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'न रहूं किसी का दस्तनिगर...' | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
'आज़ाद हिंद फ़ौज के हमारे कई साथियों को पंडित नेहरू के नेतृत्व में अंतरिम सरकार बनने के बाद भी सज़ा-ए-मौत दे दी गई और हमारी ये सरकार कुछ न कर सकी...' भारत की आज़ादी की लड़ाई के कई चेहरे हैं और कई किस्से. अलग-अलग विचारों, तरीकों के लोगों ने अपने-अपने तरीके से भारत की आज़ादी की लड़ाई लड़ी थी और उसके कुछ कहे-अनकहे सच, पहलू बीच-बीच में लोगों के सामने आते रहे हैं. ऐसी ही एक पुस्तक का विमोचन हुआ राजधानी दिल्ली में, शनिवार यानी तीन जनवरी को. किताब एक जीवनी के रूप में सामने आई है और ये सफ़रनामा है आज़ाद हिंद फ़ौज के सिपाही और फिर समाजवादी आंदोलन के अग्रणी नेताओं में एक रहे कैप्टन अब्बास अली का. अपनी जीवनी को उन्होंने शीर्षक दिया है- न रहूं किसी का दस्तनिगरः मेरा सफ़रनामा. इस किताब की सबसे ख़ास बात यह है कि जहाँ यह किताब एक ओर सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व में लड़ी जा रही भारत की स्वाधीनता की लड़ाई के कई पहलुओं को सामने लाती है वहीं आज़ादी के बाद के भारत का भी एक चेहरा बेबाकी से सामने रखती है. समाजवाद का सच यह चेहरा है भारत में समाजवादी आंदोलन और राजनीति का. इसके कई उतार-चढ़ावों, बनाव और बिखरावों को कैप्टन अब्बास अली ने काफी क़रीब से देखा है.
इस किताब में कैप्टन अब्बास अली ने समाजवादी आंदोलन के इन दोनों चेहरों को सामने लाने, उन्हें बेबाकी से बताने और समाजवादी विचारधारा, आंदोलन की ज़रूरत पर रौशनी डाली है. आत्मकथा का सफ़र शुरू होता है वर्ष 1920 के उत्तर प्रदेश के एक ज़िले बुलंदशहर से और फिर आज़ादी के आंदोलन से बचपन में जुड़ने की चर्चा से लेकर यह सफ़रनामा द्वितीय विश्व युद्ध, आईएनए के संघर्ष, भारत की आज़ादी और विभाजन, सोशलिस्ट पार्टी के उदय, ग़ैरकांग्रेसी राजनीति, जेपी आंदोलन, लोहिया की राह, आपातकाल, जनता पार्टी का गठन और फिर टूट तक की कहानी कहता है. यह किताब समाजवादी आंदोलन के प्रमुख नेताओं आचार्य नरेंद्र देव, डॉक्टर राममनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण और उनके सहयोगियों के राजनीतिक चरित्र, योगदान जैसे कई पहलुओं का भी विश्लेषण करती है. पर इस पूरी कहानी को कहनेवाले कैप्टन अब्बास अली ने नम आंखों से अपने ज़िंदगी के पूरे सफ़र का श्रेय अपनी पत्नी सुल्ताना बेगम को दिया. विमोचन किताब का विमोचन किया समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने. साथ ही केंद्रीय मंत्री और लोकजनशक्ति पार्टी के अध्यक्ष रामविलास पासवान, वरिष्ठ समाजवादी सुरेंद्र मोहन और कई राजनीतिक हस्तियाँ मौजूद थीं. कई केंद्रीय और उत्तर प्रदेश सरकार के पूर्व मंत्री भी समारोह में शामिल हुए. कैप्टन अली के पुत्र वरिष्ठ पत्रकार कुरबान अली भी इस मौक़े पर मौजूद थे जो लंबे समय तक बीबीसी हिंदी से जुड़े रहे हैं.
बड़ी तादाद में ऐसे लोग भी विमोचन के मौके पर पहुँचे जो चुनावी राजनीति के स्तर पर न सही, पर समाजवादी विचारधारा और आंदोलन से जुड़े हुए हैं. कई मीडियाकर्मी और वरिष्ठ पत्रकारों ने इस कार्यक्रम के दौरान स्वीकारा कि कई वर्षों के बाद ऐसा हुआ है जब इतने सारे समाजवादी विचारधारा के लोग एक साथ, एक मंच पर आए. कार्यक्रम में विमोचन के अलावा कैप्टन अब्बास अली के 90वें जन्मदिन का अभिनंदन समारोह भी संपन्न हुआ. पर सबसे अहम चर्चा हुई आज के समाजवादी आंदोलन और राजनीति की स्थिति पर. मुलायम सिंह यादव और रामविलास पासवान ने मंच से बोलते हुए यह तक कहा कि वरिष्ठ समाजवादी सुरेंद्र मोहन को अब ऐसा प्रयास करना चाहिए जिससे समाजवादी विचारधारा के लोग और पार्टियाँ एक साथ बैठकर देश और आंदोलन की स्थिति पर चर्चा करें. ख़ुद कैप्टन अब्बास अली ने भी कहा कि समाजवाद और समाजवादियों को संभलने, मज़बूत और एकजुट होने की ज़रूरत है. पर कैप्टन अब्बास अली के कृतित्व की प्रशंसा और संस्मरण सुना रहे कई दिग्गज समाजवादी नेता वाकई उनकी इस बात पर कितने गंभीर होंगे और समाजवादी आंदोलन कितना एकजुट होगा, यह देखने की बात है. राजकमल प्रकाशन से छपी यह किताब 400 रूपए में लोगों के लिए उपलब्ध है. |
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