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इंसानियत के शायर थे यगाना चंगेज़ी | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
मिर्ज़ा असदुल्लाह खाँ ग़ालिब अपने रंग-ढंग के अनोखे इंसान थे. उनका जन्म 27 दिसंबर, 1869 को हुआ था. वह बड़े शायर ही नहीं थे, उन्हें अपने बड़ेपन का एहसास भी था, लेकिन इस एहसास के बावजूद उन्हें अपने अलावा किसी दूसरे का शेर कम ही पसंद आता था, लेकिन कभी इत्तेफाक़ से ऐसा हो जाता था, तो उनकी प्रशंसा आगे पीछे की सारी हदों को फलांग जाती थी. मोमिन खाँ उनके समकालीन थे, उनकी ग़ज़ल में एक शेर है, तुम मिरे पास होते हो गोया मिर्ज़ा ने जब यह शेर सुना तो इसके बदले में अपना पूरा दीवान देने पर आमादा हो गए. मोमिन ने इस शेर में वही ख़्याल दोहराया गया है जो उनसे बहुत पहले कबीर दास के यहाँ मिल जाता है. कबीर की पंक्ति यूँ है, प्रेम गली अति साँकरी मगर मोमिन खाँ ने इसी बात को अपने शेर में नए अंदाज़ से पेश किया है. ग़ालिब बयान से अधिक अंदाज़-ए-बयाँ के कायल थे. उन्हीं का शेर है, हैं और भी दुनिया में सुखनवर बहुत अच्छे ग़ालिब तो मोमिन के एक ही शेर के परस्तार थे, मगर बीसवीं सदी के आख़िरी दौर के आलोचक नियाज़ फ़तहपुरी उनकी पूरी शायरी के गिरफ़्तार थे. उन्होंने कहा था, अगर इत्तेफाक़ से मेरे किताब घर में आग लग जाए, तो मैं जो एक किताब बचाने की कोशिश करूंगा, वह दीवान-ए-मोमिन (संकलन) होगी. किसी की पसंद-नापसंद पर चर्चा तो हो सकती है उस पर शक नहीं किया जा सकता. नियाज़ फ़तहपुरी अपने जमाने के एक साहित्यिक और मेयारी पत्रिका ‘निगार’ के संपादक थे. इसमें किसी कविता या लेख का प्रकाशन कवि-लेखक को पूरे देश में स्थापित कर देता था. मोमिन खाँ की शायरी को पसंद करने की वजह को नियाज़ के एक जुमले में तलाश किया जा सकता है. उन्होंने लिखा था, ‘‘मैं क़सम खा के कह सकता हूँ, मैंने ज़िंदगी में कोई बदशक्ल औरत नहीं देखी. इस जुमले में उनकी वह आशिक मिज़ाजी झलकती है जो मोमिन की शायरी की विशेषता है और जो ग़ालिब के यहाँ कम ही दिखाई देती है. ग़ालिब तो इश्क को दिमाग़ का ख़लल समझते थे, उनकी एक लाइन है...’ कहते हैं जिसको इश्क़ हर पसंद-नापसंद की अपनी कसौटी होती है, ज़रूरी नहीं जिस कसौटी को कोई अपना मेयार मानता हो, दूसरा भी उसी पर कस कर अपनी पसंद-नापसंद को पहचानता हो. 20वीं सदी को ग़ज़ल विधा की बुलंदी का दौर कहा जाता है. इस दौर के आसमान के सितारों में हसरत मोहानी, फानी बदायूँनी, असग़र गोंडवी, जिगर मुरादाबादी, फिराक़ गोरखपुरी और यगाना चंगेज़ी जैसे नाम शामिल है. अगर मुझे इनमें से किसी एक नाम के चयन के लिए मजबूर किया जाए तो मैं इनमें से जो नाम चुनूंगा...