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हिंदी कविता की रंग-बिरंगी दावत-1 | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
क्रिसमस की इस शाम लिए कुछ कविताओं के जाम आप सबको क्रिसमस या बड़े दिन की शुभकामनाएँ. क्रिसमस का दिन हिंदी के साहित्य प्रेमियों के लिए बड़ा दिन होने का एक और विशेष कारण भी है, वो यह कि आज ही के दिन हिंदी के एक बड़े और दुलारे कवि डॉ धर्मवीर भारती का जन्म हुआ था. इसलिए क्रिसमस की हर शाम इलाहाबाद में उनके घर पर कवि-गोष्ठी जमती थी और जिसमें भारती जी अपनी नई-नई कविताएँ सुनाया करते थे. लगभग सत्रह साल पहले ऐसी ही एक शाम राजनारायण बिसारिया जी को भारती जी की कविताओं का रसास्वाद करने का अवसर मिला था, लेकिन इलाहाबाद में नहीं बल्कि मुंबई में क्यों उन दिनों भारती जी मुंबई में रह रहे थे. सबसे पहले पेश है उसी शाम सुनाई गई एक कविता जो डॉ धर्मवीर भारती के प्रसिद्ध कविता संग्रह - ठंडा लोहा की अंतिम कविता है... ये फूल, मोमबत्तियाँ और टूटे सपने इनमें से रत्तीभर ना किसी से कोई ग़म जीवन है कुछ इतना विराट, इतना व्यापक यह दर्द विराट ज़िंदगी में होगा परिणत त्रिलोचन मुझको शायर न कहो मीर कि साहिब मैंने इस वर्ष यानी 2007 ने हिंदी साहित्य को कई दर्द दिए लेकिन त्रिलोचन जी का चले जाना एक ऐसा असहनीय दर्द था जो दीवान या काव्यसंग्रहों की रचना की बजाय अभाव को जन्म देगा. ओंकारनाथ श्रीवास्तव जी उन्हें हिंदी का अलबेला कवि कहते थे जो त्रिलोचन के विलक्षण व्यक्तित्व की संभवतः सबसे संक्षिप्त और सटीक व्याख्या थी.
त्रिलोचन जी से एक लंबी बातचीत का अवसर आज से लगभग अट्ठारह साल पहले दिल्ली विश्वविद्यालय के परिसर में मिला था. उसी बातचीत के दौरान उन्होंने अपनी कुछ कविताएँ और सॉनेट सुनाए थे जो त्रिलोचन जी की विशेषता रहे हैं. शेक्सपीयर के इस प्रिय छंद को उन्होंने कुछ इस तरह अपना बनाया था कि बस सुनते ही बनता था... तुम मुझसे दूर जो हो कहीं हो, सोच रहा हूँ भस्मावृत लूकी सा मैं इस अंधकार में पड़ा हुआ हूँ बेकल उत्साही व्यक्तिगत बाधाओं पर तो पार पाई जा सकती है लेकिन जिस तरह की बाधाएँ जलवायु परिवर्तन खड़ी करने वाला है, उनकी वजह से तो जीवन क्या, समूची मानवता की ही रेखाएँ मिट सकती हैं. वैज्ञानिक भले ही इस भयावह संभावना की चेतावनी अब देने लगे हों लेकिन कवियों ने तो दशकों पहले सचेत करना शुरू कर दिया था. आइए आपको लगभग 38 साल पीछे ले चलें. यह ग़ालिब की सौवीं पुण्यतिथि का साल था. इसी उपलक्ष्य में लंदन में रजनी कौल और महेंद्र कौल के घर पर एक यादगार मुशायरे का आयोजन हुआ था जहाँ दिलीप कुमार, सायरा बानो, वहीदा रहमान, सुनील दत्त और नरगिस दत्त जैसे सितारों की महफ़िल में उर्दू के महान शायर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ ने अपनी रचनाएँ सुनाईं थीं. लेकिन इस महफ़िल का दिल जीत ले गए थे बेकल उत्साही, अपनी सुरीली आवाज़ में गाए उर्दू के साथ-साथ पूरबी और हिंदी के गीतों से. मुशायरे के बाद आले हसन ने बेकल उत्साही से एक लंबी बातचीत की थी. आइए सुनें उसी बातचीत में सुनाया गया उनका यह गीत जो आज के पर्यावरण पर भी उतना ही सटीक है... नदियाँ प्यासी, खेत उपासे, उजड़े हैं खलिहान, रोटी खा गई भूखी धरती, सूरज पी गया पानी निगल गईं छापा पेड़ों की, ज़ालिम लू की फौजें हैरत से देखता है समंदर मेरी तरफ़ | इससे जुड़ी ख़बरें हिंदी कविता की रंग-बिरंगी दावत-122 दिसंबर, 2007 | मनोरंजन एक्सप्रेस हिंदी कविता की रंग-बिरंगी दावत-222 दिसंबर, 2007 | मनोरंजन एक्सप्रेस नहीं रहे जनपदीय कवि त्रिलोचन09 दिसंबर, 2007 | भारत और पड़ोस ऐसे थे मेरे बाबू जीः अमिताभ बच्चन19 नवंबर, 2007 | मनोरंजन एक्सप्रेस हरिवंश राय बच्चनः जीवन परिचय19 नवंबर, 2007 | मनोरंजन एक्सप्रेस शायरी का अनुवाद कितना जायज़?31 जुलाई, 2006 | मनोरंजन एक्सप्रेस हिंदी सॉनेट के शिखर पुरुष 04 मई, 2005 | मनोरंजन एक्सप्रेस अपराध की चपेट में राष्ट्रकवि दिनकर का गाँव23 सितंबर, 2004 | भारत और पड़ोस | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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