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रविवार, 16 मार्च, 2008 को 17:46 GMT तक के समाचार
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'फ़िल्म का बनना अरेंज्ड मैरिज के जैसा'

तनुजा
तनुजा दुश्मन, संघर्ष और सुर जैसी फ़िल्में बना चुकी हैं
निर्देशक तनुजा चंद्रा की नई फ़िल्म 'होप एंड ए लिटिल शुगर' इन दिनों काफ़ी चर्चा में है. भारतीय निर्देशक और अमरीकी निर्माता वाली इस अंग्रेज़ी फ़िल्म का नाम तो दिलचस्प है ही इसके बनने के पीछे की कहानी और भी रोचक है.

निर्माता अमरीका में, निर्देशक भारत में- शूटिगं से पहले दोनों एक दूसरे से कभी नहीं मिले. सात समंदर पार इंटरनेट के ज़रिए प्री-प्रोडक्शन और संपादन का काम हुआ. तनुजा इस पूरे किस्से को अरेंज्ड मैरिज कहती हैं.

हाल में तनुजा अपनी फ़िल्म लेकर लंदन के एशियाई महिला फ़िल्म उत्सव में आईं. बीबीसी ने तनुजा चंद्रा से विशेष बातचीत की

आपकी नई फ़िल्म है होप एंड ए लिटिल शुगर.. क्या कहानी है?

फ़िल्म कुछ भारतीयों की कहानी बयां करती है जो न्यूयॉर्क में 9/11 के हमले के वक़्त वहाँ रहते थे. ये मुस्लिम-सिख प्रेमी कहानी है. फ़िल्म में दिखाया गया है कि जब अमरीका में 11 सितंबर 2001 को हमला हुआ था तो कैसे आम आदमी के दिल में नफ़रत और गुस्सा पनपने लगा- आप अपना दर्द बर्दशास्त नहीं कर सकते और चाहते हैं कि उन लोगों को दुनिया से मिटा दें जो आपकी नज़र में हमले के लिए ज़िम्मेदार है.

इसकी वजह से और भी नफ़रत पैदा होती है. फ़िल्म हिंसा के इस कुचक्र के ख़िलाफ़ संदेश देती है कि हिंसा से कोई फ़ायदा नहीं है.

इसे क्रॉसओवर फ़िल्म कहेंगी आप?

मैं इसे विश्व सिनेमा कहूँगी क्योंकि फ़िल्म अग्रेज़ी में है और किरदार भारतीय हैं, पृष्ठभूमि न्यूयॉर्क की है और दिल एक तरह से हिंदुस्तानी है. फ़िल्म में कुछ अमरीकी कलाकार भी हैं. निर्माण के हिसाब से ये पूर्व और पश्चिम का फ़्यूज़न है.

फ़िल्म का नाम बड़ा दिलचस्प है- होप एंड ए लिटिल शुगर.

हाँ. (हँसते हुए). एक बार जब मैं न्यूयॉर्क के हवाईअड्डे पर इमिग्रेशन विभाग में थी तो फ़िल्म का नाम पढ़कर अधिकारी के चेहरे पर भी मुस्कुराहट आ गई. इटली, कराची जहाँ भी मैं गई फ़िल्म का नाम सुनकर सबके चेहरे पर मुस्कान आ जाती है. दरअसल फ़िल्म में महिमा चौधरी का एक डॉयलॉग है कि ज़िंदगी में ऐसी कोई समस्या नहीं जिसे उम्मीद और थोड़ी सी मिठास के सहारे नहीं सुलझाया जा सकता. यानी दिल में कुछ उम्मीद हो कि बेहतर जीवन मिले और थोड़ी सी मिठास हो तो सब ठीक हो जाएगा. यही फ़िल्म का फ़लसफ़ा है.

फ़िल्म का स्टारकास्ट भी दिलचस्प है- महिमा पिछले कुछ सालों से फ़िल्म उद्योग में है. हीरो अमित सयाल बिल्कुल नए हैं जबकि अनुपम खेर वरिष्ठ कलाकार हैं. काम में मज़ा आया?

फ़िल्म में महिमा चौधरी, अनुपम खेर और अमित सयाल ने काम किया है

क्योंकि स्टारकास्ट का एक अजीब सा कॉम्बिनेशन है इसलिए दिलचस्प रहा. महिमा बहुत अच्छी अभिनेत्री हैं, अंडररेटिड हैं. एक तरह से ये महिमा की कमबैक फ़िल्म होगी.

फ़िल्म के हीरो नए हैं. मैने हमेशा ही नए कलाकारों के साथ काम करना पसंद किया है. अमित सयाल दिल्ली में थिएटर कलाकार थे. उनका ऑडिशन जब देखा तो एक अलग ही ठहराव था उनकी एक्टिंग में. नए कलाकार में अगर कुछ स्पार्क हो और निर्देशक उसे बाहर लाने में सफल रहे तो स्क्रीन पर कमाल की चीज़ देखने को मिलती है. दरअसल नए एक्टर से आप उम्मीद कुछ नहीं करते और बदले में बेहतरीन काम देखने को मिल जाए तो मज़ा आ जाता है. रही अनुपम खेर की बात तो काफ़ी समय से मन था उनके साथ काम करने का, बेहतरीन काम किया है उन्होंने.

