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'वरदान' जिसे तिजारत बना दिया.. | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
इंसानों की दुनिया में इंसानों ने ईश्वर को खोज निकाला. इसलिए कि उसे एक तराजू की तरह इस्तेमाल किया जा सके. उसके माध्यम से अच्छाई-बुराई को तोला जा सके और यह बताया जा सके कि समाज में कौन सच के रास्ते पर चल रहा है और कौन झूठ के रास्ते में बदल रहा है. ईश्वर की खोज जंगल को बस्ती बनाने के लिए ज़रूरी थी, लेकिन समय के साथ इस एक ईश्वर को कई हिस्सों में बाँट दिया गया...ईश्वर के इस बँटवारे ने सारी धरती को कई-कई टुकड़ों में बाँट दिया. और फिर वही वरदान जो इंसान को इंसान बनाने के लिए आकाश से ज़मीन पर उतारा गया था...अलग-अलग दुकानों में सजाकर तिजारत बना दिया गया. तिजारत इस तिजारत ने वह मुसीबत फैलाई कि हज़ारों समाज फिर से बस्ती से निकलकर जंगल की ओर जाने लगे. भारत का विभाजन इसी ईश्वर के ग़लत इस्तेमाल का नतीजा था. जो आज़ादी से अब तक एक नासूर की तरह रिस रहा है और न जाने कब तक यूँ ही रिसता रहेगा. पहले एक ईश्वर को कई नामों से पुकारा जाता था. कोई उसे ख़ुदा के नाम से जानता था, तो कोई उसे गॉड के नाम से पहचानता था. लेकिन हर धर्म में उसके नाम भले ही अलग-अलग हों, वह हर रूप में भेदभाव की सीमाओं से दूर था. हिंदू धर्म में वह कण-कण में व्याप्त था, इस्लाम में वह तमाम आलमों का रखवाला था, बाइबल में जब प्रकाश को जागृत होने का आदेश दिया गया था तो वह रोशनी सारे संसार के लिए थी. नानक ने एक ही नूर से सारे जग के उपजने की सीख दी थी और कबीर दास ने उस तक पहुँचने के लिए ढ़ाई अक्षर प्रेम की सलाह दी थी. मुसीबत मगर इन सारे पावन ग्रंथों और महान आत्माओं की नसीहत पर तिजारत हावी होती गई और दुनिया जीने वालों के लिए मुसीबत होती गई. इस मुसीबत को किस्से कहानियों और कविताओं के रूप में वर्षों से शब्दबद्ध किया जा रहा है, मगर फिर भी यह मुसीबत कम होने का नाम नहीं ले रही. इन किस्से कहानियों और कविताओं के संसार में एक बड़ा नाम सिंधी भाषा के महान कवि-लेखक शेख़ आयाज़ का भी है. सआदत हसन मंटो की कहानी टोबा टेक सिंह के पागल की तरह वह भी धर्म के नाम पर खिंची गई इस लंबी-चौड़ी सरहद को नहीं मानते थे. वह सिंधी भाषा के संत कवि शाह अब्दुल लतीफ़ भटाई और सचल सरमस्त की परंपराओं के वारिस थे. वह सियासत की नफरतों में मुहब्बत की विरासतों के शायर थे, लेकिन मुहब्बत के इस मैदान में सियासत के ख़िलाफ़ वह अकेले नहीं थे. वह एक बड़े कारवाँ के राही थे. इस कारवाँ में उनके साथ वासुदेव निर्मल, अर्जुन साजिद, गोवर्धन, लक्ष्मण कोमल आदि भी शामिल थे. एक तरफ सियासत हिंदू को मुसलमान से जुदा कर रही थी, दूसरी तरफ मुहब्बत दोनों की मिलीजुली आवाज़ से पाकिस्तान की हुकूमत को ख़फ़ा कर रही थी. हुकूमत की नाराजगी का सबसे ज़्यादा निशाना शेख़ आयाज़ बने, क्योंकि उनकी मीठी रसीली आवाज़ और बाग़ियाना अंदाज़ ने उन्हें नई उम्र के नौजवानों का हीरो बना दिया था. शेख़ आयाज़ के एक मित्र कवि नारायण श्याम थे. वह भी सिंधी काव्य में आधुनिकता के बड़े