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महिमा लेकर आई हैं थोड़ी सी मिठास... | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
पिछले कुछ समय से फ़िल्मी दुनिया से नदारद रहीं फ़िल्म अभिनेत्री महिमा चौधरी इन दिनों लोगों के जीवन में मिठास घोल रही हैं- अपनी नई फ़िल्म होप एंड ए लिटिल शुगर के ज़रिए. नब्बे के दशक में बतौर मॉडल और टीवी होस्ट महिमा टेलीवीज़न पर छाई रहीं. 1997 में शाहरुख़ खान के साथ फ़िल्म परदेस में लोगों ने पहली बार महिमा का अभिनय देखा. धड़कन, दाग़ द फ़ायर, बाग़बान, लज्जा जैसी कई फ़िल्मों में महिमा नज़र आईं. शादी होने और माँ बनने के बाद वे कुछ वक़्त से फ़िल्मों से दूर थीं. महिमा मानती हैं कि शर्मिला टैगोर और डिंपल कपाड़िया जैसी कई शादीशुदा अभिनेत्रियों को लोगों ने हमेशा पसंद किया है और आज भी नई अभिनेत्रियों के मुकाबले माधुरी दीक्षित, जूही चावला या काजोल की फ़िल्मों को लेकर लोग ज़्यादा उत्साहित रहते हैं. कुछ समय पहले लंदन आई महिमा चौधरी से बीबीसी हिंदी ने ख़ास बातचीत की. आपको लोग लंबे समय बाद स्क्रीन पर देख रहे हैं...आप तो पहले से भी ज़्यादा ख़ूबसूरत और ग्लैमरस दिख रही हैं. कोई ख़ास राज़? मैं फ़िलहाल बहुत ख़ुश हूँ और ये ख़ुशी चेहरे पर नज़र आती है. मैं क्या कोई भी इंसान जब खुश होता है तो अच्छा ही दिखता है. बहुत बार लोग मुझसे पूछते हैं कि ख़ूबसूरती क्या है. मेरे हिसाब से जब आप खुश होते हैं तो ख़ूबसूरती ख़ुद ब ख़ुद चेहरे पर झलकती है, दमकती है. पिछले कुछ समय से आप फ़िल्मों से दूर रहीं. आपके प्रशंसक ज़रूर जानना चाहेंगे कि महिमा इस दौरान क्या कर रही थीं. दरअसल मैं निजी ज़िंदगी में व्यस्त हो गई थी. शादी हुई और एक बेटी भी है आरियाना. 2006 में फ़िल्म आई थी ‘कुड़ियों का है ज़माना’. उसके बाद नहीं आई. वैसे आजकल लोग एक साल में कम ही फ़िल्में करते हैं, पहले जैसा नहीं रहा कि चार-पाँच फ़िल्मों पर एक साथ काम होता है. शादी के बाद और माँ बनने के बाद क्या ज़िंदगी बदली है? बहुत संतुष्ट महसूस कर रही हूँ. अब समझ में आता है कि दुनिया की हर माँ को कितना कुछ करना पड़ता है, महसूस कर सकती हूँ कि ज़िंदगी में माँ का इतना महत्व क्यों है. बाप जितना भी करे लेकिन माँ जो करती है वो कहीं ज़्यादा होता है. अपनी मम्मी का अब ज़्यादा सम्मान करती हूँ- पहले भी करती थी लेकिन अब समझ में आता है कि उन्होंने कितना कुछ किया. रात-रात भर जागना, बच्चे के बारे में पहले सोचना और अपने बारे में बाद में- ये सब अनुभव कर रही हूँ. ज़िंदगी में एक तरह की बोरियत आ गई थी, वो पूरी तरह दूर हो गई है. अब मैं दोबारा उत्साहित हूँ काम को लेकर, ज़िंदगी को लेकर. ज़्यादा मज़ा आ रहा है ज़िंदगी में. शादी के बाद माधुरी दीक्षित, जूही चावला, काजोल समेत कई बेहतरीन अभिनेत्रियाँ काम कर रही हैं. आपको लगता है कि शादी-शुदा अभिनेत्रियों को लेकर बॉलीवुड की सोच बदली है? ऐसा नहीं है. शर्मीला टैगोर ने शादी के बाद कई फ़िल्में की. डिंपल कपाड़िया को लोगों ने शादी के बाद सागर में बहुत पसंद किया, रेखा जी ने हमेशा काम किया है. राखी, हेमा मालिनी, नूतन, तनुजा इन सबने काम किया. फिर बीच में ऐसा हुआ कि अभिनेत्रियों ने शादी के बाद ख़ुद ही काम करना छोड़ दिया. एक चलन सा बन गया था. पर अब शादी-शुदा अभिनेत्रियों ने फिर से काम करना शुरु कर दिया है तो लोग फिर से उन्हें स्वीकार करने लगे हैं. मुझे तो लगता है कि दर्शकों को कभी इस बात से समस्या नहीं रही. लोग तो रेखा जी को लेकर शायद ज़्यादा उत्सुक रहते हैं कि उन्होंने ख़ुद को कैसे मेनटेन किया है. माधुरी, जूही या काजोल को देखकर ज़्यादा उत्सुक रहते हैं कि माँ बनने के बावजूद वे फ़िल्मों में काम कर रही हैं, अच्छी दिख रही हैं. नई हीरोइनों को लेकर उतनी उत्सुकता नहीं होती. रेखा जी