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रविवार, 16 दिसंबर, 2007 को 00:31 GMT तक के समाचार
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...ताकि समझ सकें एक समलैंगिक का संसार

सुनील गुप्ता
सुनील गुप्ता बताएंगे समलैंगिकता के अपने अनुभव और सफ़र को
समलैंगिक- यह शब्द जेहन में आते ही बिम्ब बनता है एक ऐसे व्यक्ति का जो सेक्स के लिए अपने समान लिंग के व्यक्ति को चुनता है, उसे प्यार करता है, उससे संबंध बनाता है.

दुनिया के नक्शे पर समलैंगिकता कहीं अपनी आज़ादी और यौन अधिकारों की लड़ाई है तो कहीं एक अप्राकृतिक और असामाजिक प्रवृत्ति या फिर असामान्य होने की निशानी.

समाज कहता है कि समलैंगिक होना एक तरह का मनोरोग है जो असामाजिक और अनैतिक यौन गतिविधियों की ओर ले जाता है. समलैंगिक कहता है कि यह मेरी अपनी आज़ादी का मामला है, मेरे अपने स्वभाव, चयन और संतुष्टि का मामला है. मेरा शरीर समाज और देश की संज्ञा से पहले पैदा हुआ था.

कहीं इसे पश्चिम की संस्कृति के दुष्प्रभाव और पशुता के तौर पर दिखाया जाता है तो कहीं इसे अर्धनारीश्वर का बोध और कुछ सूफ़ियों के निष्कपट, निर्बाध प्रेम के रूप में पहचाना जाता है.

आमतौर पर जब समलैंगिकता की बात होती है तो हम अपनी सुनी-सुनाई और समझी धारणा के मुताबिक एक पात्र अपने दिमाग में गढ़ लेते हैं.

इसीलिए हमने एक समलैंगिक व्यक्ति को आपसे रूबरू कराकर कोशिश की है उसकी ज़िंदगी को, सही और ग़लत को, समलैंगिकता के सवाल और बहस को आपके सामने एक बार फिर से रखने की.

बहस की बानगी

सुनील गुप्ता को यह स्वीकारने में कोई गुरेज नहीं है कि वो एक समलैंगिक हैं और न ही उन्हें इस बात की चिंता है कि उन्हें समाज किस नज़रिए से देखता है या देखेगा. इसे सुनील अपने अधिकार के तौर पर देखते हैं और इस चयन के प्रति उनके मन में कोई मलाल भी नहीं है.

हाँ, एक चुनौती भी है सुनील के जीवन में और वो है एचआईवी पॉज़िटिव होने की. पिछले 12 बरसों से सुनील को एड्स है और वो जिंदगी और मौत के बीच के फ़ासले को रोज़ कम से कम होता देख रहे हैं. मौत प्रतिक्षण उनके क़रीब आ रही है.

सुनील गुप्ता
सुनील गुप्ता एक जाने-माने छायाकार हैं

स्थिति इतनी जटिल है कि उनका इलाज भारतीय डॉक्टरों के पास नहीं है. जिस दौरान आप उनकी कहानी सुन रहे होंगे, सुनील लंदन के किसी सघन चिकित्सा कक्ष में सांसें ले रहे होंगे.

सुनील एक स्थापित छायाकार हैं. दुनिया के कई देशों में उनके चित्रों की प्रदर्शनी लगती रही हैं. कई महत्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाएं और आर्ट गैलरियां उनके काम को प्रमुखता के साथ छापती रही हैं.

वर्ष 1953 में जन्मे सुनील के जीवन का अधिकतर समय कनाडा, न्यूयॉर्क और लंदन में ही बीता है. इस दौरान उन्होंने समलैंगिकता के आंदोलन को भी देखा और समझा है और इस दिशा में वो अपनी एक समझ भी रखते हैं.

इस सप्ताह से हम सुनील की ज़िंदगी के सफ़र को अलग-अलग हिस्सों और संदर्भों के रूप में आपके सामने रखेंगे. साप्ताहिक रूप से आप अगले कुछ हफ़्तों तक हर मंगलवार हमारी वेबसाइट पर उनकी ज़िंदगी के तमाम अनुभवों से रूबरू होंगे.

मसलन, सुनील के बचपन से लेकर युवावस्था, देश और दुनिया के उनके अनुभव, समलैंगिकता का उनका अनुभव और समझ, मानसिकता और व्यवहार, एचआईवी का संकट, समलैंगिकों का आंदोलन और ऐसे कई संदर्भ आपके सामने होंगे.

यहाँ स्पष्ट कर दें कि बीबीसी की ओर से यह प्रयास न तो समलैंगिकता की वकालत है और न ही समलैंगिकता के मुद्दे पर किसी तरह का पूर्वाग्रह. यह कोशिश है एक समलैंगिक व्यक्ति के जीवन के तमाम पहलुओं को जानने और समझने की और इसपर सोचने के लिए एक स्वस्थ बहस आप लोगों के बीच छोड़ने की.

आशा करते हैं कि आप इस प्रयास को गंभीरता से लेंगे और इस बारे में अपनी प्रतिक्रियाओं से हमें अवगत कराते रहेंगे.

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