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समलैंगिकों ने बनाया स्वयं सहायता समूह | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
उत्तर भारतीय शहर चंडीगढ़ में कुछ समलैंगिक युवकों ने आपस में मिलकर एक स्वयं सहायता समूह यानी सेल्फ़ हेल्प ग्रुप बनाया है जिसके ज़रिए वे कमाई के साधन जुटा रहे हैं. ये समलैंगिक चंडीगढ़ की एक ग़रीब बस्ती मौली जागरन में रहते हैं जहाँ भारतीय परिवार कल्याण संघ के स्थानीय दफ्तर की मदद से ये लोग अपना स्वयं सहायता समूह (एसएचजी) चला रहे हैं. देश भर में इस प्रकार का यह पहला प्रयास है. चंडीगढ़ रेलवे स्टेशन के पास की इस ग़रीब बस्ती मौली जागरन के एक छोटे से कमरे में आज़ादी और मस्ती से झूमते हुए ये युवा संकेत दे रहे हैं कि भारत का रीति-रवाजों में जकड़ा समाज अब कहीं-कहीं बदलने भी लगा है. स्थानीय परिवार कल्याण कार्यालय की ओर से चलाए जा रहे एचआईवी और एड्स जागरुकता और रोकथाम कार्यक्रम के साथ जुड़कर मौली जागरन के दर्जनों समलैंगिक युवक पर्दे के पीछे से बाहर निकल आए हैं. आत्मनिर्भरता इस समूह के ज़रिए ये युवा न केवल अपनी आपसी समस्याओं को सुलझाने की कोशिश कर रहे हैं बल्कि कमाई के नए साधन भी जुटा रहे हैं. बस्ती के परिवार कल्याण कार्यक्रम के प्रबंधक अश्वनी कुमार भट्ट बताते हैं कि समाज के इस सबसे उपेक्षित वर्ग के इन युवकों में अब एक नया आत्मविश्वास जगने लगा है. इन युवकों को आत्मनिर्भर बनाने के प्रयास के बारे में वे बताते हैं, "मुंबई के एक जौहरी अशोक गुप्ता एक हफ़्ते तक यहाँ पर प्रशिक्षण देकर गए हैं. हमने दिल्ली और मुंबई से ज़रूरी सामान मंगा दिया है और अब ये लोग प्रशिक्षण लेकर ख़ुद ही ज़ेवर तैयार करने का काम कर रहे हैं." ये लोग अपने बनाए गहनों को बाज़ार में भी पहुँचा रहे हैं. इनकी बिक्री से ये युवा अच्छी ख़ासी कमाई भी करने लगे हैं. अब उन्हें पहले की तरह जिस्मफ़रोशी करके पैसे कमाने की ज़रूरत नहीं पड़ती. एसएचजी के एक 23 वर्षीय सदस्य देविंदर कुमार ने बताया, "कई लोग हम लोगों को अच्छा नहीं मानते. कुछ हमारे जैसे लोग अब समाज में खुलकर सामने आने लग गए हैं. परिवार नियोजन और एड्स के बारे में हम अन्य लोगों को जानकारी भी देते हैं." बदलती छवि परिवार कल्याण कार्यालय में प्राप्त आंकड़ों के मुताबिक़ मौली जागरन में 12 से 80 वर्ष की उम्र के 275 समलैंगिक पुरुष है. इनमें से कई अब इस समूह की गतिविधियों में दिलचस्पी जताने लगे हैं.
इस दिलचस्पी के पीछे एक बड़ा कारण यह है कि स्वयं सहायता समूह के ज़रिए मिली वैधता के बाद उनके प्रति बस्ती के लोगों और ख़ासकर पुलिसवालों के रवैए में बड़ा परिवर्तन हुआ है. 20 वर्षीय विकी ने बताया कि अब उसे पहले की तरह रोज़ाना थाने नहीं जाना पड़ता है और न ही ग़ालियाँ सुननी पड़ती हैं. परिवार कल्याण कार्यालय में कार्यरत सीमा मानती है कि इन युवकों के नए आत्मविश्वास को बरक़रार रखना बहुत आवश्यक है और साथ ही क़ानूनी तौर पर भी इन्हें इनकी इच्छा के मुताबिक़ जीवन जीने का मौक़ा दिया जाना चाहिए. बहरहाल, देश के पुराने क़ानूनों में संशोधन किए जाने तक मौली जागरन के अनोखे स्वयं सहायता समूह के युवक इस ग़रीब बस्ती में उन्हें मिली नई आज़ादी का पूरा मज़ा ले रहे हैं. |
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