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बुधवार, 07 नवंबर, 2007 को 15:24 GMT तक के समाचार
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मैं पल दो पल का शायर हूँ...
कैफ़ी आज़मी
कैफ़ी आज़मी के नाम से ट्रेन भी चलाई जा चुकी है
वक़्त के साथ हमारी तहज़ीब के चेहरे भी बदलते हैं.

पहले आबादी कम थी, अब ज़्यादा है. बढ़ती हुई जनसंख्या के साथ बाज़ार भी फैला है. फ़ैलते बाज़ार ने अपने मैयार और संस्कार में तब्दीलियाँ पैदा की हैं.

इन तब्दीलियों में विज्ञान के नए-नए आविष्कारों का भी अपना रोल काम का रहा है. टेलीफ़ोन की सुविधा ने ख़तो-किताबत की रस्म को कम कर दिया, टीवी चैनलों ने पढ़ने को कम करके देखने पर अधिक ज़ोर दिया.

यातायात के तेज़ रफ़्तार साधनों ने किसी दृश्य या नज़ारों से जुड़ने की परंपरा को समाप्त कर दिया. फ़ासलों का आकर्षण नज़दीकियों की बोरियत में ढल रहा है. इस बोरियत ने जीवन के मूल्यों पर हमारे विश्वासों को ही समाप्त नही किया, इस समापन को दर्शन का रूप भी दे दिया.

अस्तित्ववादी सोच ने जीवन में निरंतरता को क्षणिकता में बदल दिया. नस्ल-दर-नस्ल चलने वाला जीवन अब क्षणों का हिसाब-किताब बन गया है.

आज बड़े-बड़े पावन ग्रंथ, जो पहले मानव आचरण में नज़र आते थे, नेताओं की बाज़ारी राजनीति में जगमगाते हैं. इन परिवर्तनों ने हमारी तहज़ीब को जो रूप दिया है उसमें क्रिकेट का बल्ला, फ़िल्म अभिनेता का चेहरा, गायक की आवाज़ और राजनेताओं के अल्फाज़ ही ज़्यादा हावी नज़र आते हैं.

बाज़ार की माया

बाज़ार में जो चीज़ अधिक बिकती है वही हर जगह दिखती है.

पहले ग़ालिब की ग़ज़ल अपने पैरों से चलती थी. निरालाजी की कविता को देश में घूमने-फिरने में किसी सहारे की ज़रूरत नहीं पड़ती थी. कबीर छोटी संगतों से निकलकर आप ही आप बड़ी सोहबतों में पहुँच जाते थे. लेकिन आज मामला दूसरा है. ग़ालिब की गज़ल को जगजीत सिंह की गायकी या नसीरुद्दीन शाह के अभिनय की ज़रूरत पड़ती है और हरिवंश राय बच्चन को याद कराने के लिए अमिताभ बच्चन को सामने आना पड़ता है. क़ैफ़ी आज़मी को मनवाने के लिए शबना आज़मी को अपनी फ़िल्मी शोहरत को काम में लाना पड़ता है.

 लता मंगेशकर ने एक बयान दिया था. मेरा हमेशा से सपना रहा है कि मैं अटल जी की रचनाएँ गाऊँ. परंतु सपने के हकीक़त बनने की मुद्दत में सरकार बदल गई और फिर लताजी भी अपने सपने को भूल गईं. अटल जी की तरह पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह भी कवि हैं. लेकिन उनके शासनकाल की अवधि थोड़ी कम थी वरना उनकी रचनाओं को गाने के सपने भी कई गायकों की आवाज़ों में साकार हो जाते

बच्चन जी के साथ ही नागार्जुन और शिवमंगल सिंह सुमन परलोक सिधारे थे लेकिन सहारा परिवार को अमिताभ के कारण सिर्फ़ बच्चन जी ही याद आए. क़ैफी आजमी के आगे-पीछे उनके कई और महत्वपूर्ण समकालीन ज़िंदगी की लड़ाई हारे थे लेकिन रेल मंत्रालय ने शबाना के कारण क़ैफ़ी की याद में ‘कैफ़ियत’ नाम से ट्रेन चलाई.

