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रविवार, 26 अगस्त, 2007 को 21:52 GMT तक के समाचार
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‘बात जो दिल से निकलती है असर रखती है’

मदर टेरेसा पोप के साथ
ज़ी टीवी पर एक प्रोग्राम आता है सा-रे-गा-मा-प. आज कल यह प्रोग्राम पार्श्व गायक उदित नारायण के बेटे आदित्य नारायण पेश करते हैं. पहले इसको सोनू निगम और बाद में शान एंकर करते थे.

बहुत पहले की बात है. जब इस प्रोग्राम का निर्देशन गजेंद्र सिंह करते थे. उन्होंने इस प्रोग्राम के कुछ एपीसोड, आगरा में ताजमहल के बैक ग्राउंड में शूट किए थे... एक एपीसोड में मुझे 20वीं शताब्दी की किसी महान व्यक्तित्व पर बोलना था-मैंने बोलने के लिए, मदर टेरेसा का चयन किया था.

मैंने इस अवसर पर छोटे से भाषण में मदर टेरेसा पर लिखी अपनी कविता की कुछ पंक्तियाँ भी दोहराई थीं.

हर धूप में छाँव सी-हर सर पे दुआ सी
वह प्यास के मंदिर में-बरसात की मूरत थी
वह भूख की मस्जिद में-रोटी की इबादत थी
वह दर्द के गिरजा में-इंसान की ख़िदमत थी
रौशन थी अंधेरों में, वह माँ की निगाहों सी

शूटिंग के बाद मैं समय बिताने के लिए, ताजमहल के क़रीब बहती हुई यमुना के किनारे टहल रहा था. टहलते हुए अचानक मुझे महसूस हुआ, मैं काफ़ी देर से दो पंक्तियाँ गुनगुना रहा हूँ. ये पंक्तियाँ हिंदी के महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की थीं.

बाँधों न नाव इस ठाँव बंधु
पूछेगा सारा गाँव बंधु

मैंने अपने आपसे सवाल किया-ये दो पंक्तियाँ मैं बार-बार क्यों गुनगुना रहा था? इस प्रश्न का उत्तर सोचा तो मेरे ज़हन में मीर तक़ी मीर का एक शेर झिलमिलाने लगा...

चलना हो तो चमन को चलिए कहते हैं कि बहाराँ है
पात हरे हैं फूल खिले हैं कम कम बादो बाराँ है
(हवा-पानी)

निराली जी का देहांत 1962 में हुआ था और मीर उनके देहांत के 240 वर्ष पूर्व यानि 1722 में संसार में आए थे और 1810 में स्वर्गीय हुए. समय के इतने अंतराल के होते निराला के बाद मुझे फौरन मीर का शेर कैसे याद आ गया, इस गुत्थी को सुलझाने लगा तो कविता से संबंधित कई बातें सामने आईं.

पहली यह कि कविता विचार नहीं होती...क्योंकि इन दोनों ही कवियों की पंक्तियों में कोई बड़ा विवाद निहित नहीं है. दूसरी यह कि इन पंक्तियों में ऐसा क्या है जो आसानी से ये मेरे स्मरण का हिस्सा बन गईं, इन दोनों तथ्यों की जाँच परख की गई तो पता लगा...हर छंद की अपनी एक चलत होती है, इस चलत में शब्दों के चयन और उनकी खपत की अपनी लय होती है, हर शब्द, जो अक्षरों से बनता है, उनकी अपनी ध्वनियाँ भी होती हैं. शब्दों के चयन, शब्दों में शामिल अक्षरों की ध्वनियों और छंद की चलत जब एक स्वर में बैठ जाते हैं तो छोटा से छोटा विचार भी बड़ी कविता बन जाता है और इस प्रकार जब पंक्तियाँ ढलती हैं तो इसमें यादों में बस जाने की शक्ति आ जाती है. शेर बहुत कहे जाते हैं मगर इनमें कुछ ही शेर श्रोताओं या पाठकों की ज़बान पर चढ़ पाते हैं. ऐसा क्यों?

