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बुधवार, 26 दिसंबर, 2007 को 14:05 GMT तक के समाचार
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शेर किसी का, वाहवाही किसी को...

दिलीप कुमार और सायरा बानो
मशहूर फ़िल्म अभिनेता दिलीप कुमार को शेर सुनाने का शौक है
दिलीप कुमार उर्फ़ यूसुफ ख़ान, राज कपूर, देव आनंद और राजकुमार के ज़माने में ट्रेजिडी किंग कहे जाते थे.

हालांकि उनकी वे फ़िल्में भी कम अहम नहीं हैं जिनमें वह हँसते, मुस्कुराते और शरारतें करते नज़र आते हैं.

उनके समकालीनों में सिर्फ़ राजकुमार ही ऐसे अभिनेता थे जो स्क्रीन पर शेर इस तरह सुनाते थे कि मुश्किल से मुश्किल लफ़्जों वाले शेर पर भी सिनेमा हाल में लोग तालियाँ बजाते थे.

फ़िल्म ‘बुलंदी’ में डायरेक्टर इस्माईल श्रॉफ ने उनसे डाक्टर इक़बाल का एक शेर पढ़वाया था.

शेर था-ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले, ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है.

पार्टीशन के बाद भारत में फ़ारसी और अरबी की जगह भाषा में इलाक़ाई ज़ुबानों के लफ़्जों से तालमेल ज़्यादा बढ़ा है.

दिलीप कुमार और पृथ्वी राज कपूर की मुग़ले आज़म अब फ़िल्मों के संवादों में नज़र नहीं आती.

साहिर लुधियानवी ने फ़िल्मों की ज़ुबान में इसी तब्दीली के कारण अपने संग्रह में शामिल एक नज़्म को जब फ़िल्म ‘प्यासा’ का एक गीत बनाया तो किताब में नज़्म की लाइन सना ख़्वाने तकदीसे मशरिक़ कहाँ है (पश्चिम की पवित्रता के प्रशंसक) को 'जिन्हें नाज़ है हिंद पर वे कहाँ हैं' से बदल दिया.

फ़िल्म कला के साथ एक कारोबार भी है और हर कारोबार का पहला उसूल ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक पहुँचना होता है.

कारोबार का संबंध धार्मिक सीमाओं या भाषा-विवाद की रेखाओं से नहीं होता, समाज कैसे बदलता है, वह इस पर नहीं सोचता, समाज में किस समय क्या चलता है, वह इसको खोजता है.

राजकुमार अस्थमा के मरीज़ थे. मर्ज़ की इस मजबूरी को उन्होंने डायलॉग अदायगी का स्टाइल बना लिया था.

वह हर वाक्य को चबा-चबा कर और अपनी तरह से तोड़-तोड़ के बोलते थे.

उनके दर्शकों को उनका यह स्टाइल पसंद भी आता था. यही वजह थी कि ‘ख़ुदी’ और ‘रज़ा’ जैसे कठिन लफ़्जों के होते हुए भी, फ़िल्म में इक़बाल के शेर पर भी उन्होंने तालियाँ बजवा ली थीं.

फ़िल्म की लोकप्रियता ने इस शेर को भी लोकप्रिय बना दिया है.

अब यह आम बोलचाल में भी नज़र आता है और लोक सभा में भी बोला जाता है कि एक बार ममता बैनर्जी ने जब अपने बंगाली लहजे में ख़ुदी के ‘ख़’ के नीचे की और ‘रज़ा’ के ‘ज़’ के नीचे की बिंदियाँ निकाल कर जब लोक सभा में इसे दोहराया तो तालियों के शोर से पूरा हॉल गूंज उठा था.

राजकुमार की तरह दिलीप साहब का भी अपना बोलने का तरीका है.

रूक-रूक कर माथे पर एक साथ कई बल उभार कर, लफ़्जों को आवाज़ के उतार-चढ़ाव से संवार कर, जुमलों के बीच में थोड़ी-थोड़ी ख़ामोशियों को उतार कर वह अपने देखने और सुनने वालो को दीवाना बना देते थे.

किसी और को श्रेय

राजकुमार की तुलना में स्क्रीन पर तो उन्होंने बहुत कम शेर पढ़े हैं, लेकिन घरेलू महफ़िलों और मुशायरों के स्टेज पर उन्हें शेर सुनाते अक्सर सुना है.

मुंबई के एक मुशायरे की शुरुआत तो उन्हीं की पढ़ी हुई ग़ज़ल से हुई. उस ग़ज़ल के दो शेर आज भी ज़हन में हैं.

इस शान से वह आज पए-इम्तहाँ चले
कितनो ने पाँव चूम के पूछा कहाँ चले
जब मैं चलूँ तो साया भी मेरा न साथ दे
जब वह चलें, ज़मीन चले, आसमाँ चले.

दिलीप साहब की शुरू की तालीम उर्दू के अंजुमन हाईस्कूल बम्बई में हुई है.

उन्हें उर्दू शायरी से लगाव भी है. जोश, नज़ीर अकबराबादी, दाग़, और फैज़ उनके पसंदीदा शायर हैं जिनकी नज़्में और ग़ज़ले वह स्टेज से सुनाते नज़र आते हैं और सुनाने से पहले शायर का नाम भी ज़रूर बताते हैं.

