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नाइंसाफ़ी के मुक़ाबला औरत ही करे | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
औरत और मर्द का रिश्ता उतना ही पुराना है जितना पुराना ज़मीन के ऊपर आसमान है और आसमान के नीचे यह चलता फिरता जहान है. पावन बाइबिल में जब ख़ुदा ने मिट्टी से इन्सान बनाया और उसे जन्नत में बसाया तो उसे आदम (प्रथम मानव) के अकेलेपन पर तरस आया और उसके इस अकेलेपन को बहलाने के लिए फिर उसने जानवर और परिंदे मिट्टी से बनाए और उसे दिखाए...मगर इनमें से कोई भी उसके मन को सुकून नहीं दे पाया. तब ख़ुदा ने उसे गहरी नींद में सुलाकर उसकी पसलियों में से एक को निकाल कर उसे औरत का रुप दिया और उसे आदम का साथी बनाया. कुरान में भी ख़ुदा की बनाई हुई जन्नत में आदम के साथ उसकी पत्नी को भी दिखाया गया है वहीं से वे शैतान के बहकावे में आकर एक ग़लत दरख़्त का फल खाते हैं और इसके कारण स्वयं अपने को नंगे नज़र आते हैं और शरमाते हैं. इस अपराध की वजह से ही वे स्वर्ग से निकाले जाते हैं और आकाश से धरती पर आकर साथ-साथ दुनिया बसाते हैं. दुख सुख में दोनों साथ-साथ ही नज़र आते हैं. मैंने राजकपूर के बैनर की एक फ़िल्म ‘बीवी ओ बीवी’ में गाने लिखे थे, इसमें दो हीरो थे. रणधीर कपूर और संजीव कुमार. इसमें रणधीर कपूर कुँवारे थे जो अपने अधूरेपन को पूरा करने के लिए जगह-जगह भटकते हैं, किसी दुल्हन की तलाश में. इसमें एक गीत के बोल थे, जीवन गाड़ी के दोपहियों का यह सदियों पुराना संतुलन आज के संसार में थोड़ा बिगड़ता सा लगने लगा है. इस बिगाड़ में पुरुष प्रधान समाज की बनाई हुई मान्यताएँ हैं, जिनके अंतर्गत लड़का और लड़की की संख्या का अनुपात ख़तरे में पड़ता जा रहा है. इस खतरे की घंटी कई सालों से पंजाब, हरियाणा, उत्तरप्रदेश और गुजरात वग़ैरह में सुनाई दे रही है लेकिन सुनने वाले इसे सुनकर भी अनसुना किए जा रहे हैं और लड़कियों के जन्म को अपने और अपने परिवार के लिए अशुभ जानकर उसकी रोकथाम के नए-नए तरीके अपनाए जाते हैं उस रोकथाम के लिए कभी डॉक्टरों की मदद ली जाती है, कभी सुनी-सुनाई दवाइयों से पैदाइश से पहले ही इनकी हत्या कर दी जाती है और कभी पैदा होते ही उन्हें कूड़ेदानों में फेंक दिया जाता है और कभी गर्भ निरीक्षण कराके समय से पहले इन्हें कोख-मुक्त कर दिया जाता है. लड़की का समाज
कुछ दिन पहले एक सचित्र समाचार पढ़ने को मिला था इसमें, उदयपुर के एक तालाब में एक साथ कई नवजात कन्याओं के मृत शरीर तैरते दिखाए गए थे. यह उस प्रांत की दुख भरी कथा है जहाँ से मीरा बाई की कृष्ण भक्ति ने आध्यात्म को नए स्तर से परिचित कराया था और जहाँ आज भी जानवरों के शिकार को अपराध माना जाता है और अभिनेता सलमान खान को इस अपराध पर जेल में डाला जाता है. लेकिन उन परिवारों पर कोई दोष नहीं लगाया जाता जो कई ज़िंदगियों को सिर्फ़ इसलिए ख़त्म कर देते हैं कि वे मर्दों के संसार में नारी रूप में जन्म लेने वाली होती हैं. गर्भनिरीक्षण और गर्भपात आज मेडिकल साइंस की बड़ी कमाई का पेशा बनता जा रहा है. हीरों के नगर सूरत में इस धंधे की पहले कई दुकानें थीं, इनमें एक दुकान ऐसी थी जो उन कन्याओं का पालन-पोषण करती थी, जिन्हें माएँ जन्म देकर छोड़ जाती थीं. इस दुकान का मालिक बिना माओं की इन बच्चियों को थोड़ा बड़ा करके, फ़ोन पर ग्राहक तलाश करता था और जहाँ से अच्छा माल मिलता था वहाँ सौदा हो जाता था. वही बच्चियाँ जो अशुभ जानकर छोड़ दी जाती थीं, अनजाने घरों