मीर के ही एक समकालीन सौदा थे, उनकी ग़ज़ल का एक शेर है,

सौदा जो तेरा हाल है, ऐसा तो नहीं वह
क्या जानिए तूने उसे किस आन में देखा

इस शेर की दूसरी पंक्ति में एक शब्द ‘आन’ है. आन का अर्थ पल, क्षण या लम्हा है. इस पंक्ति में ये समअर्थ शब्द आसानी से बिठाए जा सकते हैं. क्या जानिए तू ने उसे किस पल में देखा, पल की तरह ‘लम्हा’ को भी छंद में रखा जा सकता है- क्या जानिए तू ने उसे किस लम्हे में देखा, इसी तरह क्षण को भी इस्तेमाल किया जा सकता है, 'क्या जानिए तू ने उसे किस क्षण में देखा', लेकिन इन तीनों शब्दों में समअर्थी होने के बावजूद ‘आन’ से जो बात शेर में पैदा होती है वह इन शब्दों के उपयोग से नहीं पैदा होती. शब्द ‘आन’ में ‘आ’ और ‘न’ की आवाज़ों से छंद में जो सौंदर्य जागता है वह दूसरे शब्दों से नहीं जागता.

 आधुनिक युग में, छंद से दूरी, शब्दों की लयकारी को न पहचानने की मजबूरी, और दूसरों को सिखाने या समझाने की मजदूरी ने कविता को पूरी से अधूरी बना दिया है

अच्छा शेर केवल लिखने में ही नहीं पढ़ने की आसानी से भी अर्थ उत्पन्न करता है...कबीर, तुलसी, तुकाराम, मीर, ग़ालिब, रहीम के दोहे, अभंग या शेर इसी लिए कंठस्थ हो जा जाते हैं कि उनके शब्द, छंद के अनुसार मोम की तरह पिघलकर एक विशेष आकार में ढल जाते हैं, जिनमें कोई परिवर्तन संभव नहीं होता...

काव्य लेखन में इस तालमेल के लिए कबीर दास अनुभव की शर्त को आवश्यक मानते हैं... उनकी पंक्ति है- अनुभव गावे सो रागी है. यह अनुभव ही है जो शब्दों में गोलाइयाँ पैदा करता है, छंद में नर्माइयाँ पैदा करता है. सुनने वालों और पढ़ने वालों के स्मरण में अंगनाइयाँ पैदा करता है. वे सारे शेर, दोहे, अभंग या चौपाइयाँ जो मुहावरा बनकर ज़बान पर चढ़ जाते हैं उनमें यही कलाकारी दिखाई देती है.

हमारे युग में कविता में विचार को ज़रूरी समझा जाता है, मगर जो बात याद रखने की है उसे भुला दिया जाता है और वह यह है कि कविता, विज्ञान, इतिहास, अर्थशास्त्र, मनोविज्ञान या दर्शन से नहीं बनती, कविता स्कूल की टीचर या कॉलेज का अध्यापक नहीं होती-वह पाठकों या श्रोताओं को स्टूडेंट्स की तरह कुछ सिखाती नहीं...वह तो केवल उस विस्मय को दर्शाती है जो बच्चों की आँखों में नज़र आता है, उस आनंद को जगाती है जो मुस्कुराते फूलों को देखकर मन में जगमगाता है, मानव के अंदर छिपी उस इंसानियत को गुदगदाती है जो संसार को जीने के योग्य बनाती है...दूसरे शब्दों में यूँ कहा जा सकता है कि कविता देखे हुए को नहीं दिखाती, देखे हुए में जो अनदेखा होता है उसे दर्शाती है.

आधुनिक युग में, छंद से दूरी, शब्दों की लयकारी को न पहचानने की मजबूरी, और दूसरों को सिखाने या समझाने की मजदूरी ने कविता को पूरी से अधूरी बना दिया है. आधुनिक कविता विशेषकर छंदमुक्त, को पढ़ने या सुनने के बाद, कविता का केवल भाव जेहन में रहता है, उसकी पंक्तियाँ याद नहीं रहतीं...12वीं सदी के बाबा फ़रीद का दोहा अब तक लोगों की ज़बान पर है

कागा सब तन खाइयो, चुन-चुन खइयो मास
दो नैना मत खाइयो, पिया मिलन की आस

बीसवीं शताब्दी के रघुपति सहाय फ़िराक का शेर जिस पर आचार्य रजनीश का एक पूरा डिसकोर्स है वह यूँ है

मुद्दतें गुजरीं तेरी याद भी आई न हमें
और हम भूल गए हों, तुझे ऐसा भी नहीं

इन शेरो और दोहों के याद करने के पीछे वही चमत्कार काम कर रहा होता है जो एक पंक्ति में यूँ कहा जा सकता है...‘बात जो दिल से निकलती है असर रखती है’

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