लेकिन मुंबई के उस मुशायरे में जलील मानकपुरी की ग़ज़ल फैज़ के नाम से सुना गए.

दूसरे दिन हर भाषा के अख़बारों में फैज़ साहब ने जो लिखा नहीं था, वह उनके नाम से जुड़ गया और जलील मानकपुरी जिनके संकलन में यह ग़ज़ल मौजूद है, वह इस रचना से हाथ धो बैठे.

जलील मानकपुरी दाग़ देहलवी के समकालीन थे और दाग़ के बाद नवाब हैदराबाद के उस्ताद भी बनाए गए थे.

जलील के एक बेटे मुश्ताक जलीली मुंबई में फ़िल्म राइटर थे. कई फ़िल्मों के संवाद और पटकथा उन्हीं की क़लम का नतीजा है.

अख़बारों में जब उन्होंने अपने वालिद के साथ यह नाइंसाफ़ी देखी तो बहुत ग़ुस्से में आए लेकिन कुछ नहीं कर पाए, क्योंकि दिलीप साहब की शोहरत के मुक़ाबले में मुश्ताक जलीली की फ़िल्मी हैसियत कम थी.

इसलिए वह अपने बाप के साथ की गई नाइंसाफ़ी को इंसाफ़ में नहीं बदलवा सके. अदब में ऐसी ही नाइंसाफ़ियों की कई मिसालें मिलती हैं.

कभी किसी बड़ी घटना से किसी का शेर ऐसा चिपक जाता है कि इतिहास में वह इसी तरह के ग़लत नाम से जुड़ जाता है.

इसकी एक मिसाल आज़ादी की लड़ाई के क्राँतिकारी रामप्रसाद बिस्मिल है, उन्हें देशप्रेम के अपराध में अंग्रेज़ हुकूमत ने फाँसी दी थी.

फाँसी का फँदा गर्दन में डालने से पहले उन्होंने अंग्रेज़ राज को ललकारते हुए एक शेर पढ़ा था-

सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
देखना है ज़ोर कितना बाजू-ए-क़ातिल में है.

और यह पिछले कई वर्षों से उन्हीं के नाम से मशहूर है. रामप्रसाद भी शायर थे. बिस्मिल उनका तख़ल्लुस था.

लेकिन यह मतला उनका नहीं है. इसके शायर का नाम बिस्मिल अज़ीमावादी था. इसी ग़ज़ल का एक और शेर यूँ है.

वक़्त आने पर बता देंगे तुझे ए आसमाँ
हम अभी से क्या बताएँ क्या हमारे दिल में है.

बिस्मिल अज़ीमावादी की यह ग़ज़ल पहली बार जिस अख़बार में छपी थी उसकी कापी कलकत्ता की नेशनल लाइब्रेरी में महफ़ूज़ है.

ग़ज़ल के प्रतीक, बिंब और ख़याल परंपरागत शायरी जैसे हैं लेकिन रामप्रसाद जी की ट्रेजेडी ने इन प्रतीको, बिंबो और शब्दों को नए मानी पहना दिए.

अब इनका अर्थ वह नहीं है जो शायर के ख़यालों में था. ऐसे बहुत से शेर हैं जो होते हैं किसी के लेकिन उन्हें शोहरत मिलती है किसी और नाम से.

बहुत से शेर ऐसे भी हैं जो बोलचाल में तो शामिल होते हैं लेकिन वे हक़ीक़त में किस की क़लम का नतीजा है, यह मालूम नहीं होता, जाँ निसार अख़्तर अच्छे शायर और कई फ़िल्मों के नगमा निगार थे.

उनकी आख़िरी फ़िल्म कमाल अमरोही की रज़िया सुल्तान थी. फ़िल्म तो कामयाब नहीं हुई मगर उनका गीत, ऐ दिले नादाँ....आरज़ू क्या है, जुस्तुजू क्या है. ख़ैयाम की धुन में काफ़ी मशूहर हुआ.

वह मुज़तर खैरावादी के छोटे बेटे थे, मुज़तर का कोई दीवान नहीं छपा लेकिन उनके शेर अक्सर लोगों की ज़ुबान पर है.

काफ़ी समय पहले जाँ निसार अख़्तर ने एक ग़ज़ल के संबंध में, जो बहादुर शाह ज़फ़र के नाम से मंसूब थी, उसे मुज़तर की ग़ज़ल बताया है. ग़ज़ल का मतला है.

न किसी की आँख का नूर हूँ, न किसी के दिल का क़रार हूँ
जो किसी के काम न आ सके, मैं वो एक मुश्ते ग़ुबार हूँ.

यह ग़ज़ल ज़फ़र के संकलन में नहीं है.

जाँ निसार अख़्तर जब मुज़तर का संग्रह तैयार कर रहे थे तो उन्हें ग़ज़ल की डायरी में यह ग़ज़ल मिली थी, लेकिन इसके बावजूद पढ़ने वाले ग़ज़ल के मिज़ाज को ज़फ़र के इतिहास से जब जोड़कर देखते हैं तो उन्हें इसमें आख़िरी मुग़ल की हिकायत नज़र आती है.

यह मुज़तर की होते हुए ज़फ़र के नाम से मशहूर है.

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