नाम थे. विभाजन के बाद जब भेड़-बकरियों की तरह आबादी इधर से उधर हुई तो नारायण श्याम भी कराची छोड़ कर दिल्ली आकर बस गए. वह हिंदू बनकर भले ही भारत आ गए, लेकिन शेख़ आयाज़ के दोस्त के रूप में वह कभी उनके दिल से अलग नहीं हुए. सियासती नज़र सियासत की नज़र में शेख़ अयाज़ मुसलमान था और नारायण श्याम हिंदू. एक पाकिस्तानी था दूसरा हिंदुस्तानी. परंतु मुहब्बत की दृष्टि में न वह हिंदू थे न मुसलमान, दोनों इंसान थे. हिंद-पाक युद्ध के दौरान जब नार-ए-तलबीर अल्ला हो-अकबर और हर-हर महादेव का शोर गूँज रहा था-शेख़ अयाज़ अपने दिल्लीवासी दोस्त नारायण श्याम को संबोधित करते हुए लिख रहे थे... यह जो मैदाने जंग है-इसमें हूँ! शेख़ अयाज़ का संपूर्ण लेखन राजनीति के अंधेरों में प्रेम के प्रकाश की तलाश था. उनकी यह तलाश एक सिंधी नौजवानों के दिलों में समा रही थी और पाकिस्तानी हुकूमत को चौंका रही थी. धर्म के नाम पर बने देश में इस प्रकार के अधर्म के प्रवेश से वह बौखला रही थी और शेख़ आयाज़ को अपराधी ठहरा रही थी. शेख आवाज़ और नारायण श्याम की दोस्ती उस दृष्टिकोण को नकार रही थी, जो पाकिस्तान के निर्माण की बुनियाद था. पाकिस्तानी हुकूमत ने उन्हें गद्दार बनाकर जेल में डाल दिया था. जेल जाने का यह सिलसिला-पाकिस्तान के ही एक उर्दू शायर हबीब जालिब की तरह शेख़ अयाज़ की ज़िंदगी में लगातार चलता रहा. उनकी तहरीर और तकरीर पर पाबंदी लगा दी गई, उनकी किताबों पर प्रतिबंध लगा दिया गया, लेकिन मार्शल लॉ की हुकूमत उनकी राहों को रोक नहीं सकी. उनकी आवाज़ धार्मिक नफरतों में हमेशा मुहब्बत के गीत गाती रही, हैवानों को इंसान बनने का सबक पढ़ाती रही और हिंदुस्तान के कबीर और सिंध के शॉ गटाई की परंपरा को निभाती रही. लेखनी की टक्कर शेख आयाज़ के रूप में पहली बार लेखनी ने बंदूक, तोप और जेल की दीवारों से टक्कर ली थी. सिंधी भाषा के इतिहास में सूफ़ी शाह तलीफ़ ने जो तारीख़ बनाई थी शेख़ आयाज़ उस तारीख़ के अज़ीम किरदार थे. सर पर काँटों का ताज और साथ में समझ... शेख़ आयाज़ से मेरी मुलाक़ात पाकिस्तान में एक मुशायरे में हुई थी. मुशायरे से पहले, वह मुझे और पाकिस्तान के मशहूर शायर मुनीर नियाज़ी को मुशायरे के काबिल बनाने के लिए एक घर में ले गए थे. वह घर उनके हमपेशा एक वकील दोस्त का था. पाकिस्तान में शराब का परमिट सिर्फ़ हिंदुओं और दूसरे गैर-मुस्लिमों को दिया जाता था. मुसलमानों को जब शराब की ज़रूरत होती थी तो मुसलमान हिंदू का दरवाज़ा खटखटाता था और इस तरह अपने आपको होश से बेहोश बनाता था. जोश मलीहाबादी का शेर है... इंसाँ का ख़ून खूब पियो इज़्बे आम है उस रात शेख़ आयाज़ विभाजन के ख़िलाफ़ काफ़ी बोलते रहे. शेख़ आयाज़ बहुत अध्ययनशील कवि थे, वह एक साथ शाह लतीफ़, तुकाराम, मीराबाई, हाफिज़, ख़ैयाम, ख़लील जिब्रान, पुष्किन, बोदलियर, ग़ालिब आदि से प्रभावित थे. उनकी नज़र में इंसान की पहचान वही भगवान था...जो राम भी था, वाहे गुरु भी और रहमान भी था. शेख़ आयाज़ का एक दोहा है... ये सच इतनी ताक़त दे जकड़े हुए इ मन कूँ |
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