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'माध्यम से ज़्यादा ज़रूरी किरदार है' | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
सत्तर के दशक में गुलज़ार ने युवाओं पर 'मेरे अपने' नाम से एक फ़िल्म बनाई थी और उसमें शत्रुघ्न सिन्हा और डैनी के साथ विनोद खन्ना भी थे. तीन दशक बाद जब छोटे पर्दे की अभिनेत्री स्मृति ईरानी ने इसी नाम से टेलीविज़न शो बनने की योजना बनाई तो विनोद खन्ना उनकी पहली पसंद थे. छोटे पर्दे पर काम करने के बारे में पूछे जाने पर विनोद खन्ना कहते हैं कि माध्यम यानी छोटे या बड़े पर्दे से ज़्यादा ज़रूरी होता है सशक्त किरदार. सुनील दत्त की फ़िल्म 'मन का मीत' से करियर की शुरुआत करने वाले विनोद खन्ना के करियर और भविष्य की योजनाओं पर पत्रकार रामकिशोर पारचा ने उनसे बातचीत की. बड़े पर्दे पर अभिनय, फिर राजनीति और अब टेलीविज़न, इसका क्या मतलब है? यह पहला मौक़ा नहीं है जब मैं टेलीविज़न के लिए काम कर रहा हूँ. मुझे जो काम अच्छा लगता है, मैं उसे करने की कोशिश करता हूँ. फ़िल्मों में मैं अपने परिवार की तय शर्तों पर दो साल के लिए आया था. राजनीति में मैं अपनी मर्ज़ी से आया. जहाँ तक टेलीविज़न की बात है मुझे लगा कि ऐसी भूमिका मैंने नहीं की थी. आप फ़िल्मी दुनिया छोड़कर रजनीश आश्रम चले गए तो लोगों को निराश नहीं किया? हर आदमी ख़ुद को तलाशते हुए ख़ुद से कुछ सवालों के जवाब चाहता है. बचपन से अध्यात्म और शांति की खोज की इच्छा मुझमें रही है. वह एक यात्रा थी, जो मेरे गुरु के साथ पूरी हो गई. आपके लिए यह कैसा अनुभव था? मैं उसे कभी नही भूल सकता. मैं जिस वक़्त फ़िल्मों में आया वह राजेश खन्ना का दौर था. मैंने जो सीखा अपने आप सीखा. मैं अकेला था जो ग़रीब निर्माताओं के लिए आसानी से उपलब्ध था. लोग कहते थे कि जिसका कोई नहीं, उसका विनोद खन्ना है. आप खलनायकी के चेहरे को हटा कर हीरो बने थे, कितनी बड़ी चुनौती थी? प्राण साहब उस समय खलनायकी के सरताज थे. लोग अपने बच्चों को 'प्राण' नाम देने से डरते थे. भगवान का शुक्र है कि लोगों ने अपने बच्चों का नाम विनोद रखने में डर महसूस नहीं किया. आपके दोनों बेटे अक्षय और राहुल अब पूरी तरह से इंडस्ट्री में जम गए हैं? मैंने अक्षय को लेकर 'हिमालय पुत्र' बनाई थी. मैं खुश हूँ कि दोनों ने अपने हिसाब से अलग तरह की फिल्में की हैं. अक्षय की 'गाँधी माय फ़ादर' देखकर मैं हैरान हूँ. राहुल ने टीवी और फ़िल्म दोनों किए हैं. इस हिसाब से मैं एक संतुष्ट पिता हूँ. अब परिवार के पैकेज के रूप में फिल्में बन रही हैं. क्या आप अक्षय और राहुल के साथ कोई फ़िल्म बनाएँगे? ऐसी कोई स्क्रिप्ट होगी तो मैं जरूर करूँगा. मैं इस चलन में शौक के लिए शामिल नहीं होना चाहता. आप फ़िरोज ख़ान और गुलज़ार के पसंदीदा अभिनेता रहे हैं. मैं किसी का नाम नहीं लेना चाहता. मैंने हर बड़े निर्देशक के साथ काम किया है. मैं जब राज खोसला की 'मेरा गाँव मेरा देश' कर रहा था तो लोगों ने कहा कि डाकू की भूमिका मेरी अब तक की सर्वश्रेष्ठ भूमिका है. लोग कहतें हैं कि शोले इसी की रीमेक है. 'अचानक', 'परिचय', 'लेकिन', 'लीला', 'मीरा' और 'क़ुर्बानी' जैसी फ़िल्में मेरे लिए नए अनुभव की तरह थीं. अमिताभ 'ज़ंजीर' और 'दीवार' के बाद एंग्री यंग मैन बने. क्या आप मानते हैं कि आप पहले से ही ऐसी भूमिकाएँ निभा रहे थे? ऐसा लोग कहते हैं. निर्माताओं को जब भी गुस्सैले युवक की ज़रूरत होती थी तो उनके लिए तीन ही लोग थे. मैं, धर्मजी और दत्त साहब. मैंने डाकुओं पर बनने वाली 'कच्चे धागे', 'पत्थर और पायल', 'डाकू और जवान', 'आख़री डाकू' जैसी फिल्में कीं. कुछ लोगों का मानना है कि उस समय अमिताभ को टक्कर देने वाले अभिनेता सिर्फ़ आप ही थे और आप अचानक गायब हो गए. नहीं, मैंने उनके साथ 'अमर अकबर एन्थनी', ख़ून पसीना, परवरिश जैसी फिल्में कीं. वे मेरे लिए भी सर्वश्रेष्ठ फिल्में थी. मेरे लिए करियर से ज़्यादा मन की अहमियत है. लेकिन आपने राजनीति में जाने के बाद जब 'आवारापन' और 'रिस्क' से वापसी की तो वे नहीं चलीं? वे ग़लत प्रमोशन कि शिकार हो गईं. बदलते सिनेमा के साथ अब काम करने के मौक़े तो ज़्यादा हैं पर किसी चुनौती से कम नहीं. आपने राजनीति में आने के लिए बीजेपी चुनी और टेलीविज़न पर आए तो स्मृति का शो चुना. मैं और स्मृति एक पार्टी के ज़रूर हैं. राजनीति के लिए मेरा चुनाव क्षेत्र और संसद हैं. टेलीविज़न शो की शुरुआत मैंने 'महाराणा प्रताप' नाम के शो से ही कर दी थी पर संयोग से वो नहीं बना. अब कितनी फ़िल्में कर रहे हैं? सलमान के साथ एक फ़िल्म है और एक अंजुम रिज़वी के साथ 'फ़ास्ट फ़ॉरवर्ड कर रहा हूँ. आप बेटी के पिता भी हैं, क्या वह सिनेमा में काम कर सकती हैं? मैंने कभी किसी पर अपनी मर्ज़ी नहीं लादी. मेरे बच्चों ने हमेशा वही किया जो वे चाहते थे. मैं उनकी भावनाओं और सपनों का सम्मान करता हूँ. |
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