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बुधवार, 14 नवंबर, 2007 को 11:48 GMT तक के समाचार
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ख़ुशी की उम्र-बचपन या जवानी

दीवाली
बचपन में त्योहार की ख़ुशियाँ कुछ और ही होती हैं
त्यौहार बच्चों के होते हैं. उनके लिए ऐसे अवसरों का अर्थ होता है-नए कपड़े, अच्छे जूते, सैर-सपाटा और मिठाइयाँ. वे इन त्यौहारों का पहले से इंतज़ार करते हैं. रात को देर से सोकर जल्दी जाग जाते हैं और ख़ुशियों का शोर मचाते हैं.

बचपन गुज़र जाने के बाद, बड़े इन त्यौहारों को छोटों की ख़ुशी के लिए मनाते हैं. वे इनमें शामिल होते हैं सिर्फ़ बच्चों के लिए. उन्हें ख़ुश देखकर मुस्कुराते हैं, उनकी ख़ुशी के लिए धन लुटाते हैं. उन्हें खुश करने के लिए नए-नए कपड़े बनवाते हैं. उम्दा किस्म की मिठाइयाँ लाते हैं.

सच पूछा जाए तो त्यौहार मनाने की दो ही उम्रें होती हैं, एक बचपन की उम्र और दूसरी वह उम्र जब लड़के को हर लड़की राजकुमारी और लड़की को अपनी उम्र का हर लड़का बनवारी नज़र आता है.

इन दो उम्रों के बीत जाने के बाद घर वाले अपने लिए कम घरवालों के लिए ज़्यादा जीते हैं. हक़ीकत में जीने वाली उम्रें यही दो उम्रें होती हैं.

इन्हीं उम्रों में जोश, उत्साह और साहस इतना होता है कि कोई काम मुश्किल नज़र नहीं आता. जब महान योद्धा नेपोलियन ने कहा था मेरे शब्दकोश में असंभव नाम का कोई शब्द नहीं है. तब उसके शरीर में जवानी की हसरत थी और उसमें दुनिया को जीत लेने की ताक़त थी और इन दोनों से दूर पुख्ता उम्र की हक़ीकत थी.

कहते हैं आदमी तब तक जवान रहता है जब तक दिल में अरमान रहता है. मलिका पुखराज ने भी हफीज़ जालंधरी का मशहूर गीत गाया था. जिसने कई वर्षों तक बुढापे की सरहद में दाखिल होने वालों का दिल बहलाया था. ‘अभी तो मैं जवान हूँ.’ इस पंक्ति में शब्द ‘अभी’ में जो गम छुपा है उसको विषय बनाकर एक शायर ने कहा था

क्या कहिए कितनी जल्दी जवानी गुजर गई
मैं सोचता रहा, किधर आई, किधर गई
मैं सिर्फ़ इसकी इतनी हक़ीकत समझ सका
इक लहर थी, जो आई, उठी और उतर गई.

जवानी के साथ बचपन को भी सुनहरी उम्र कहते हैं. वह इसलिए कि इस उम्र में ग़म और ख़ुशी के एहसास में अंतर का आभास नहीं होता. इस उम्र में समय एक जुट होता है. वह हिंदुस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान की तरह सरहदों में विभाजित नहीं होता. भविष्य, अंत और वर्तमान में इसके टुकड़े नहीं होते. सब कुछ वर्तमान होता है. जीवन आसान होता है.

बच्चों के छोटे हाथों को चाँद सितारे छूने दो
चार किताबें पढ़कर ये भी हम जैसे हो जाएँगे

बचपन, जवानी और बुढापे की सोचें भी उम्र के साथ बदलती रहती हैं. दुनिया वही रहती है. लेकिन एक ही दुनिया कभी रंगीन नज़र आती है, कभी हसीन नज़र आती है और कभी गमगीन नज़र आती है.

लेकिन भारतीय कल्चर में दो अवसर ऐसे भी हैं, जिसमें उम्रों का फ़र्क ख़त्म हो जाता है. हर उम्र का आदमी इन त्यौहारों में शरीक होता है. उम्रों का अंतर इन अवसरों में समाप्त हो जाता है. सारे के सारे एक ही उम्र में जीते हैं, हँसते हैं गाते हैं और जशन मनाते हैं.

उम्रों का फर्क ख़त्म करने वाले इस त्यौहार को हमारे देश में दीपावली कहा जाता है. चिरागों का त्योहार. रोशनी का संस्कार, उजालों का सत्कार. यह रोशनी असत्य पर सत्य की विजय की प्रतीक है. राम-रावण के युद्ध में रावण की पराजय यानि सच्चाई के हाथों बुराई का अंत इस जशन का मूल कारण है.

