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रूपहले पर्दे पर मुसलमानों की छवि | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
सिनेमा कई तरह के विषयों को समेटकर पर्दे तक लाता है और इसी बहाने समाज के कई वर्ग, जाति और संप्रदायों के बारे में भी एक छवि लोगों के बीच जानने-समझने के लिए उपलब्ध होती है. इसी छवि का एक दायरा है फ़िल्मों में मुसलमानों के चित्रण और उनके चरित्र, छवि गढ़ने से जुड़ा हुआ. और जब इस सवाल पर दिल्ली में फ़िल्म जगत के कुछ चुने नाम बातचीत करने बैठे तो एक बात पर लगभग सभी सहमत थे कि फ़िल्मों में मुसलमानों का चित्रण रूढ़िबद्ध धारणा के तहत किया जाता है और आज का मुस्लिम युवा वर्ग अपनेआप को उससे जोड़ नहीं पाता है. दिल्ली के जामिया मिलिया विश्वविद्यालय में चल रहे इस सेमिनार में भारत और फ़्रांस, दोनों ही देशों के फ़िल्म जगत के कुछ विचारशील चेहरे हिस्सा ले रहे हैं और इस मुद्दे पर बातचीत कर रहे हैं. ये दोनों ही देश अपनी अपनी तरह की फ़िल्में बनाने के लिए प्रसिद्ध हैं और दोनों जगह बनने वाली फ़िल्मों में मुसलमानों का अच्छा ख़ासा प्रतिनिधित्व रहा है. प्रसिद्ध फ़िल्म आलोचक ज़ियाऊस्सलाम ने कहा जहां मुसलमानों या अल्पसंख्यक वर्ग को अपने रूढ़िबद्ध चित्रण से खेद है वहीं यह भी जानना चाहिए कि फ़िल्म व्यक्ति विशेष की अपनी धारणा और सोच का भी द्योतक होता है और विषयनिष्ठ भी होता है. एक मुसलमान पात्र ज़ियाऊस्सलाम ने कहा कि बीच में हिंदी सिनेमा में काफ़ी ऐसी फ़िल्में आईं जिसमें मुसलमानों को जब खलनायक बनाना होता था तो उसे टोपी पहना देते, शेरवानी पहना देते हैं और पान खिला देते थे और फिर उनसे उर्दू भी बुलवाई जाती थी लेकिन जब उन्हें अच्छा दिखाया जाता है तो ऐसा कुछ करने की ज़रूरत महसूस नहीं की जाती है. फिर भी उन्होंने कहा कि चक दे इंडिया, डोर, इक़बाल जैसी फ़िल्मों से बहुत कुछ नया सामने आने लगा है और सकारात्मक पहलू उजागर हो रहे हैं. लेखक और फ़िल्म निर्माता पंकज बुटालिया ने कहा कि रूढ़िबद्ध धारणा सिर्फ़ मुसलमानों के लिए नहीं है बल्कि यह एक मानसिकता है जो हमारे समाज का हिस्सा है, इसमें महिलाओं को जिस प्रकार दिखाया जाता है वह भी इसी मानसिकता को दर्शाता है.
उन्होंने कहा कि उन्हें फ़िल्मों में मुसलमान तवायफ़ के पेश करने से परेशानी है, ज़ात और धर्म के नाम पर बांट कर फ़िल्म दो समुदायों के बीच दरार खड़ी करती है लेकिन ऐसा नहीं है कि बंटवारे के विषय पर या किसी और मुस्लिम विषय पर अच्छी फ़िल्म नहीं बनी है. उन्होंने फ़िल्म ‘गर्म हवा’ का हवाला देते हुए कहा कि इस फ़िल्म ने जितनी कामयाबी के साथ संवेदनशील विषय को पेश किया है वह एक मिसाल है. अपनी फ़िल्म ‘कारवां’ का ज़िक्र करते हुए बुटालिया ने कहा कि वह गर्म हवा का आधुनिक रूप है. कुछ हटकर... इस संदर्भ में सबीना किदवई ने श्याम बेनेगल की फ़िल्म ‘मम्मो’ और महेश भट्ट की फ़िल्म ‘ज़ख़्म’ का भी ज़िक्र किया जोकि रूढ़िबद्धता से अलग एक कोशिश है और इसमें मुसलमान होने का अहसास भी है. उन्होंने कहा कि बॉलीवुड में मुसलमानों की भागीदारी शुरू से काफ़ी रही है लेकिन विषय के तौर पर मुसलमानों का वस्तुनिष्ठ रूप पेश करने से हम चूक गए हैं. फ़्रांस के प्रसिद्ध लेखक अज़ोज़ बक़ाक़ ने कहा कि यूरोपीय देशों में सबसे ज़्यादा संख्या में मुसलमान फ़्रांस में हैं और उन्हें बहुत सारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है. संवैधानिक रूप से तो उन्हें सारे जनतांत्रिक अधिकार हैं कि जाति और धर्म के नाम कोई शोषण नहीं होना चाहिए लेकिन फ़्रांस का समाज इसके विपरीत है. 20 से भी अधिक किताबों के लेखक अज़ोज़ बक़ाक़ ने कहा कि उनकी सूरत, शक्ल से ही परहेज़ किया जाता है और यह सिर्फ़ मुसलमानों के साथ नहीं है बल्कि अफ़्रीकी नस्ल के लोगों के साथ भी यही रवैया अपनाया जाता है. उनके सामने हर तरह की परेशानियां होती हैं, एक मुसलमान होने के नाते इन से जूझना उनका भाग है. उनका कहना था कि इससे व्यक्तिगत रूप से वह रोज़ाना मज़बूती महसूस करते हैं लेकिन सब के साथ ऐसा नहीं होता.
