क्या अब 'तीन तलाक़' पर रोक लग गई है?

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- Author, दिव्या आर्य
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
'तीन तलाक़' के मुद्दे पर कई हफ़्तों से चल रही बहस इलाहाबाद हाईकोर्ट की एक टिप्पणी फिर से गर्मा गई है.
कई लोगों ने ये मान लिया कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 'तीन तलाक़' को असंवैधानिक क़रार दिया है. पर सच्चाई क्या है? पड़ताल की बीबीसी संवाददाता दिव्या आर्य ने.
इलाहाबाद हाईकोर्ट का केस क्या है?
एक मुसलमान आदमी ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दायर कर कहा कि जब उसने अपनी पहली बीवी को तलाक़ देकर दूसरी शादी की तो उसे परेशान किया जाने लगा, उसकी मदद की जाए.
याचिका में 'तीन तलाक़' का कोई ज़िक्र नहीं था.
आदमी और उसकी दूसरी बीवी का कहना था कि वो वयस्क यानी 'अडल्ट' हैं और संविधान के अनुछेद 21 के तहत उन्हें अपनी मर्ज़ी और आज़ादी से जीने का हक़ है.
कोर्ट ने उनकी बात मानी पर अपने फ़ैसले में तीन तलाक का ज़िक्र किया.
कोर्ट के मुताबिक़ आदमी ने पहली पत्नी को बिना उसकी ग़लती के सिर्फ़ इसलिए एक बार में तीन तलाक़ दे दिया क्योंकि उसे दोबारा शादी करनी थी.
कोर्ट ने पहली पत्नी के साथ हुए बर्ताव के बारे में कहा, "क्या मुस्लिम महिलाओं को ये क्रूरता सहते रहना चाहिए? क्या उनकी परेशानी कम करने के लिए पर्सनल लॉ को बदलना नहीं चाहिए?"
क्या है तीन तलाक़?
भारत में सिर्फ़ सुन्नी मुसलमान तलाक़ देने के तरीके 'तीन तलाक़' को सही मानते हैं.
इसके तहत अगर कोई आदमी अपनी बीवी से अलग होना चाहे तो एक बार तलाक़ कहेगा और फिर दोनों एक दूसरे को सुलह करने का व़क़्त देंगे.

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सुलह ना होने पर आदमी दूसरी बार तलाक़ कहेगा और उसके बाद फिर एक महीने का व़क्त दिया जाएगा. फिर भी रास्ता ना निकले पर तीसरी बार तलाक़ कहा जाएगा जिसके बाद उसे पूरा तलाक़ माना जाएगा.
'इंस्टेंट ट्रिपल तलाक़' यानी एक बार में तीन तलाक़ इससे अलग है. उसे सुन्नी इस्लाम के चार धड़ों में से सिर्फ़ एक धड़ा, देवबंद, सही मानता है.
इसके तहत एक आदमी अगर पत्नी को तलाक़ देना चाहे तो बिना सुलह के मौके के उसे 'तलाक़, तलाक़, तलाक़' बोलकर या लिखकर तलाक़ दे सकता है.
'तीन तलाक़' को किसने दी है चुनौती?
सुप्रीम कोर्ट में 'इंस्टेंट ट्रिपल तलाक़' को चुनौती दी गई है. कई औरतों ने अपने निजी मामले कोर्ट के सामने रखे हैं और उनके समर्थन में कई महिला संगठनों ने भी याचिका दाख़िल की हैं.
कोर्ट इन सभी याचिकाओं की सुनवाई करने के बाद ही 'इंस्टेंट ट्रिपल तलाक़' पर कोई फ़ैसला सुनाएगा. तब तक ये वैध है.

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उसी सुनवाई के दौरान कोर्ट ने सरकार से उसका रुख़ जानना चाहा तो सरकार ने जनता के समक्ष एक 'क्वेश्चनेयर' यानी प्रश्नावली रख दी.
इसमें पूछा गया है कि भारत में 'यूनीफॉर्म सिविल कोड' यानी 'समान नागरिक संहिता' लागू की जानी चाहिए या नहीं?
अगर ऐसा कोड बना तो ये सभी धर्मों, जातियों और जनजातियों पर लागू होगा और वे अपने 'सिविल कोड' के तहत कोई अधिकार नहीं जता पाएंगे.
तो हाईकोर्ट की टिप्पणी का क्या मतलब है?
हाई कोर्ट ने इस ओर ध्यान दिलाया कि, "आम धारणा है कि क़ुरान मुसलमान आदमियों को तलाक़ देने की बेलगाम छूट देता है जबकि ऐसा नहीं है बल्कि क़ुरान के मुताबिक अगर औरत अपने पति की बात मानती हो और वफ़ादार हो तो आदमी को उसे तलाक़ देने से बचना चाहिए."
पर ये सभी टिप्पणियां देते हुए हाई कोर्ट ने ये साफ़ किया कि, "ये मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है इसलिए इससे ज़्यादा हम कुछ नहीं कहेंगे."

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यहां ये ध्यान रखना ज़रूरी है कि सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला जो भी हो, मुसलमान औरतों के पास 'इंस्टेंट ट्रिपल तलाक़' रद्द करवाने के लिए अदालत का रास्ता अभी भी मौजूद है.
अब से 14 साल पहले एक मुसलमान औरत शमीम आरा ने उन्हें दिए गए 'इंस्टेंट ट्रिपल तलाक़' को चुनौती दी थी और सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने तलाक़ रद्द कर उनके हक़ में फ़ैसला सुनाया था.
शमीम आरा जैसे पुराने केस और इलाहाबाद हाई कोर्ट की ताज़ा टिप्पणियां सुप्रीम कोर्ट में दाख़िल याचिकाओं पर आख़िरी फ़ैसले तक आने में अहम् भूमिका निभाएंगी.
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