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शनिवार, 22 मार्च, 2008 को 12:02 GMT तक के समाचार
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सुर कहीं, लय कहीं और ताल का पता नहीं
मन्ना डे
मन्ना डे ने कई बेमीसाल गाने गाए हैं
हिंदी फ़िल्मों के जाने माने पार्श्वगायक मन्ना डे को इस बात का बेहद अफ़सोस है कि आज की पीढ़ी के युवा गायक समृद्ध हिंदुस्तानी संगीत के बारे में कम जानते हैं.

हालांकि वे पूरी तरह नाउम्मीद नहीं है और सोनू निगम, शान, सुनिधि चौहान और श्रेया घोषाल की गायकी उन्हें पसंद है.

अपने पुराने सुरीले गानों के वीडियो रिलीज़ के लिए बंगलौर गए मन्ना डे ने कहा कि कई नवोदित गायकों को स्वर, लय और ताल की जानकारी नहीं है.

उन्होंने कहा कि इसके लिए ज़रूरी है कि नौजवान पीढ़ी संगीत के जानकारों से प्रशिक्षण प्राप्त करें और उनके मार्गदर्शन में काम करे.

मौजूदा दौर की हिंदी फ़िल्मों के संगीत के मुक़ाबले पचास और साठ के दशक को संगीत का स्वर्णिम समय मानने वाले मन्ना डे सत्तर के आरंभिक दशक के संगीत को दिलकश और सुमधुर बताते हैं.

वे महसूस करते हैं कि वर्ष 1998 से 2008 के दौरान संगीत के स्तर में गिरावट आई. “चोली के पीछे क्या है” जैसे गीतों ने 89 वर्षीय मन्ना डे को बेहद निराश किया.

इतनी अधिक उम्र में आज भी रोज़ाना दो घंटे रियाज़ करने वाले मन्ना डे की आशाएं अभी धूमिल नहीं हुई हैं.

वे कहते हैं, “संगीत अभी पूरी तरह ख़त्म नहीं हुआ है. नई पीढ़ी के युवा गायकों में हिंदुस्तानी संगीत के प्रति थोड़ी अज्ञानता है वरना सामान्य तौर पर कुछ ऐसे लोग भी हैं जो संगीत के मर्म को भलीभाँति जानते समझते हैं.”

प्रतिभा के धनी

ग़ुलाम भारत में गायकी के अपने सफ़र की शुरूआत करने वाले प्रबोध चंद्र डे यानि मन्ना डे को पहली बार वर्ष 1970 में एक बंगाली फ़िल्म में बेहतरीन पार्श्वगायन के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया था.

एक साल बाद ही वर्ष 1971 में "मेरा नाम जोकर" के लिए एक बार फिर उन्हें बेहतरीन पार्श्वगायक के राष्ट्रीय सम्मान से नवाज़ा गया.

मन्ना डे ने ' लागा चुनरी में दाग़, तू प्यार का सागर है ,ऐ मेरे प्यारे वतन जैसे सदाबहार और हरदिल अज़ीज गीत गाए हैं.

तभी तो महान गायक मोहम्मद रफ़ी ने एक बार कहा था, "आप मेरे गीत सुनते हैं, लेकिन मैं मन्ना डे को सुनता हूँ."

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