BBCHindi.com
अँग्रेज़ी- दक्षिण एशिया
उर्दू
बंगाली
नेपाली
तमिल
शुक्रवार, 04 जनवरी, 2008 को 12:37 GMT तक के समाचार
मित्र को भेजेंकहानी छापें
मुंबई की घटना का जवाब किसके पास?

महिलाओं के साथ बदसलूकी
महानगरो में महिलाओं का सुरक्षित नही होना ग्रामीण क्षेत्रो में और ख़राब स्थिति बयां करता है.
नया हर्ष, नया जोश, नया रंग, नई शुरुआत.....कुछ ऐसी ही उम्मीद लिए नए साल की कामना की जाती है. लेकिन भारत में नए साल की शुरुआत बहुत नाउम्मीदी के साथ और बहुत बदरंग हुई.

कहने को नया साल था पर इसका आगाज़ कुछ पिछले साल के ही जैसे पुराने अंदाज़ में हुआ- मुंबई एक बार फिर शर्मसार हुई.

नववर्ष समारोह के दौरान मुंबई के एक पांच सितारा होटल के बाहर पुरुषों की भीड़ ने दो महिलाओं के साथ बदसलूकी की. एक साल में जैसे कुछ नहीं बदला. वर्ष 2007 में भी मुंबई को कुछ यूँ ही शर्मिंदा होना पड़ा था.

क्यों, कैसे, कब हुआ इस पर बहस जारी है-कहीं दबे स्वरों में तो कहीं खुले-आम.

मीडिया में मामला गर्माया तो मुंबई पुलिस ने कहा ‘तिल का ताड़ न बनाओ’, हम हर आदमी के पीछे पुलिस तैनात नहीं कर सकते.

ज़ाहिर है सवाल उठ रहे हैं कि क्या क़ानून व्यवस्था बनाए रखना पुलिस का काम नहीं. सवाल उठना लाज़मी भी है.

लेकिन हर अपराध का ठीकरा पुलिस के सिर फोड़ कर क्या समाज का काम ख़त्म हो जाता है.

क्या यहाँ समाज को भी अपने गिरेबान में झाँकने की ज़रूरत नहीं. वो लोग जिन्होंने ये घिनौनी हरकत की वो इसी समाज का हिस्सा है, किसी परिवार के सदस्य हैं.

बहस हो रही है कि नैतिक मूल्यों का पतन हो रहा है. लेकिन ये नैतिक मूल्य आख़िर समाज और परिवार ही तो सिखाता हैं. या सिखाती है स्कूल-कॉलेज में मिलने वाली शिक्षा. कहीं तो कोई चूक ज़रूर हुई है.

'प्रगतिशील' भारत

कहने को तो भारत ख़ूब प्रगति कर रहा है, धनकुबेरों की संख्या बढ़ रही है, दुनिया भर में उसका डंका बज रहा है.

लेकिन क्या तरक़्की का पैमाना सिर्फ़ आर्थिक प्रगति है- खुली हवा में बेख़ौफ़ साँस ले पाना, सभ्य समाज में रहना- क्या ये तरक़्की में शामिल नहीं? क्या वाक़ई भारत ऐसी तरक़्की चाहता है?

जब कभी ऐसे मामले होते हैं, ख़ासकर शहरों में तो ऊंगली उठाने वाले महिलाओं के आचरण पर भी सवाल उठाते हैं. लेकिन मासूम नाबालिग बच्चियों से बलात्कार को क्या कहेंगे.

धनंजय चटर्जी ने 1990 में कोलकाता में एक नाबालिग लड़की के साथ बलात्कार करने के बाद उसकी हत्या कर दी थी. उसे 2004 में फाँसी दी गई.

जवाब किसके पास?

नए साल में मुंबई में हुई घटना समाज का एक नया चेहरा उजागर करती है- बदसलूकी, बलात्कार जैसे अपराध इस चेहरे के घिनौने रूप हैं.

ये घिनौना चेहरा अचानक सामने नहीं आया. 90 के दशक में कभी जेसिका लाल तो कभी प्रियदर्शिनी मट्टू बनकर इसने समाज को चेताने की कोशिश की तो नई सदी में निठारी बनकर ये चेहरा लोगों के सामने आया.

बात यहीं आकर नहीं रुकती- घरेलू हिंसा, कन्या भ्रूण हत्या, लिंग भेद इसी बीमारी के अलग-अलग लक्षण है.

ज़िम्मेदार कौन है और कौन इसे दुरुस्त करेगा- समाज, पुलिस, न्यायिक व्यवस्था...जवाब शायद सबको मिलकर ढूँढना होगा.

इससे जुड़ी ख़बरें
बदसलूकी मामले में कई हिरासत में
03 जनवरी, 2008 | भारत और पड़ोस
नए साल में महिलाओं के साथ बदसलूकी
02 जनवरी, 2008 | भारत और पड़ोस
पिटने को कौन जायज़ ठहरा सकता है?
20 अक्तूबर, 2007 | मनोरंजन एक्सप्रेस
बॉलीवुड में बढ़ रहा है महिलाओं का वर्चस्व
08 सितंबर, 2007 | मनोरंजन एक्सप्रेस
महिला किरदारों के पीछे पुरुष नज़रिया
06 मार्च, 2007 | मनोरंजन एक्सप्रेस
आँगन के पारःनारी शक्ति के कई अलग-अलग पहलू
20 जनवरी, 2007 | मनोरंजन एक्सप्रेस
सुर्ख़ियो में
मित्र को भेजेंकहानी छापें
मौसम|हम कौन हैं|हमारा पता|गोपनीयता|मदद चाहिए
BBC Copyright Logo^^ वापस ऊपर चलें
पहला पन्ना|भारत और पड़ोस|खेल की दुनिया|मनोरंजन एक्सप्रेस|आपकी राय|कुछ और जानिए
BBC News >> | BBC Sport >> | BBC Weather >> | BBC World Service >> | BBC Languages >>