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नहीं रहे जनपदीय कवि त्रिलोचन | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
हिंदी के प्रमुख जनपदीय कवि त्रिलोचन शास्त्री का निधन हो गया है. वह 90 वर्ष के थे और पिछले काफ़ी समय से कई गंभीर बीमारियों से पीड़ित थे. उनका जन्म 20 अगस्त 1917 को उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर ज़िले के गांव कठधरा चिरानी पट्टी में हुआ था. उन्होंने रविवार शाम उत्तर प्रदेश के गाज़ियाबाद स्थित अपने आवास पर अपनी अंतिम सांस ली. कवि त्रिलोचन को हिन्दी साहित्य की प्रगतिशील काव्यधारा का प्रमुख हस्ताक्षर माना जाता है. हिंदी में ‘सॉनेट’ को स्थापित करने का श्रेय त्रिलोचन शास्त्री को ही जाता है. उन्होंने करीब 550 सॉनेट की रचना की थी. प्रमुख रचनाएं उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गांव से लेकर बनारस हिंदू विश्व विद्यालय तक के अपने सफ़र में उन्होंने दर्जनों पुस्तकों की रचना की. 'उस जनपद का कवि हूं', 'फूल नाम है एक', 'ताप के ताए हुए दिन', 'अरधान', 'दिगंत','गुलाब' और बुलबुल', 'तुम्हें सौंपता हूं', 'अनकहनी भी कहानी है', 'सबका अपना आकाश' और 'अमोला' उनके प्रमुख कविता संग्रह है. उनकी कहानियों का संकलन देशकाल के नाम से प्रकाशित हुआ था. उन्हें ‘ताप के ताए हुए दिन’ पर 1981 में साहित्य अकादमी पुरस्कार दिया गया था. इसके अलावा उन्हें कई और प्रमुख पुरस्कारों से सम्मानित किया गया था. त्रिलोचन शास्त्री 1995 से लेकर 2001 तक जन संस्कृति मंच के अध्यक्ष भी रहे. बीबीसी के साथ मुलाक़ात के दौरान उन्होंने कहा था कि लिखने की इच्छा तो कायम है लेकिन तबीयत साथ नहीं दे रही. नागार्जुन, शमशेर और त्रिलोचन की त्रयी आधुनिक हिंदी कविता का आधारस्तंभ मानी जाती है. | इससे जुड़ी ख़बरें हिंदी सॉनेट के शिखर पुरुष 04 मई, 2005 | मनोरंजन एक्सप्रेस त्रिलोचन की दो कविताएँ07 सितंबर, 2006 | मनोरंजन एक्सप्रेस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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