सिनेमा के साथ राजनीति का प्रभाव भी साहित्य पर कुछ कम नहीं है. मेरे घर की एक दीवार पर साउथ एशियन साहित्यिक रिकार्डिंग का एक सचित्र बोर्ड लटका है. इसमें भारत, पाकिस्तान और बंगलादेश की विभिन्न भाषाओं के जाने-माने साहित्यकारों की तस्वीरें हैं. इन सारे साहित्यकारों की आवाज़ में उनकी रचनाओं की रिकार्डिंग अमरीका की एक सांस्कृतिक संस्था ने की थी.

इन साहित्यकारों में सबसे ऊपर की क़तार में अटल बिहारी वाजपेयी विराजमान हैं. यह प्रोजेक्ट उस समय का था जब अटल जी प्रधानमंत्री थे और उनकी परंपरागत कविताएँ, मंचीय होने के बावजूद पाकिस्तान में अनूदित भी हो रही थी और हिंदुस्तान में ग़ज़ल गायक जगजीत सिंह इन कविताओं की पूरी सोलो सीडी बना रहे थे. उन्हीं दिनों लता मंगेशकर ने एक बयान दिया था. मेरा हमेशा से सपना रहा है कि मैं अटल जी की रचनाएँ गाऊँ. परंतु सपने के हकीक़त बनने की मुद्दत में सरकार बदल गई और फिर लताजी भी अपने सपने को भूल गईं. अटल जी की तरह पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह भी कवि हैं. लेकिन उनके शासनकाल की अवधि थोड़ी कम थी वरना उनकी रचनाओं को गाने के सपने भी कई गायकों की आवाज़ों में साकार हो जाते.

कैफ़ी और जाफ़री

ई-टीवी के उर्दू चैनल पर शबाना ने अपने पिता कैफ़ी आज़मी की याद में एक प्रोग्राम किया था, इसमें कई गायकों ने उनकी ग़ज़ले गाईं. कई अभिनेताओं ने उनके संबंध में अपने विचार व्यक्त किए. उस आयोजन में किसी साहित्यकार को आमंत्रित नहीं किया गया था. इस आयोजन से पहले जुहू के इलाक़े में एक पार्क उनके नाम हो चुका था. इससे पहले उत्तरप्रदेश में एक ट्रेन उनके नाम की जा चुकी थी.

ज्ञानपीठ विजेता सरदार जाफ़री की विधवा सुल्ताना जाफ़री भी इस आयोजन में थीं. वह साहित्य और फ़िल्म के इस गठजोड़ पर अचानक भड़क उठीं और कहा, "भई कैफ़ी अच्छे शायर थे, मगर यह अच्छाई इतनी भी नहीं है कि वह सरदार जैसे बड़े लेखक को छुपा दे." वे वही सुल्ताना जाफ़री थीं जो सरदार जाफरी की एक मशहूर नज़्म में नज़र आती हैं.

नज़्म का उन्वाव 'मेरा सफ़र है' और उस नज़्म का एक हिस्सा यूँ है,

लेकिन मैं यहाँ फिर आऊँगा
और सारा ज़माना देखेगा
हर क़िस्सा मेरा अफ़साना है
हर आशिक़ है सरदार यहाँ
हर माशूक़ा सुल्ताना है

सुल्ताना जाफ़री, सरदार जाफ़री की माशूका बनने से पहले, किसी दूसरे घर की ज़ीनत थीं, लेकिन उनके दिल में अपने ज़माने के मशहूर तरक्की पसंद शायर और तकरीर करने वाले नौजवान सरदार की मुहब्बत थी और इस मुहब्बत ने एक बेटी की माँ को शादी-शुदा शरीअत को अपनी बग़ावत बनाने पर मजबूर कर दिया.

