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पिटने को कौन जायज़ ठहरा सकता है? | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
तीन फुट की औसत गहराई वाली एक नदी में पाँच फुट 11 इंच का एक आदमी डूब गया. यह आँकड़ों का खेल है. जो सांख्यिकी का या गणित का व्यावहारिक ज्ञान रखते हैं वह जानते हैं कि ऐसा हो सकता है. लेकिन इससे भ्रम भी पैदा किया जा सकता है. ऐसा ही एक भ्रम भारत सरकार के लिए किए गए एक सर्वेक्षण में पैदा किया गया है. नेशनल फ़ैमिली हेल्थ सर्वे-3 के नतीजे जारी किए गए हैं. इस सर्वेक्षण में बहुत से नतीजे निकाले गए. लेकिन जिसकी सबसे अधिक चर्चा हुई वह घरेलू हिंसा से जुड़ी हुई है. इसमें कहा गया है भारत में आधी से अधिक (54 प्रतिशत) महिलाओं को लगता है कि यदि उनका पति उनको पीटता है तो यह ठीक है. वहीं 51 प्रतिशत पुरुषों ने पत्नी की पिटाई को जायज़ ठहराया है. सर्वेक्षण के आँकड़े बताते हैं कि 41 प्रतिशत महिलाएँ मानती हैं कि सास-ससुर की ठीक देखभाल न करने पर पिटाई ठीक है. वहीं 35 प्रतिशत घर या बच्चों के समुचित देखभाल न होने पर पिटाई को जायज़ मानती हैं. सर्वेक्षण करने वालों का दावा है कि उन्होंने दिल्ली सहित 28 राज्यों में यह सर्वेक्षण किया है. समझ में नहीं आता कि ये कौन सी पत्नियाँ हैं तो पतियों के हाथों पिटने को जायज़ ठहराती हैं. भारतीय स्त्रियों की छवि आमतौर पर एक निरीह नारी की तरह पेश की जाती रही है जो सब कुछ सहती रहती है क्योंकि उसके पास कोई विकल्प नहीं है. यह बात एक हद तक सही भी है क्योंकि बड़ी संख्या में स्त्रियाँ बहुत कुछ सहती हैं. लेकिन यह कहना कि वे अपने ऊपर हो रहे अत्याचार को सही मानती हैं, गले उतरने वाली बात नहीं लगती. 18 एजेंसियों के इस सर्वेक्षण के बारे में कहा गया है कि लगभग सवा लाख महिलाओं ने 2005-06 में इसमें हिस्सा लिया. यानी यह इसी इक्कीसवीं सदी की बात है. इस सर्वेक्षण के प्रकाशन के बाद एक अख़बार ने राजस्थान के अलग-अलग शहरों की आठ सौ महिलाओं से पूछा कि इन आँकड़ों पर उनकी क्या राय है. और आश्चर्य नहीं कि सौ प्रतिशत महिलाओं ने कहा कि पति के हाथों पिटाई को जायज़ नहीं ठहराया जा सकता. उल्टे महिलाओं ने पूछा कि पिटाई पर तो जानवर भी नाराज़ हो जाते हैं तो ये कौन सी औरतें हैं जो पिटाई को ठीक बता रही हैं. इस सर्वेक्षण का ही एक आंकड़ा है कि 40 प्रतिशत भारतीय महिलाएँ कभी न कभी घरेलू हिंसा का शिकार होती हैं. यह भारत में घरेलू हिंसा की स्थित को दर्शाता है. भारत में घरेलू हिंसा है और चिंताजनक स्थिति में है यह स्वीकार करना तो ठीक है. लेकिन आधे से अधिक भारतीय महिलाएँ पिटने को ठीक बताती हैं यह मान लेना एक देश की छवि के लिए शर्मनाक ही नहीं आत्मघाती भी हो सकता है. यह आँकड़ा किसी भी देश को एक ऐसे युग की कहानी बयान करता है जो अब इतिहास का हिस्सा है. और जो लोग भारत को ठीक से जानते हैं वह यह भी जानते हैं कि यहाँ इतनी भयावह स्थिति कभी नहीं रही कि आधी महिलाएँ पिटने को अपनी नियति मानती हों. इस सर्वेक्षण को लेकर कई गंभीर सवाल उठते हैं. एक तो यह कि इसकी मंशा क्या है? क्या यह स्वयंसेवी संगठनों के चंदा उगाहने की मुहिम का हिस्सा है जिसमें भारत सरकार को जाने-अनजाने लपेट लिया गया है? या फिर यह आंकड़ेबाज़ों की अज्ञानता या अनुभवहीनता से उपजा एक भ्रम है? आँकड़े दिलचस्प होते हैं. कभी-कभी ख़तरनाक भी. ख़ासकर तब, जब कोई आँकड़ों के साथ अपनी मर्ज़ी से या किसी निहितस्वार्थ के कारण खेलना चाहता है. लगता तो है कि इस बार आँकड़ों से खेलकर भारत की छवि और भारत में महिलाओं की स्थिति पर संशय पैदा करने की कोशिशें हो रही हैं. ठीक है कि देश में स्त्री-पुरुष अनुपात की स्थिति चिंतनीय है. कन्याभ्रूण हत्या को लेकर स्थिति दयनीय होती जा रही है. लेकिन फिर भी हालात अभी क़ाबू से इतने बाहर नहीं हुए. सत्तारूढ़ गठबंधन का नेतृत्व किसी महिला के हाथ में होने से या फिर राष्ट्रपति का पद किसी महिला को दे देने भर से देश की छवि नहीं सुधर सकती. उसके लिए कई तरह के और साझा प्रयास करने होंगे. इसमे घरेलू हिंसा को रोकना भी शामिल है. लेकिन साथ में इस तरह के आँकड़ों से भ्रम पैदा करने से भी रोकना होगा. चाहे इसके पीछे स्वास्थ्य मंत्रालय हो या फिर कोई नामधारी अंतरराष्ट्रीय संस्था. |
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