संसार में भले ही सच पर झूठ हावी हो जाए. संसार में भले ही अफ़ग़ानिस्तान और बग़दाद में आम जीवन रोए-चिल्लाए, संसार में भले ही गुजरात इंसानी ख़ून से नहलाया जाए, संसार में भले ही दिल्ली में गुरूनानक की बानी बेबसी के आँसू बहाए, संसार में भले ही सूफी मुइनुद्दीनचिश्ती की दरगाह पर बम उड़ाया जाए, लेकिन संसार में कही भी न्याय की पराजय या अन्याय की विजय को त्यौहार की तरह नहीं मनाया जाता.

अमरीका के राष्ट्रपति बुश भी ‘ईसा मसीह की क़ुर्बानी’ को याद करते हैं. ओसामा बिन लादेन भी अपने हर वक्तव्य को उसी खुदा के नाम से शुरू करते हैं जो रहमान (रहमत करने वाला) भी है और रहीम (रहम करने वाला) भी है.

गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी भी हर दीवाली में जनता के बीच आकर कई सरों वाले रावण का पुतला जलाते हैं, और असत्य पर सत्य की जीत का जशन मनाते हैं.

दीवाली और मुहर्रम दो ऐसी यादों से जुड़े हुए अवसर हैं जो छोटे-बड़े, ग़रीब-अमीर, सियासी गैर-सियासी, हिंदुत्ववादी, जेहादी सब एक साथ मिलकर सच्चाई का ध्वज लहराते हैं और संसार की अशांति में शांति की दुआओं के लिए हाथ उठाते हैं.

दीपावली और मुहर्रम दोनों के उद्देश्य ज़रूर एक से हैं, लेकिन फ़र्क केवल इतना है, मुहर्रम में हार को जीत के तौर पर मनाया जाता है और दीवाली में राम की जीत को बुराई की पराजय के तौर पर दर्शाया जाता है.

इन जशनों से एक बात तो सिद्ध होती है कि आदमी ऊपर से कुछ भी हो अंदर से वह झूठ की तुलना में सच के पक्ष में था. और हमेशा रहेगा और यही नाउम्मीदी के अंधेरों में रोशनी की किरण के समान है. रोशनी का स्वागत इंसान की फितरत है. और यही धरती पर आकाश की नेमत है.

आकाश की इस नेमत को ग़ालिब के युग में, ताजमहल के नगर के एक फक्कड़ शायर में बड़ी ख़ूबसूरती से याद किया है.

नज़ीर अकबराबादी हर आस्था को अपनी आस्था मानते थे, हर धर्म को अपने धर्म की तरह पहचानते थे, हर नेक बंदे को अपना दोस्त जानते थे...असत्य पर सत्य की जीत-दीवाली को उन्होंने अपनी कई कविताओं का विषय बनाया है.

उन्होंने अपने युग में राम को भी गाया था. रावण की हार पर भी दीप जलाया था और करबला में यज़ीद और हुसैन की जंग में हुसैन के कत्ल को ज़िंदगी की तरह अपनाया था...राम-रावण के युद्ध की तरह हुसैन और यज़ीद की लड़ाई भी इंसाफ़ और नाइंसाफ़ी की लड़ाई के समान थी.

जंग के फैसले मैदाँ में कहाँ होते है
जल तलक हाफिज़ा (स्मरण) बाकी है, अलम (जंग का निशान) बाकी है...

झूठ-सच के संघर्ष में नज़ीर की क़लम का जादू भी देखिए. नज़ीर सिर्फ़ दीवाली देखते नहीं थे इसमें शामिल भी होते थे.

हरेक मठ में जला फिर दिया दिवाली का,
हरेक तरफ़ को उजाला हुआ दिवाली का
अजब बहार का है दिन बना दिवाली का
मिठाइयों की दुकानें लगा के हलवाई,
पुकारते हैं कि लाला, दिवाली है आई
शगून पहले करो तुम ज़रा दिवाली का.

नज़ीर धरती से जुड़े रचनाकार थे. वह रोशनी के परस्तार थे. अपनी जवानी में किसी के हुस्न के गिरफ़्तार थे. बुढापे में हर आस्था के त्यौहार थे.

जो भी किया, किया न किया फिर किसी को क्या
दिल था हमारा, हमने दिया फिर किसी को क्या.

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