बढ़ते लोड का असर?
बीते कुछ सालों से भारतीय रेलवे ट्रैक पर लोड बढ़ता जा रहा है. आम लोगों के ट्रैफिक का ही नहीं, बल्कि माल ढुलाई का लोड भी.
इंडियन रेलवे लोको रनिंग मेन ऑर्गेनाइज़ेशन के वर्किंग प्रेसीडेंट संजय पांधी के मुताबिक गुड्स ट्रेन इन दिनों ओवर लोडेड चल रही हैं. उनका दावा है कि अमूमन अगर किसी गुड्स ट्रेन की क्षमता 78 टन की है, तो उस पर 80-82 टन माल की ढुलाई हो रही है. इससे रेल ट्रैक के टूटने का ख़तरा बढ़ जाता है.
ये संभव है कि इंदौर-पटना एक्सप्रेस ट्रेन जिस ट्रैक से गुज़र रही थी, वहां कुछ समय पहले गुज़री गुड्स ट्रेनों के कारण भी क्रैक बनने शुरू हो गए हों.
ट्रेन की रफ़्तार से भी हो सकती है दुर्घटना
भारतीय रेलवे सूत्रों के मुताबिक जिस वक़्त इंदौर-पटना ट्रेन के साथ हादसा हुआ, ट्रेन की रफ़्तार काफ़ी तेज़ थी. उससे ठीक पहले जो ट्रेन इस ट्रैक से गुज़री, उसकी स्पीड कम थी.
ऐसे में अगर इस रेलवे ट्रैक पर कोई छोटा सा क्रेक पहले से रहा होगा, तो इस रफ्तार की वजह से भी हादसा हो सकता है. हालांकि, इस ट्रैक पर एक्सप्रेस ट्रेन को 110 किलोमीटर प्रति घंटे तक चलाने की इजाज़त है.
क्या दी है ड्राइवर ने रिपोर्ट?
भारतीय रेलवे के सूत्रों के मुताबिक इंदौर-पटना एक्सप्रेस के ड्राइवर ने अपनी रिपोर्ट में लर्चिंग को हादसे की वजह बताया है. दरअसल ट्रेन या कोई कार-बाइक की दुर्घटना की तीन आम वजहें होती हैं- लर्च होना (गड्डे के आने से वाहन का ऊपर नीचे या इधर-उधर होना), जर्क (अचानक झटका लगना) और तीसरा है स्विंग (जब आपकी गाड़ी झूल जाती है).
यदि लर्चिंग को वजह बताया गया है तो इसका क्या मतलब है? इसकी वजह बताते हुए संजय पांधी कहते हैं, "ड्राइवरों को रेलवे ट्रैक के नीचे गड्डा सा महसूस हुआ हो, यानी ट्रैक दब गया हो, तो ड्राइवर ऐसी रिपोर्ट देता है."
दरअसल, ये भी बताया गया है कि इस रूट में पिछले कई महीनों के दौरान झांसी लोकोशेड के कई ड्राइवर इसी जगह पर लर्चिंग महसूस कर रहे थे.
लेकिन आम तौर पर भारतीय रेलवे ड्राइवर इस तरह की रिपोर्ट करने की ज़हमत नहीं उठाते और उन लोगों ने इसकी आधिकारिक शिकायत दर्ज नहीं की है.
भारतीय रेलवे बोर्ड (ट्रैफिक) के पूर्व सदस्य शांति नारायण कहते हैं, "भारतीय रेल अपने रेलवे ट्रैक की निगरानी बड़े पैमाने पर करता है. निगरानी के लिए अलग से भी बजट होता है. लेकिन ट्रैक में मुश्किलें कभी भी हो सकती हैं."
ट्रैक में इस तरह की खामियों को बेहतर क्वालिटी के स्टील ट्रैक के इस्तेमाल के ज़रिए ही दूर किया जा सकता है. शांति नारायण के मुताबिक भारतीय परिपेक्ष्य में मौसम में आए उतार-चढ़ाव की वजह से भी रेलवे ट्रैक पर असर पड़ता है.
रेलवे कोच में गड़बड़ी?
इंदौर-पटना एक्सप्रेस में एस-1 और एस-2 की बोगी को सबसे ज़्यादा नुकसान हुआ है, पीछे की बोगियां इन पर जा चढ़ी. ऐसे में ये भी संभव है कि ट्रेन के किसी कोच में कोई गड़बड़ी रही हो.
ये किसी भी तरह की गड़बड़ी हो सकती है. इस बारे में शांति नारायण कहते हैं, "एक्सप्रेस ट्रेन के कोच की रफ़्तार का अंदाजा लगाइए और कोई भी मूविंग और हैंगिंग पार्ट गिर जाए तो वह ख़तरनाक हादसे की वजह हो सकता है. हालांकि, यह भी जांच के बिना साबित नहीं हो सकता है."
इस मामले में संजय पांधी कहते हैं, "किसी भी ट्रेन को चलाने से पहले उसे पूरी तरह से फ़िट होने का प्रमाण पत्र जारी किया जाता है. जिस स्टेशन से ट्रेन चलती है, वहां पर उसका प्राइमरी इंस्पेक्शन होता है. फिर जब ट्रेन गंतव्य तक पहुंचती है, वहां भी जांच होती है. इसे ब्रेक पावर सर्टिफिकेट कहा जाता है. ऐसे में ये भी देखना होगा कि हादसे वाली ट्रेन का इंदौर में पूरी तरह जांच हुई या नहीं."