सरदार से उनके दो बेटे हुए, नाज़िम और हिकमत. इन बेटों के नाम सरदार के पसंदीदा शायरों में से एक शायर के एक नाम को दो हिस्सों में बाँट कर रखे गए थे. सरदार हिंदुस्तान के ग़ालिब और कबीर के साथ तुर्की के नाज़िम हिकमत के भी आशिक थे.

सरदार ने बहुत लिखा. उन्होंने कई विधाओं और स्टाइल में लिखा. वह आलोचक भी थे. अच्छे फ़िल्मसाज़ भी थे. प्रभावशाली वक़्ता भी थे और उनके साथ 99 शायरी के संकलनों के शायर भी थे. इनमें ‘परवाज़’ (1944), ‘जम्हूर’ (1946), ‘नई दुनिया को सलाम’ (1947), ‘ख़ूब की लकीर’ (1949), ‘अम्मन का सितारा’ (1950), ‘एशिया जाग उठा’ (1950), ‘पत्थर की दीवार’ (1953), ‘एक ख़्वाब और (1965) पैराहने शरर (1966), ‘लहु पुकारता है’ (1978) हैं.

सरदार अब हमारी दुनिया में नहीं है. लेकिन उन्होंने अपनी नज़्म 'मेरा सफ़र' में फ़ारसी के शायर रूमी के एक मिसरे के ज़रीए जीवन की मौत पर विजय की बात कही है.

अली सरदार जाफ़री
सरदार जाफ़री ने नए शब्दों और विचारों के साथ रचनाएँ कीं

उन्होंने भी पेशनगोई की थी...लेकिन मैं यहाँ फिर आऊँगा...अगर यह सही है तो मैं उन्हें फिर इस संसार में आने से पहले एक मशवरा ज़रूर देना चाहूँगा. वह इस संसार में इस बार आएँ तो अपने बेटों को तुर्की के शायर नाम देने के बजाए फ़िल्म एक्टरों या क्रिकेटरों के नामों में से नाम चुनें, नहीं तो बाज़ार की तराज़ू में उनका सही वज़न नहीं नापा जाएगा.

यह हक़ीक़त है कि सन् 1935-36 में शायरों की जो नस्ल टैगौर, फिराक़, प्रेमचंद्र या और जोश की वारिस बन कर आई थी, उसमें अपनी शैली शब्दावली और विचारों के लिहाज़ से दो नाम ही रौशन नज़र आते हैं. इनमें एक फ़ैज़ थे दूसरे सरदार जाफ़री थे.

जाफ़री की शायरी की भाषा का बड़ा हिस्सा ईरान के उस असर से आज़ाद है, जिससे उर्दू शायरी का बड़ा हिस्सा बोझिल है, उनके यहाँ ऐसी पंक्तियाँ जैसे, 'गाय के थन से निकलती है चमकती चाँदी', 'धुएँ से काले तवे भी चिंगारियों के होठो से हँस रहे हैं' या 'इमलियों के पत्तों पर धूप पर सुखाती है' आदि शायरी में नए लहजे की पहचान कराते हैं.

सरदार के तो दो बेटे थे. साहिर ने तो कालेज के दिनों में हुए इश्क के ग़म में शादी ही नहीं की. उनकी आख़िरी किताब ‘आओ कि ख़्वाब बुनें’ में एक नज़्म अमृता प्रीतम के नाम भी है. साहिर की विरासत में सिवाए ‘परछाइयाँ’ नाम की एक इमारत के कोई नहीं है. यह इमारत भी अब हुकूमत के सुपुर्द है. अगर उनके वारिसों में कोई एक्टर या एक्ट्रेस होते तो उनकी क़ब्र बम्बई के क़ब्रिस्तान में निशान से बेनिशान नहीं होती.

मैं पल दो पल का शायर हूँ. पल दो पल मेरा फ़साना है.

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