जामिया मिलिया में तीन दिनों तक चलने वाले इस समारोह में फ़्रांस की पांच फ़िल्में भी दिखाई गईं जिसमें ईसाई फ़्रांस और दूसरे अल्पसंख्यक एक साथ रहना सीखने की कोशिश कर रहे हैं और इस दौरान जो परेशानी आती है वही फ़्रांस में मौजूद दो रुख़ेपन को दिखाती है. फ़्रांस के सिनेमा में और भारतीय सिनेमा में एक ख़ास बात समान यह है कि दोनों जगह मुसलमान सबसे बड़ा अल्पसंख्यक है. हॉलीवुड बॉलीवुड फ़िल्म के रूझान को बताते हुए पंकज बुटालिया ने कहा कि आज फ़िल्म निर्माता के सामने पैसा कमाना सबसे बड़ा उद्देश्य है, कुछ फ़िल्में जो किसी विचारधारा के तहत बनाई जाती है वह ज़्यादा कामयाब नहीं हो पाती हैं. उन्होंने कहा कि फ़िल्म हो, साहित्य या दूसरी कला हो हर जगह रूढ़िबद्धता है, अगर हॉलीवुड को देखें तो वहां दूसरे विश्वयुद्ध के बाद से बनने वाली बड़ी फ़िल्मों में जो मुख्य धारा है वह है कि कोई अमरीकी समाज दुश्मन है जो उनके सेटअप को नष्ट कर देना चाहता है. फ़िल्म की अर्थ-व्यवस्था पर ज़ियाऊस्सलाम ने कहा की हॉलीवुड में 9-11 पर करीब 15 फ़िल्में बनीं और सब चलीं लेकिन क्या अफ़्ग़ानिस्तान की दयनीय स्थिति पर भी कोई फ़िल्म बनाकर पैसा कमा सकता है. बॉलीवुड की फ़िल्मों के बारे में कहा कि वह ऐसी फ़िल्में बना रही है जिसे मध्यम शहरी वर्ग देख सके, बड़े-बड़े मल्टी सिनेमाप्लेक्स में जिसे दिखाया जा सके. ऐसी फ़िल्मों की भाषा भी हिंग्लिश हो चुकी है. मिसाल के तौर पर फ़िल्म का नाम चक दे इंडिया है न कि चक दे भारत है. उन्होंने कहा कि हमारी फ़िल्मों से कहीं न कहीं भारत गुम होता जा रहा है. पहले तो फ़िल्म के नाम और टायटल अंग्रेज़ी, हिंदी और उर्दू तीनों भाषा में होते थे, पहले उर्दू गई और अब तो हिंदी भी जाती दिख रही है. 24-26 मार्च के दौरान तीन दिन तक चलने वाले इस समारोह का आयोजन जामिया के फ़्रांसी और इतालवी भाषा विभाग और फ़्रांसीसी दूतावास ने किया था. | इससे जुड़ी ख़बरें फ़ारसी पढ़ाने के लिए फ़िल्मों का सहारा18 नवंबर, 2007 | मनोरंजन एक्सप्रेस ऐसे मत चक इंडिया!23 अगस्त, 2007 | मनोरंजन एक्सप्रेस नायिकाओं की भूमिका बदली, जगह नहीं02 अगस्त, 2007 | मनोरंजन एक्सप्रेस ये हम नहीं... एक तस्वीर14 अप्रैल, 2007 | मनोरंजन एक्सप्रेस 'क्या इसलिए, कि मैं एक मुसलमान हूँ'08 दिसंबर, 2006 | मनोरंजन एक्सप्रेस इस्लामी देशों के योगदान पर प्रदर्शनी13 मार्च, 2006 | मनोरंजन एक्सप्रेस | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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