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जिस दिन चेन्नई में हुई थी सदी की सबसे ज़्यादा बारिश
ठीक एक साल पहले यानी एक दिसंबर 2015 को चेन्नई में 24 घंटों तक लगातार मूसलाधार बारिश होती रही. इस शहर में इस दौरान 272 मिलीमीटर बारिश रिकॉर्ड की गई. यह 24 घंटों में हुई बीते सौ साल की सबसे अधिक बारिश थी.
लेकिन कुछ ऐसे लोग भी ज़रूर थे, जो इस संकट के दौरान भी दूसरों की मदद करने सामने आए.
कार्तिक सुब्रमणियन और पीएम नवीन ने ऐसे लोगों से मुलाक़ात की और उस दिन की बातें जाननी चाहीं.
प्रदीप जॉन शौकिया ब्लॉगर हैं. उन्होंने उन दिनों "तमिलनाडु वेदरमैन" नाम से एक ब्लॉग चलाया था.
वे उस दौरान ग्लोबल फोरकास्टिंग सिस्टम और यूरोपियन सेंटर फ़ॉर मीडियम रेंज वेदर फ़ोरकास्ट के मॉडल्स का इस्तेमाल कर अपने फ़ेसबुक पेज पर बारिश से जुड़ी जानकारी अपडेट करते रहे. उनके कुछ पोस्ट तो दो लाख से भी ज़्यादा लोगों तक पहुंचने में कामयाब रहीं.
बचाव टीमें उनके अपडेट का इस्तेमाल कर काम में लगी रहीं. उस समय उनके 5,000 फ़ॉलोअर्स थे, आज उनके फ़ॉलोअर्स की तदाद 1,35,000 से ज़्यादा हो चुकी है.
जॉन ने बीबीसी से कहा, "उस समय तक मैं महज बारिश की जानकारी देता था. लोग मुझसे पूछने लगे कि क्या उस समय बाहर निकलना या अमुक जगह जाना सुरक्षित है. इससे मुझमें ज़िम्मेदारी का अहसास बढ़ा."
अश्विन छाबड़िया पेशे से रिसर्च एनलिस्ट हैं. वे चेन्नई रेन रिलीफ़ नामक संगठन से जुड़े हुए थे. कई ग़ैर सरकारी संगठनों को एक जगह ला कर यह संगठन बनाया गया था. इस संगठन के ज़रिए बारिश में फंसे हुए लोगों का पता लगाना और उन तक पंहुचना आसान हो सका था.
छाबड़िया ने सिंगापुर और अमरीका के सिलिकन वैली में काम कर रहे अपने दोस्तों के ज़रिए एक कोड बनाया. उसे टैग कर बचाव दल और फंसे हुए लोगों के बीच संपर्क बनाया जा सकता था.
इस कोशिशों से बारिश में फंसे 1,500 लोगों को सुरक्षित निकाला गया था. इसके साथ ही सोशल मीडिया पर चल रही कई तरह की अफ़वाहों को भी इस संगठन की मदद से रोका जा सका था.
वे कहते हैं, "इस बाढ़ से मुझे विनम्रता की सीख मिली. मैं उसके पहले कोडिंग करना नहीं जानता था, मैंने जल्दी से इसे सीखा. सबसे बड़ी सीख मुझे यह मिली कि दूसरी की मदद कैसे की जाए."
नवीन कुमार जनार्तनन सॉफ्टवेअर कंसलटेंट हैं. उन्होंने बाढ़ पीड़ितों के लिए अपने फ़्लैट के दरवाजे खोल दिए और फ़ेसबुक पर ऐलान कर दिया कि लोग उनके फ़्लैट में रह सकते हैं.
वे अपनी कंपनी के कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सबिलिटी शाखा "केअरस्ट्रीम" से भी जुड़े हुए हैं. यह संस्था पुराने कपड़े वगैरह इकट्ठा करती थी और उनकी पैकिंग कर ज़रूरतमंदों तक पंहुचाती थी. वे चेन्नई रेन रिलीफ़ से भी जुड़े हुए थे.
जनार्तनन ने बीबीसी से कहा, "मैं ख़ुद एक छोटे शहर से चेन्नई पढ़ने आया था. मुझे हमेशा ही लगता था कि यह शहर बाहरी लोगों का स्वागत नहीं करता है. लेकिन बाढ़ ने मेरे विचार को बदल दिया. उस समय यहां लोग एक दूसरे की मदद कर रहे थे. यह एक अनूठा अनुभव था. अब मुझे लगता है कि मैं बाहर का नहीं हूं."
पीटर वॉन गीट, द चेन्नई ट्रेकिेंग क्लब के संस्थापक हैं. वे 1998 में बेल्ज़ियम से भारत आए. वे यहां ट्रेकिंग की व्यवस्था करने और इसमें लोगों की मदद करने के लिए जाने जाते हैं.
बारिश और बाढ़ की वजह से नदी के किनारे किनारे तक़रीबन 20 किलोमीटर तक प्लास्टिक का कचरा फैल गया. वॉन गीट ने इस पूरे कूड़े की सफ़ाई का बीड़ा उठाया और दूसरे लोगों के साथ मिल कर इस काम को पूरा किया.
उन्होंने बीबीसी से कहा, "बाढ़ की अच्छाई यह थी कि तमाम तरह की स्वार्थपरता और अमानवीयता पानी में बह गई. झुग्गी झोपड़ी में रहने वाले और संपन्न एक साथ बैठे हुए पाए गए. धनी लोग ग़रीबों के लिए खाना पका रहे थे और ग़रीब नौकाएं लेकर संपन्न लोगों को सुरक्षित निकालने में लगे थे. मुझे लगता है कि सच्ची मानवता लौट आई थी, सब बराबर थे, एक दूसरे से चीजें साझा कर रहे थे."
(सभी तस्वीरें कार्तिक सुब्रमणियन और पीएम नवीन की)