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कलाकार के लिए प्रतियोगिता ज़रूरी: जावेद | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
'है गुज़ारिश...', 'जश्ने बहारां…', 'अर्ज़ी मेरे मौला...', और 'नगाड़ा नगाड़ा…' जैसे सुपर हिट गानों से जावेद अली की आवाज़ को पहचान तो मिल गई लेकिन फ़िलहाल उनके चेहरे को उतनी पहचान नहीं मिली है. दिल्ली में पैदा हुए जावेद ने संगीत के सफ़र की शुरुआत शबद कीर्तन और क़व्वाली गाकर की थी. आज वे ऑस्कर अवार्ड विजेता एआर रहमान के पसंदीदा गायक बन चुके हैं. संगीत के सफ़र की शुरुआत कैसे हुई? घर का माहौल ही संगीतमय था. मेरे वालिद साहब शबद कीर्तन और क़व्वाली गाया करते थे. मैं भी उनके साथ जाया करता था इस तरह सुरों से नाता जुड़ता चला गया. आपने पहला स्टेज शो किस उम्र में किया? तक़रीबन आठ-नौ साल की उम्र में. जिसमें मैंने गुरबानी और शबद गाए थे जिसे लोगों ने बहुत पंसद किया और बतौर हौसला अफ़ज़ाई इनाम भी दिए. फ़िल्मी दुनिया में आना महज़ इत्तेफ़ाक था या आपने इसके लिए कोशिश की? नहीं, मेरा ऐसा कोई इरादा नहीं था कि मैं प्लेबैक सिंगर बनूँगा या फ़िल्मों के लिए गाऊँगा. बस एक शो के दौरान मृदंग साहब ने मुझे सुना. वे मेरे काफ़ी अज़ीज़ है. उन्होंने मुझे कल्याण जी भाई से मिलवाया और मेरे फ़िल्मी करियर की शुरुआत हो गई. 'जोधा अक़बर', 'गजनी' और ‘दिल्ली-6’ के गानों की सफलता को आप अपनी मेहनत मानते है या किस्मत?
मैं रातों-रात स्टार तो बना नही हूँ. हर नए कलाकार की तरह मैंने भी संघर्ष किया है, सीखा है तब कहीं जाकर यह मुक़ाम पाया है और जो कुछ भी पाया है अपनी मेहनत और लगन की वजह से. फ़िल्म 'गजनी' का गाना 'बस एक हाँ की ज़रूरत' इस क़दर चर्चा में आएगा इसका अंदाज़ा था आपको? अंदाज़ा तो था. जहाँ आमिर ख़ान साहब की एक्टिंग हो और उस पर सोने पे सुहागा एआर रहमान साहब का लाजवाब संगीत, तो फिर शक की गुंजाइश कहाँ बचती है. एआर रहमान साहब के साथ काम करने का अनुभव कैसा रहा? मैं जब पहली बार उनसे मिलने गया तो एक डर के साथ गया था. लेकिन जब मैंने गाना गाया तो मुझे यह अहसास ही नहीं हुआ कि मैं पहली बार उनके साथ काम कर रहा हूँ. यह खूबी है रहमान साहब की कि वे माहौल और आर्टिस्ट को इतना सहज कर देते है कि काम का कोई तनाव ही नहीं होता. उनके साथ काम करना मेरे लिए किसी सम्मान या अवार्ड से कम नहीं. गाने से पहले आप किस तरह की तैयारी करते हैं? मुझे जब कम्पोज़ीशन मिलती है, तब मैं सोचता हूँ कि गाने का अंदाज़ क्या होगा. जैसे ‘गजनी’ का गाना मैंने आठ अलग-अलग मुखड़ों में गाया था. इस गाने में आमिर साहब के भी सुझाव थे. इससे यह गाना और भी बेहतर बन सका. आज हर दूसरे दिन नई आवाज़ सुनने को मिलती है क्या कभी ऐसा लगता है कि प्रतियोगिता ज्यादा मु्श्किल होती जा रही है? किसी भी कलाकार के लिए एक स्वस्थ प्रतियोगिता बहुत ज़रूरी है. नहीं तो उसकी कला में निखार कैसे आएगा. प्रतियोगिता तो कलाकार को आगे ले जाने का रास्ता हैं. वह जितना मुश्किल होगा, गाने का स्तर बढ़ता जाएगा. |
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