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चीनू मोदी और उनका इरशादनामा... | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
ग़ज़ल केवल एक काव्य विधा नहीं है, यह उस संस्कृति या कल्चर को परिभाषित करती है जो गतिशील है और जो पल-पल बदलता रहता है. विश्व-साहित्य में यह एक मात्र अकेली विधा है जो महात्मा बुद्ध की मूर्ति की तरह जहाँ भी आती है अपने रूप-रंग, नैन-नक्श से वहीं की बन जाती है. ऐतिहासिक दृष्टि से यह विधा पहले अरब के रेगिस्तानों में इठलाई, वहाँ से चलकर ईरान के गुलिस्तान में लहराई और फिर भारत के मैदानों में आई. भारत में इसकी आमद के हल्के, गहरे निशानात तो पहले भी मिल जाते हैं, लेकिन हिंदुस्तानी ज़ुबान में इसके पूरे दीदार अल्लाउद्दीन ख़िलजी के दौर में चिश्तिया सिलसिले के सूफी हज़रत निज़ामुद्दीन की ख़ानकाह में होते है. वहाँ सूफी निज़ामुद्दीन के शार्गिद अमीर खुसरो से जब उसकी मुलाक़ात होती है तो उसके हुस्न और कशिश ने उन्हें उसका गिरफ्तार बना दिया. खुसरो की आँखों ने देखा ग़ज़ल की पेशानी पर ज़ोरस्टर का नूर था, दिल में गीता थी, हाथों में क़ुरान था और उसका नाम आज के संविधान की तरह सेक्यूलर हिंदुस्तान था. यह ग़ज़ल अपनी चाल से रिंदाना, जमाल से आशिक़ाना और कमाल से सूफ़ियाना रही है. उसकी यही इंसानियत ही उसकी मक़बूलियत की ज़मानत है. ग़ज़ल की ज़ुबान ग़ज़ल अब सिर्फ एक ज़ुबान तक सीमित नहीं है. वह देश की हर भाषा की अपनी हो चुकी है. हर भाषा में उसका अलग एहसास है, हर लिखावट में उसकी अपनी आस है, हर बोलचाल में उसकी मुख़्तलिफ़ प्यास है. लेकिन उसका बुनियादी मिजाज़ हर जगह इंसानी है, नूरानी है, रूहानी है. चीनू मोदी गुजराती भाषा के मशहूर और लोकप्रिय शायर हैं. उनका शुमार, गुजराती के उन चंद शायरों में होता है जिनकी रचनाओं ने, ग़ज़ल को गुजराती भाषा के अंदाज़ से हम-आवाज़ किया है. उनसे पहले की ग़ज़ल, जो मरीज़, बरक़त, शैदा वगैरा के नामों से जानी पहचानी जाती थी और जो महफिलों की रौनक बढाती थी, उसी विरासत को अपनी बुनियाद बनाती थी जो दाग़ देहलवी और अमीर मीनाई की ग़ज़ल कहलाती थी. चीनू मोदी को गुजराती समाज में भले ही गुजरात का ग़ालिब कहा जाता हो लेकिन उनकी ग़ज़ल अपनी फ़िक्र और इज़हार के लिहाज़ से मिर्ज़ा ग़ालिब के बजाए उर्दू शायरी के उस दौर के करीब नज़र आती है, जो कोठों, शराबखानों और कव्वालियों की महफिलों में जगमगाती है. मीर और ग़ालिब ज़िंदगी पर एतबार के शायर थे जबकि दाग़ और अमीर बाज़ार के कारोबारी थे....चीनू मोदी ने अपने दूसरे हमसफ़रों के साथ ग़ज़ल का विषय और अभिव्यक्ति के नए ज़मीन और आसमान ही तलाश नहीं किए बल्कि इस तलाश की यात्रा को उन मंज़रों से भी सजाने की कोशिश की, जो गुजराती भाषा के मिजाज़ का रिवाज था. इस ग़ज़ल में प्रतीक, बिंब उन क़दमों से जुड़कर चलते नज़र आते हैं जो जीवन के विरोधाभासों से टकराते हैं और आदमी को इंसानियत का आईना दिखाते हैं. गुजराती भाषा में ग़ज़ल को गुजराती बनाकर, कई संकल्पों के द्वारा अपनी मौलिकता दर्शाकर चीनू मोदी ने इरशाद बनकर उर्दू की तरफ़ क़दम उठाए हैं. उर्दू में उन्होंने अपनी ग़ज़लों की किताब का नाम 'इरशादनामा' रखा है. चीनू की किताब का नाम देख कर इटली के एक फ़िल्म निर्देशक की बात याद आती है. उसने अपनी रचनात्मकता के संबंध में कहा था, "हर कला ऐसी आत्मकथात्मक होती है जैसे मोती अपनी सीप का कथानक होता है...इसमें यादें, सपने, कल्पना और ख़्वाहिशें इस तरह से मिली-जुली होती हैं कि एक को दूसरे से अलग करना कठिन होगा." चीनू मोदी ने इरशाद बनकर उर्दू के शब्दों में उसी आत्मकथा को दोहराया है जिसे उन्होंने एक व्यक्ति के रूप में जिया और जी कर कलम के हवाले किया है. उनकी यह आत्मकथा तीन स्तरों पर उनके शेरों में चलती-फिरती नज़र आती है. इसका एक स्तर ख़ुदा है, तो दूसरा इर्द-गिर्द फैली मौत है और इसका तीसरा हिस्सा वह व्यक्ति है जो दोनों के साथ जीने को मजबूर है. लेकिन इस मजबूरी में वह ख्वाहिशें और सपने भी हैं जो कभी उसका साथ नहीं छोड़ते. यही बहुआयामी कश्मकश इन ग़ज़लों की पहचान कराती है जो उर्दू में जगह-जगह नए पन का एहसास दिलाती है. शब्दों के जुड़ाव की ताज़ाकारी, इनकी लयकारी और समाज में रहते हुए समाज को दूर से देखने की फ़नकारी इन ग़ज़लों की विशेषताएँ हैं. 'इरशादनामा' का एक शेर है, साँस लपेटो, जल्दी-जल्दी सामाँ पैक करो इस शेर को पढ़ते हुए मुझे दाग़ की ग़ज़ल का एक शेर याद आता है, होशो-हवासो ताबो-तवाँ दाग़ जा चुके दोनों शेरों में बात एक सी है, लेकिन कथन और शब्दों के चुनाव में समय का वह अंतराल साफ़ दिखाई देता है जो आज के शायर और उन्नीसवीं सदी में हैदराबाद में बूढ़े होते दाग़ के ज़माने में था. सासों को जल्दी-जल्दी लपेटना, सामान को पैक करना, प्लेटफ़ॉर्म पर गाड़ी का आना और फिर उसका सीटी बजाना. इन नए लफ़्ज़ों से जो इशारे फूटते हैं वे चीनू को इक्कीसवीं सदी का शायर बनाते हैं. 'इरशादनामे' से कुछ और शेर जो उर्दू के होते हुए उर्दू के आम मिजाज़ से जुदा है और इसी से वह विस्मय फूटता नज़र आता है जो हर सच्ची कला की पहली शर्त है, भरा समन्दर पी जाने को टूटता देखा सितारा, तो परिंदा रो पड़ा था बेलगाम घोड़ों की हिनहिनाती आवाज़ें बेदिल हो और क़ातिल हो और अल्लाह-अल्लाह करते हो (निदा फ़ाज़ली के इस लेख पर अपनी राय hindi.letters@bbc.co.uk पर भेजें) |
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