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सोमवार, 14 अप्रैल, 2008 को 22:52 GMT तक के समाचार
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'पूरा जीवन फ़िल्म में नहीं खपा सकता'

एआर रहमान
हाल में रिलीज़ हुई फ़िल्म जोधा अकबर का संगीत रहमान ने दिया था
जानेमाने संगीत निर्देशक एआर रहमान का संगीत भले ही आजकल बॉलीवुड की फ़िल्मों में कम सुनाई पड़ता हो लेकिन वे संगीत की दुनिया से दूर नहीं हैं. इन दिनों रहमान संगीत के क्षेत्र में नए प्रयोग करने में जुटे हुए हैं.

उनका कहना है कि बॉलीवुड की फिल्मों में वे अपनी शर्तों पर काम करना चाहते हैं. देश में संगीतकारों को पाश्चात्य शास्त्रीय संगीत का प्रशिक्षण देने के लिए हाल ही में उन्होंने चेन्नई में पहला संगीत संस्थान (केएम म्यूजिक कंजरवेट्री) खोला है और साथ ही एक 'सिमफ़नी आर्केस्ट्रा' के गठन का एलान किया है.

एक रियलिटी शो की शूटिंग के सिलसिले में जब वे कोलकाता आए तो उनसे पीएम तिवारी ने बातचीत की.

प्रस्तुत है प्रमुख अंश-

संगीत संस्थान खोलने के पीछे आपका क्या मकसद है?

जब मैंने पश्चिमी शास्त्रीय संगीत के आधार पर पियानो वादन से अपना कैरियर शुरू किया था तभी से संगीत प्रेमियों के लिए एक ऐसा स्कूल शुरू करने की योजना मन में थी.

देश में उभरते संगीतकारों को सही प्लेटफ़ॉर्म उपलब्ध कराने के लिये मैंने इसे शुरू करने का फ़ैसला किया है. इसमें 150 छात्रों को दाख़िला दिया जाएगा. 'केएम म्यूजिक कंजरवेट्री' नामक यह संस्थान भारत में पहला संस्थान होगा जहां देश- विदेश के प्रोफे़सर और संगीतकार आकर छात्रों को भारतीय और पश्चिमी संगीत की शिक्षा दे सकेंगे.

सूफ़ियाना संगीत के प्रति अपनी गहरी दिलचस्पी की वजह से ही मैंने इस संस्थान का नाम ख़्वाज़ा मोईनुद्दीन चिश्ती के नाम पर केएम म्यूजिक रखा है. इसका मकसद फ़िल्मों की जरूरतों को पूरा करना नहीं होगा. इसमें देश के संगीतकारों को पाश्चात्य शास्त्रीय संगीत का प्रशिक्षण दिया जाएगा. जून से यह अकादमी शुरू हो जाएगी.

इसके बाद आप कोलकाता में भी ऐसा ही संस्थान खोलने जा रहे हैं?

देखिए, इसमें काफ़ी समय और पैसा लगता है. चेन्नई के संस्थान के लिए पैसा जुटाने के लिए मुझे काफी मशक्कत करनी पड़ी. लेकिन कोलकाता से मेरा ख़ास लगाव रहा है. देश में मेरा पहला स्टेज शो भी फरवरी, 2003 में इसी शहर में हुआ था. मंगल पांडे के लिए संगीत रचना के समय बंगाल के परंपरागत बाउल संगीत ने मुझे काफ़ी प्रभावित किया था.

मैं बंगाल के संगीत और नई प्रतिभाओं को बढ़ावा देना चाहता हूं. मैंने इस साल के आख़िर में कोलकाता मे एक भव्य संगीत कार्यक्रम का आयोजन करने की भी योजना बनाई है.

आपने पिछले सप्ताह एक भारतीय आर्केस्ट्रा की स्थापना की बात भी कही है?

