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'मेरे बचपन का अनुभव कई परिवारों की सच्चाई है' | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
मेरा जन्म दिल्ली में ही हुआ, वर्ष था 1953. पिता उत्तरप्रदेश के एक व्यापारिक दृष्टि से महत्व रखने वाले शहर से थे और माँ तिब्बत मूल की. हमारा बचपन निज़ामुद्दीन के इलाके में बीता. माँ दिल्ली पब्लिक स्कूल में पढ़ाती थीं. पहला दिल्ली पब्लिक स्कूल उन दिनों मथुरा रोड पर होता था. टेंट में क्लास होती थीं. पिता सेना में थे. दूसरे विश्वयुद्ध में लड़ चुके थे. 1947 के बाद बारामूला में हुई लड़ाई में उन्होंने हिस्सा लिया था लेकिन मेरे जन्म के समय तक वो सेना की नौकरी छोड़कर वापस आ गए थे. माता-पिता के इस अंतरजातीय विवाह वाले छोटे से परिवार में हम चार लोग थे. मुझसे बड़ी एक बहन हैं और फिर मैं. उन दिनों निज़ामुद्दीन के आसपास का इलाक़ा आज से बिल्कुल अलग था. घर के सामने रेलवे लाइन थी, उससे आगे खेत और खुला मैदान. बाजू में मक़बरा था हुमाँयू का, वो भी खुला हुआ. मनोरंजन के कुछ आज जैसे साधन तो थे नहीं. न टीवी था, न कंप्यूटर. खेलने के लिए खुला मैदान और दोस्त. हम दोपहर एक बजे स्कूल से आ जाते थे और फिर कॉलोनी के तमाम बच्चे इन मैदानों में खेलते थे. एक बहुत आज़ादी वाला, अच्छा और सजा-संवरा बचपन था हमारा. यौन जिज्ञासाओं की शुरुआत बचपन में एक बात जो बिना बताए समझ में आ गई वो यह थी कि आपके शरीर के कुछ हिस्से ऐसे हैं, जिनके बारे में कोई खुलकर बात नहीं करता. बिना बताए यह समझ बन गई कि इन चीजों पर किसी से बात नहीं करनी है. जब मेरी 10 बरस की उम्र रही होगी, तब महसूस हुआ कि ख़ुद के शरीर को और विपरीत लिंग के शरीर को समझा जाए. पता लगे कि उसमें क्या होता है. हम जिस स्कूल में पढ़ते थे, वो केवल लड़कों का था. वहाँ ऐसा सब संभव नहीं था. स्कूल में हमने ऐसा प्रयास भी कभी नहीं किया लेकिन मोहल्ले के अन्य दोस्तों से खेल-खेल में कुछ-कुछ जाना. हम लोगों के पास इस बारे में बात करने के लिए बहुत शब्द नहीं थे पर कुछ मज़ाक में देखना-दिखाना, इस तरह से सिलसिला आगे बढ़ता रहा. पहला अनुभव
माँ के परिवार से तो कोई संपर्क में था नहीं पर पिता का बड़ा परिवार था जो उत्तरप्रदेश के एक शहर में था. माँ-पिता शादी के बाद इस परिवार से अलग हो गए थे पर शादी के बाद जब मेरा जन्म हुआ तब पिताजी ने अपने घर जाना शुरू किया. दरअसल, परिवार अंतरजातीय विवाह से नाराज़ था पर मेरे जन्म के बाद परिवार ने अपने पौत्र को देखने की इच्छा व्यक्त की इसलिए पिताजी हर साल होली पर मुझे अपने पैतृक निवास पर ले जाते थे. इसी दौरान जब मेरी उम्र 6-7 की रही होगी, पहली बार किसी ने मुझमें यौन रुचि दिखलाई. मेरे एक रिश्तेदार थे जो काफी बुज़ुर्ग थे. वो सामाजिक रूप से प्रतिष्ठित व्यक्ति थे. उनका काफ़ी सम्मान था. जब हम पिताजी के घर होते थे तब वो पिताजी से कहते थे कि मुन्ना को हमारे पास बैठा दो. मुझे वो रज़ाई के अंदर ले लेते थे. वो लोगों से बातचीत करते रहते थे और साथ ही मुझसे छेड़खानी भी करते रहते थे. मुझे तब यह एक खेल की तरह लगता था इसलिए न तो इसका बुरा लगा और न ही इसे लेकर हमने किसी से कुछ कहा. यह क्रम साल-दर-साल चलता रहा. हम घर जाते और फिर ऐसा होता. ऐसा नहीं है कि परिवार में लोगों को उनके इस स्वभाव के बारे में मालूम नहीं था पर कोई उनसे कुछ कहता नहीं था. वो एक महान व्यक्ति जो थे. बाद में मुझे इस बारे में मेरे पिता ने जब सचेत किया तब मेरी उम्र 15-16 की हो चुकी थी और तब तक बहुत समय बीत चुका था, काफ़ी देर हो चुकी थी. यह सिलसिला आगे भी जारी रहा. (सुनील के जीवन के सफ़र की यह श्रंखला बीबीसी संवाददाता पाणिनी आनंद से उनकी बातचीत पर आधारित है. इसकी अगली कड़ियाँ आप हर मंगलवार पढ़ पाएँगे. इन सच्ची घटनाओं के कुछ पात्रों के नाम, उनकी पहचान, जगहों के नाम सार्वजिनक न करने के उद्देश्य से नहीं बताए जा रहे हैं.) |
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