का ज़िक्र छिड़ा है. आपने कई फ़िल्में की हैं उनके साथ- दिल है तुम्हारा, कुड़ियों का है ज़माना, लज्जा. लोग बहुत कम जानते हैं उनके बारे में. जितनी दिलचस्पी आम लोगों को रेखा जी के बारे में रहती है, हम लोगों को भी उतनी ही दिलचस्पी रहती है. वो अपने मेकअप, अपनी लुक को लेकर बहुत सजग रहती हैं. आपको भी टिप्स देती रहेंगी अगर आपका मेक-अप वगैरह ख़राब हो. बहुत दिलचस्प शख़्सियत है, मज़ा आता है उनके साथ काम करके. आपकी नई फ़िल्म है ‘होप एंड ए लिटिल शुगर’. ऐसा क्या ख़ास था फ़िल्म में जो आपने हाँ कहा. फ़िल्म की कहानी बेहद ख़ूबसूरत लगी. निर्देशक तनुजा चंद्रा के साथ मैं पहले भी काम कर चुकी हूँ, तनुजा लेखक घराने से हैं - लेखक विक्रम चंद्रा उनके भाई हैं, अनुपमा चोपड़ा उनकी बहन है. तनुजा कई बेहतरीन फ़िल्मों की कहानियाँ लिख चुकी हैं. फ़िल्म होप एंड लिटिल शुगर अंग्रेज़ी में बनी है, निर्माता अमरीका के हैं, अंतरराष्ट्रीय स्तर की फ़िल्म में काम करने का मौका. यही सब सोचकर मैने फ़िल्म साइन की. फ़िल्म का थीम है कि अगर ज़िंदगी में आप उम्मीद हार जाएँ और थोड़ी सी भी मिठास न हो तो जीना मुश्किल हो जाता है. 9/11 के रूप में दुनिया का एक बड़ा हादसा हुआ था. फ़िल्म में मैं एक सिख लड़की हूं जिसका पति (विक्रम चटवाल) इस हादसे में मारा जाता है. बाद में मेरी दोस्ती एक मुस्लिम लड़के से हो जाती है. पर उस समय मुस्लिम समुदाय के प्रति लोगों का रवैया बदलने लगा था. शक के माहौल में एक मुस्लिम लड़के से मोहब्बत करना... इसी के इर्द-गिर्द घूमती है फ़िल्म. शूटिंग अमरीकी निर्माताओं के साथ न्यूयॉर्क में हुई. एक अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म की शूटिंग करना, अमरीकी वर्क कल्चर के हिसाब से... कितना अलग होता है बॉलीवुड की शूटिंग से?
अमरीकी निर्माताओं की देखरेख में शूटिंग का अनुभव अच्छा रहा. वे लोग अनुशासन का बहुत पालन करते हैं. हिंदुस्तान में हम लोग सबको कह-कह कर काम करवाते हैं- जैसे कल सुबह नौ बजे आ जाना, कल ये सीन होगा, गाड़ी आ जाएगी. लेकिन अमरीका में ऐसा नहीं था. वे लोग बाक़ायदा हर चीज़ टाइप करके लिखित में देते हैं. जैसे छह बजे आपको नींद से उठाया जाएगा, सात बजे गाड़ी आएगी, आठ बजे नाश्ता मिलेगा, नौ बजे मेक-अप वाले आएँगे, दस बजे सेट पर आना है, ये डॉयलॉग बोलने होंगे..डॉयलॉग की लिस्ट भी साथ ही मिल जाएगी. वो लोग कोई भी चीज़ चांस पर नहीं छोड़ते हैं. कहीं आप ग़लती से खो न जाएँ, तो फ़िल्म से जुड़े लोगों के फ़ोन नंबरों की लिस्ट भी दी जाती है. हिंदुस्तान में हम मानते हैं कि काम हो जाएगा, चल जाएगा. एक दूसरे पर भरोसा भी बहुत करते हैं. अमरीका में लोग आप पर बिल्कुल भी भरोसा नहीं करेंगे. होप एंड ए लिटिल शुगर में एक तरफ़ अनुपम खेर हैं जो अपने आप में लेजेंड हैं तो दूसरी ओर हीरो अमित सयाल हैं बिल्कुल नए हैं. दोनों के साथ काम करना कैसा रहा. हाँ ये तो मैने सोचा ही नहीं. फ़िल्म के शुरु में काफ़ी कॉमेडी वाले सीन हैं जो अनुपम जी ने बेहतरीन तरीक़े से किए हैं. बाद में जब फ़िल्म में उनके बेटे की मौत हो जाती है तो उस दर्द को भी पर्दे पर बख़ूबी उतारा है. फ़िल्म के हीरो अमित नए कलाकार हैं. हम लोगों ने फ़िल्म में उनकी काफ़ी मदद की, उनपर पूरा ध्यान दिया. अब फ़िल्म देखकर लगता है कि मदद नहीं करनी चाहिए थी. (हँसते हुए) हम लोगों को लग रहा है कि अमित ने कुछ ज़्यादा ही अच्छा काम कर दिया है. फ़िल्मों में जिस महिमा को लोगों ने देखा है- परदेस की गंगा, धड़कन की शीतल या दाग़- द फ़ायर की काजल हो- वो थोड़ी सी संवेदनशील है, हंसी मज़ाक करती है. असल ज़िंदगी में महिमा कैसी हैं? हाँ बिल्कुल ऐसी ही हूँ-संवेदनशील, मज़ाक़िया और बहुत घरेलू. मुझे घर में रहना बेहद पसंद है. |
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