फ़िल्म के निर्माता अमरीका के हैं, आप और आपकी टीम भारत में. सात समंदर पार का मामला था. तालमेल कैसे हुआ दोनों तरफ़ से.

सात समंदर पार
 अमरीका के दो निर्माताओं ने मुझे ई-मेल किया कि वे मेरी कहानी पर फ़िल्म बनाना चाहते हैं. हम एक दूसरे को जानते भी नहीं थे. इंटरनेट के ज़रिए फ़िल्म पर काम शुरू हुआ. पहली बार तब मिले जब हम शूटिंग के लिए न्यूयॉर्क गए. कुछ दिक्कतें भी हुईं. हमारा भारतीय क्रू जब नाराज़ हो जाता था तो हिंदी में अमरीकी क्रू की कभी-कभी बुराई करने लगते थे- स्कूली बच्चों के जैसे. पर कुल मिलाकर बहुत मज़ा आया

मेरे पास कहानी तैयार थी लेकिन आख़िरी क्षण में निर्माताओं ने हाथ खींच लिए. तब न्यूयॉर्क के दो अमरीकी निर्माताओं ने मुझे ईमेल किया कि वे ये फ़िल्म बनाना चाहते हैं- उन्होंने मेरी कहानी पढ़ी थी. मैं इन लोगों को जानती नहीं थी, वो मुझे जानते नहीं थे- कभी मुलाक़ात भी नहीं हुई थी. प्री-प्रोडक्शन का काम इंटरनेट के ज़रिए हुआ. पहली मुलाक़ात निर्माताओं से तब हुई जब हम शूटिंग के लिए न्यूयॉर्क पहुँचे. आधी टीम भारतीय थी और आधी अमरीकी.

कभी-कभी कम्यूनिकेशन गैप भी होता था. जब कभी हम लोग बहुत नाराज़ होते थे तो आपस में हिंदी में बात करने लगते थे और उनकी दिल भर के बुराई करते थे (हुँसते हुए). वो लोग समझ भी नहीं पाते थे कि हम क्या बात कर रहे हैं. लेकिन उनके पास ये सुविधा नहीं थी क्योंकि वो तो अंग्रेज़ी में ही बात कर सकते थे. कभी-कभी बच्चों के तरह बर्ताव करते थे हम. पर क्या है कि फ़िल्म बनाते समय माहौल इतना तनावपूर्ण हो जाता है कि उसमें थोड़ा हंसी मज़ाक हो जाए तो अच्छा रहता है.

पश्चिमी सिनेमा की सेंसेबिलेटी भारतीय सिनेमा से अलग होती है जिसमें मेलोड्रामा, नाच गाना सब होता है. अपनी अंग्रेज़ी फ़िल्म में इन दोनों का तालमेल बिठा पाना कितना मुश्किल था.

मुश्किल काम है. मेरी अमरीकी निर्माताओं के साथ कई बार बहस भी हो जाती थी. मुझे नहीं लगता कि अगर मैं किसी भावना को लाउड तरीके से दिखाऊँ तो वो ग़लत है या सतही है. हम हिंदुस्तानी लोग भावनाओं को ज़ाहिर कर देते हैं, अमरीकी शायद दबा कर रखते हैं. ये सांस्कृतिक मतभेद है- दोनों में कुछ भी ग़लत नहीं है. फ़िल्म के दौरान कई दृश्यों में अमरीकी निर्माताओं को लगता था कि एक्टर भावनाओं को लाउड तरीके से दिखा रहा है जबकि मेरा तर्क था कि अगर उस सीन में अभिनेता के किसी अपने की मौत हो गई है, तो वो अपनी भावनाओं को दबा कर नहीं रख सकता. अंत में जो निकल कर आया है उसमें कुछ बात मेरी रह गई और कुछ उनकी.

फ़िल्म को आप कराची भी लेकर गईं, फ़िल्म सिख-मुस्लिम प्रेम कहानी है. वहाँ क्या प्रतिक्रिया रही.

फ़िल्म को कराची फ़िल्म फ़ेस्टिवल में भी दिखाया जा चुका है

कराची जाकर मुझे सबसे अच्छा लगा. पारंपरिक तौर पर भारत-पाकिस्तान विरोधी खेमे में माने जाते हैं लेकिन मुझे वहाँ बहुत प्यार मिला. आज भी मुझे ई-मेल करते हैं- इतना प्यार कोई दुश्मन थोड़े ही दिखाएगा.

शुरु में मैं घबराई हुई थी. फ़िल्म में एक चरित्र दूसरे मुस्लिम चरित्र से नफ़रत करता है तो ज़ाहिर है कि वो कई तीखी बातें कहेगा. हो सकता है कि कुछ दर्शकों को अच्छा न लगे. लेकिन पाकिस्तानी दर्शक बहुत परिपक्व थे, वो समझ पा रहे थे कि ये फ़िल्म में एक व्यक्ति विशेष का नज़रिया है और फ़िल्म यही कहना चाहती है कि नफ़रत नहीं होनी चाहिए. वहाँ के वितरकों ने कहा कि वे इस फ़िल्म को ख़रीदना चाहते हैं. वे निर्माताओं से संपर्क में है.

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