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'आज भी ज़िंदा हैं बापू के हत्यारे' | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
"बापू की हत्या का कारण, उसके पीछे के अनकहे सच और गांधी की हत्या करने वाली सोच और मानसिकता आज भी ज़िंदा है." यह मानना है महात्मा गांधी के प्रपौत्र तुषार गांधी का. तुषार ने पिछले कुछ समय में कुछ साक्ष्यों और जानकारी के आधार पर एक किताब लिखी- 'लेट्स किल गांधी'. इस किताब में उन्होंने गांधी की हत्या के पीछे के अनसुलझे पहलुओं और वजहों को जानने की कोशिश की है. तुषार गाँधी का कहना है कि उनकी किताब 'लेट्स किल गाँधी' बापू पर राष्ट्र विभाजन और मुसलमानों का पक्षधर होने जैसे आरोप लगाने वालों के लिए करारा जवाब है. वो कहते हैं, "मेरी किताब में उन लोगों के आरोपों का जवाब है जो बापू की हत्या को ये कहकर ज़ायज ठहराने की कोशिश करते हैं कि 'बापू' मुसलमानों के पक्षधर थे और हिंदुओं तथा भारत माता के लिए खतरा थे या फिर भारत के विभाजन के लिए ज़िम्मेदार थे." किताब के शीर्षक 'लेट्स किल गाँधी' काफ़ी रोचक है और जिज्ञासा से भरपूर है. इस शीर्षक की वजह के बारे में तुषार का कहना है कि पहले तो उनकी किताब का विषय बापू की हत्या से जुड़ा है और दूसरे बापू के हत्यारे नाथूराम गोडसे ने अदालत में भी यही बयान दिया था. ख़ासियत उन्होंने कहा, "गोडसे ने जब ये तय किया कि बापू की हत्या करनी है तो उसने अपने संवाद में इन्हीं शब्दों का प्रयोग किया था" इसके अलावा ये शीर्षक उन लोगों को भी संबोधित करता है जो बापू के क़त्ल के जिम्मेदार तो नहीं हैं, लेकिन उनके विचारों और आदर्शों का खून करते रहते हैं. गाँधी पर तमाम किताबे लिखी गई हैं और बापू के पौत्र राजमोहन गाँधी ने भी हाल ही में एक पुस्तक लिखी है. लेकिन तुषार अपनी पुस्तक को पूर्व में 'बापू' पर लिखी गई किताबों से हटकर बताते हैं.
उन्होंने कहा, "राजमोहन काका ने बापू के जीवन के बारे में लिखा है, लेकिन मेरी किताब बापू की हत्या और इसकी वज़हों के बारे में है." तुषार मानते हैं कि गाँधीजी की मृत्यु के कारण आज भी मौजूद हैं और वही सोच अब भी जिंदा है. उन्होंने कहा, " मेरी किताब लोगों को चेताती है कि अब भी समय है, उठो, जागो और संभल जाओ. इस किताब को अगर कोई समझ पाएगा तो उसे समाज में मौजूद बुराइयों से बचने की राह भी मिल जाएगी." फैशन नहीं तुषार नहीं मानते कि दिल्ली में सत्याग्रह पर चल रहे सम्मेलन या 'लगे रहे मुन्ना भाई' से गाँधी युवा पीढ़ी के लिए फैशन हो गए हैं. उनका कहना है कि समाज के लिए गाँधी की प्रासंगिकता हमेशा बनी रहेगी. तुषार ने कहा, "जब-जब समाज बापू से बिछड़ा है, तब-तब उसकी अधोगति हुई है." उनका कहना है, "गाँधीवाद अमर है और फैशन ट्रेंड से इसका कोई मतलब नहीं है. हाँ 'मुन्नाभाई' से एक नया दृष्टिकोण ज़रूर मिला है. फ़िल्म में जो मूल्य बताए गए हैं, वे बहुत अहम और ज़रूरी हैं." | इससे जुड़ी ख़बरें परमाणु हथियार भारत की मजबूरी: सोनिया29 जनवरी, 2007 | भारत और पड़ोस सत्याग्रह की शताब्दी का समारोह29 जनवरी, 2007 | भारत और पड़ोस नष्ट हो रही है गाँधी जी की धरोहर02 अक्तूबर, 2004 | भारत और पड़ोस गाँधीजी और मीराबेन के रिश्ते पर सवाल01 अक्तूबर, 2004 | भारत और पड़ोस जिनके लिए तिरंगा भगवान है14 अगस्त, 2006 | भारत और पड़ोस नेहरु-गांधी परिवार का आनंद भवन30 अक्तूबर, 2004 | भारत और पड़ोस 'पीटरमारित्ज़बर्ग आना तीर्थयात्रा की तरह'30 सितंबर, 2006 | भारत और पड़ोस | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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