वह नाम यगाना चंगेज़ी होगा. इस चयन का मेरा अपना तर्क है, जो मेरा काव्य दृष्टिकोण भी है. मेरे ख़्याल से, जिस विधा का इतिहास अलाउद्दीन खिलजी से आज़ाद हिंदुस्तान के लंबे युग तक फैला हुआ हो, उसमें अच्छा शेर लिखना कठिन नहीं होता. अपना शेर कहना मुश्किल होता है. यगाना ने इस मुश्किल को जिस ज़हानत से आसान किया है वह ग़ज़ल का एक कारनामा है. यगाना की ग़ज़ल में यह अपनापन न केवल ग़ज़ल की भाषा में नज़र आता है, उन विषयों में भी जगमगाता है जो उन ग़ज़ल को समकालीनों में ही मुख़्तलिफ़ नहीं बनाता बल्कि आगे आने वाली ग़ज़ल को भी नया रास्ता दिखाता है. यगाना की ग़ज़ल का रिश्ता, न असग़र गोंडवी के अध्याय से है, न फ़ानी की मौत परस्ती से है, न जिगर की दूरियों की मोहब्बत से है, और न हसरत की कोठे पर नंगे पाँव आने की जवान शरारत में है. यगाना न इक़बाल की इस्लामी आस्थाओं के गिरफ़्तार हैं और न हाली के सिर्फ़ मुसलमानों के मार्गदर्शन से सरशार हैं. यगाना की शायरी का केंद्रीय पात्र वह इंसान है, जो भारत में आज़ादी की लड़ाई में भारतवासियों के उत्साह, संघर्ष और मर्दानगी के तेवरों से भरा हुआ है. वह किसी धर्म और इलाके में सीमित न होकर सारे इंसानों को अपनी बिरादरी का हिस्सा मानता है. ग़ज़ल के संसार में यगाना के इस इंसान का एक झलक देखते चलिए, कृष्ण का मैं हूँ पुजारी अली का बंदा हूँ सब तिरे सिवा काफ़िर आख़िर इसका मतलब क्या किधर चला है इधर एक रात बसता जा आज के पटना और कल के आज़ीमाबाद के उस्ताद शायर अज़ीमाबादी के शागिर्द यगाना चंगेज़ी की जीवन यात्रा यास से यगाना और फिर यगाना से चंगेज़ी बनने तक कठिनाइयों से भरा सफर है. यह सफ़र जो पटना से ‘यास’ के रूप में शुरू हुआ था. लखनऊ में समकालीनों की मुख़ालिफ़त के जवाब में यगाना (अद्वितीय) बना और फिर गुस्से में चंगेज़ी बन गया. यास से यगाना और यगाना से चंगेज़ी होने में वह कई मुसीबतों के दायरे में घिरे. घर से बेघर हुए, घरवालों ने साथ छोड़ा, यार दोस्तों ने मुँह मोड़ा, पेट भरने के लिए अपनी बड़ी लाइब्रेरी को कौड़ियों के मोल बेचना पड़ा...लेकिन इन सबके बावजूद न झूठ को सच बोला, न अपने शब्दों को दूसरों की तराजू में तौला, वह हार कर भी हार न मानने वाली शख्सियत थे. चित भी अपनी है पट भी अपनी है हार कर भी हार न मानने वाला यगाना (1884-1956) 72 वर्ष की उम्र में भले ही खामोश हो गया लेकिन उनकी शायरी में वह इंसानी आवाज़ आज भी बोलती नज़र आती है जो ग़ालिब और आतश के बाद तीसरी आवाज़ है जिसकी चमक दमक आधुनिक ग़ज़लों में नज़र आती है. यगाना के जीवन की तब्दीलियाँ रचनात्मकता में सहायक हुई हैं. उनमें तीन किरदारों का रोल ख़ासतौर से विशेष रहा है उनमें एक तो उनका मिज़ाज है जो उनके जींस से संबंधित है. दूसरा किरदार ग़ालिब का था जिसकी मुख़ालिफ़त उन्हें महंगी पड़ी और तीसरा किरदार नियाज़ फतहपुरी का था जिन्होंने एक निजी खत को दर्याआबादी के हवाले कर दिया और जो उनकी पत्रिका सिद्क़ में छपा. यगाना ने नियाज़ को हममिज़ाज समझा था और उन्होंने इस हममिज़ाजी को नकारने की ग़लती की. यगाना ने अपने पत्र में मज़हब और हज़रत मोहम्मद के ताअल्लुक से अपने कुछ सवाल पेश किए थे. इस निजी ख़त को जब पब्लिक बना दिया गया तो लखनऊ के मुसलमान उनसे नाराज़ हो गए और मुँह काला करके गधे पर बिठाकर उनका जुलूस निकाला गया. इस जुलूस में उनके मुँह पर थूका भी गया और गालियों से भी नवाज़ा गया. कोई बंदा इश्क़ का है कोई बंदा अक़्ल का |
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