में शुभ मानी जाती थीं. ऐसी लड़कियों को दाम देकर खरीदने वाला न लड़की के धर्म से परिचित होता है न उसकी माँ की भाषा से वाकिफ़ होता है. वह जिस घर में जाती है, बड़ी होकर उसी घर के धर्म, संस्कार और भाषा की हो जाती है. वह जिस नाम से पुकारी जाती है वह भी उसी घर से मिलता है जिसमें वह आकर बसती है. मैंने इस विषय पर एक कविता लिखी थी, जो ऐसी ही एक बच्ची की ज़ुबानी है. उसकी अंतिम पंक्तियाँ यूँ है... कैसा शजरा (वंशावली) कहाँ के दीन धरम लड़का-लड़की में अंतर समाज के अज्ञान की देन है, परंतु इस अज्ञान के कारण दो समाज में असंतुलन पैदा हो रहा है वह भी कम चिंता जनक नहीं है. हरियाणा और पंजाब में इसके कारण जहाँ पुरुषों की संख्या हज़ार है वहाँ लड़कियों की मात्रा केवल 800 ( या इससे भी कम) तक ही पहुँचती है. 200 कन्याओं की कमी का मतलब है हर हज़ार पुरुषों में 200 पुरुषों का अविवाहित होना जो समाज और देश की सुख शांति के लिए ख़तरे का निशान है, जब भी कोई समस्या समाज में सर उठाती है वह हमेशा दो चेहरे लेकर सामने आती है, नकारात्मक तथा सकारात्मक. जैसे भारत में अंग्रेज़ी शासन, इस विदेशी शासन ने जहाँ बड़े पैमाने पर भारतवासियों का शोषण किया वहीं आधुनिक शिक्षा के माध्यम से इस शोषण से टकराने का बल भी दिया. आज़ादी की लड़ाई के संघर्ष में अंग्रेज़ी तालीम की रोशनी की साझेदारी से इनकार करना मुश्किल है. बदलाव नर-नारी के भेदभाव ने, जो संख्या के अनुपात में कमीबेशी की है उससे जहाँ एक तरफ अशांति बढ़ा दी है, मारकाट में इजाफ़ा हुआ है, दिशाहीनता ने नियम-क़ायदों को खंडित किया है वहाँ राजनीति की फैलाई गई धार्मिक और सांस्कृतिक जटिलताओं में थोड़ी नर्मियां भी जगाई हैं- भाषा, जाति, प्रांत की सीमाएँ जिन्हें राजनीति वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल करनी है, आप ही आप टूटती जा रही हैं. हरियाणा का जाट केरल जाकर दूसरी भाषा और कल्चर की लड़की को पत्नी बनाकर लाता है, और इस तरह हरियाणा के नए पैदा होने वाले बच्चों की भाषा और संस्कृति में वह शुद्धता नहीं नज़र आएगी जो उसे अलग प्रांत का दर्जा देने के लिए ज़रूरी थी. हरियाणा की तरह ही दूसरे प्रांतों में भी औरतों की कमी प्रांतीयता की हदें तोड़ती नज़र आती है. सामाजिक आदान-प्रदान की रिवायत, विभिन्न प्रांतों को एक जुट करने की प्राकृतिक कोशिश ज़रूर है. परंतु इस कोशिश का दायरा सीमित है, जब तक प्रकृति के काम को मानव अपने हाथ में नहीं लेगा, तब तक देश की एकता का दायरा बड़ा नहीं होगा, इसके लिए औरत के प्रति हमें अपने वर्षों पुराने दृष्टिकोण में तब्दीली करनी होगी और यह तब्दीली बिना शिक्षा के फैलाव के संभव नहीं है. शिक्षा को मदरसों और शिशुमंदिरों से आज़ाद कराके सरकार को अपने हाथ में लेना होगा. जब तक ऐसा नहीं होगा औरत यूँ ही संसार में अपमानित होती रहेंगी, शोषण का पात्र बनती रहेंगी, कभी पैदा होने से पूर्व तालाब में बहाई जाती रहेंगी, पैदा होने के बाद पति की अर्थी पर जलाई जाती रहेगी. इमराना की तरह सताई जाती रहेगी, मुल्लाओं के फ़तवों और पंडितों के आदेशों के चलते रोती चिल्लाती रहेंगी. स्त्री के प्रति नाइन्साफ़ी की इस आंधी के विरोध में स्वयं स्त्री को भी इंदिरा गाँधी, सरोजनी नायडू, इस्मत चुग़ताई, ज़ीनत महल आदि बनकर खड़ा होना होगा. मजाज़ लखनवी ने स्त्री की दुर्दशा को देखते हुए लिखा था, तेरे माथे पे यह आँचल बहुत ही ख़ूब है लेकिन |
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