हां, आर्केस्ट्रा के लिए संगीत कंपोज़ करने के लिए मुझे लंदन या बुडापेस्ट जाना पड़ता था. कई लोगों ने भारतीय आर्केस्ट्रा शुरू करने की बात कही, लेकिन किसी ने ऐसा नहीं किया. दो सालों में यह आर्केस्ट्रा पूरी तरह से काम करने लगेगा. इस आर्केस्ट्रा पर भारतीय संगीतकारों के साथ-साथ पश्चिमी देशों के संगीतकार भी कंपोज़िंग कर सकेंगे. इस आर्केस्ट्रा का नाम 'ग्लोबल म्यूजिक' रखा गया है और यह सभी साज़ों वाला देश का पहला आर्केस्ट्रा होगा.

बॉलीवुड़ के नए गायकों और संगीतकारों में आप किसे बेहतर मानते हैं?

 सूफ़ियाना संगीत के प्रति अपनी गहरी दिलचस्पी की वजह से ही मैंने इस संस्थान का नाम ख़्वाज़ा मोईनुद्दीन चिश्ती के नाम पर केएम म्यूजिक रखा है.

यह बहुत पेचीदा सवाल है. मैं किसी का नाम नहीं लेना चाहता. कुछ लोग बेहतर काम कर रहे हैं. इस बारे में मैं ज्यादा नहीं बोलना चाहता.

वंदे मातरम् के बाद दस साल का लंबा अरसा बीत गया लेकिन आपका दूसरा एलबम बाज़ार में नहीं आया?

यह सही है. उसके बाद मुझे 'लार्ड्स आफ द रिंग' के मंचन का एलबम बनाने में काफ़ी समय लग गया. लेकिन अब मैं वंदे मातरम् के बाद नए संगीत एलबम की योजना बना रहा हूं. इस पर काम चल रहा है.

इन दिनों आप हिंदी फ़िल्मों में बहुत कम नजर आ रहे हैं. इसकी कोई ख़ास वजह?

संगीत की बिक्री से जुड़े कॉपीराइट और रायल्टी जैसे मुद्दों की वजह से मैं जानबूझ कर बॉलीवुड के कई ऑफ़र ठुकरा रहा हूं. यह मामला काफ़ी पेचीदा है. मुंबई में मेरे साथ काम करने वाले लोग मेरी शर्तों पर काम कर रहे हैं. जिनको ये शर्तें मंजूर नहीं वे दूसरे संगीतकारों के पास जा रहे हैं. इसके अलावा पाश्चात्य शास्त्रीय संगीत संस्थान पर ज्यादा ध्यान देना चाहता हूं. इसलिए भी कम फ़िल्में हाथ में ले रहा हूं.

आगे आपकी और क्या योजनाएं हैं?

भारतीय संगीत को विदेशों में लोकप्रिय बनाना. भारत में संगीत की परंपरा बहुत पुरानी है. लेकिन नए लोग इसे एक कैरियर के तौर पर नहीं ले पा रहे हैं.

 भारतीय संगीत को सिर्फ देश ही नहीं, बल्कि विदेशों तक पहुंचाना ही मेरे संस्थान का प्रमुख मकसद है

क्रिकेट और सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में हमारा देश काफ़ी आगे बढ़ चुका है लेकिन हम संगीत के क्षेत्र में आगे नहीं जा पा रहे हैं. मैं अपने संगीत को एक दूसरे स्तर तक ले जाना चाहता हूं. मैं अपना तमाम जीवन फ़िल्मों के लिए संगीत बनाने में नहीं खपा सकता.

लेकिन मुंबई की फ़िल्मों में काम करते समय मैं अपना पूरा ध्यान उन पर ही केंद्रित रखता हूं. मैंने जोधा अकबर के समय भी ऐसा किया था. मैं अपने संस्थान के ज़रिए पाश्चात्य शास्त्रीय संगीत और भारतीय रागों के बीच का अंतर पाटना चाहता हूं. भारतीय संगीत को सिर्फ देश ही नहीं, बल्कि विदेशों तक पहुंचाना ही मेरे संस्थान का प्रमुख मकसद है. संगीत के क्षेत्र में आप कितना भी काम करें, काफ़ी नहीं होता.

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