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गुरुवार, 06 सितंबर, 2007 को 22:39 GMT तक के समाचार
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नजीब गुब्बारे वाला

चित्रांकनः हरीश परगनिहा
चित्रांकनः हरीश परगनिहा

कहानी

जब भी शाम को मैरीन ड्राइव आता तो नजीब गुब्बारे वाला लड़का ज़रूर कहीं न कहीं मिल जाता था. उसके मुँह में सीटी होती थी और हाथ में बाँस का डंडा जिस पर अलग-अलग आकृति और आकार के गुब्बारे होते थे. जब रवि और सुलक्षणा नहीं होते तो सलाम करके वह आगे बढ़ जाता था.

बच्चे वाले परिवार को देख वह दूर से ही सीटी बजाता था और उसके करीब आते ही बच्चा मचल उठता था. परिवार को गुब्बारा खरीदना ही पड़ता, बच्चे के लिए. कोई-कोई परिवार मोल-भाव भी करता...पाँच रुपए का बैलून! अपने घाट कोपर में तो रुपए का मिलता है. ऐसे में नजीब का रटारटाया जवाब होता...दूर से बेचना आता साब. भाड़ा खर्च करता. पुलिस और मालिक को देता, तब कहीं अपने को अठन्नी बचता है. आप बड़ा लोक है. भाड़ा खर्च कर सैर सपाटे पर आता. बच्चा वास्ते बेलून तो बहुत छोटा बात है.

कोई-कोई बुलाकर बच्चे को गुब्बारा दिलाते तो कई परिवारों को शोकर पेवमेंट के पास उतारते. पाँच का गुब्बारा बच्चे को पकड़ाते और दस का नोट नजीब को थमा चल देते.

12-13 वर्षीय गोरा चिट्टा नजीब तब मुझे पक्का व्यापारी नज़र आता. अक्सर उसे बुलाकर सुलक्षणा रवि को गुब्बारा दिलाती. पैसों के साथ कभी बिस्कुट तो कभी चॉकलेट उसे थमा देती. बहुत अच्छी तरह पहचान गया था हमें वह. हमारी नौकरानी अचानक काम छोड़ गई थी. सुलक्षणा ने नजीब से कहा तो बोला,‘‘बहुत ईमानदार औरत है मेम साहब! पर मुसलमान है. आप रखेगा? ’’

और नगमा बीबी हमारे यहाँ काम करने लगी. सुबह आठ बजे आ जाती और शाम को सात बजे खाना पकाकर चली जाती. बहुत ईमानदार बाई को पाकर हम नजीब के कृतज्ञ से हो गए थे.

कई दिनों से वर्षा मुंबई को घेरे थी. आज आसमान खुला था. सुलक्षण और रवि पुणे गए हुए थे. इतवार पूरा घर में काटना मुश्किल हो रहा था. कफ़ परेड में बढ़िया कॉफी एक रेस्त्राँ में पीकर मैरीन ड्राइव की तरफ चला आया. समुद्र दीवार से लगातार टक्कर मार रहा था.

पहचाने गैराज में गाड़ी पार्क कर सड़क पार कर पुनः मैरीन ड्राइव की पेवमेर पर आता हूँ. सींग दाने वाले आज ब्रिस्क बिजनेस कर रहे थे. सीमेंट की बेंचों पर बूढ़े जोड़े कब्ज़ा जमाए हुए थे.

दीवार के पास भी लोग सटकर बैठे हुए थे. समुद्र में, थोड़ी दूरी पर नावें इधर से उधर डोल रही थीं जिन पर कंपनियों के विज्ञापन लगे हुए थे. विज्ञापन का सबसे सस्ता और बढ़िया नुस्खा मुंबई की कंपनियों ने निकाल रखा है. नाव खरीदकर मल्लाह को दे दो. दिन में गेट वे ऑफ इंडिया या और कहीं वह लोगों को घुमाकर पैसा कमाएगा और शाम होते ही इधर निकल आएगा, विज्ञापन टाँग कर. बैटरी से टियूब जलने लगेंगे. ट्रांज़िस्टर पर ध्वनि गूंजने लगेगी नए फ़िल्मी गीत की.

एक शाम सुलक्षणा ने कहा था,‘‘सिंधु बहुत गहरा होता है. उसमें, पृथ्वी से ज़्यादा प्रजातियों के जीव होते हैं. हीरे-मोती की संपदा भी कम नहीं होती है इसीलिए सिंधु किनारे के गाँव, शहर और जगहों से ज़्यादा समृद्ध होते हैं. बाहर से लोग आ आकर बसते हैं, जैसे हम मध्यप्रदेश से आए हैं.’’

मैंने कहा था,‘‘मैं नहीं मानता! यहाँ विराट उद्योगों के मालिक हैं तो तस्कर भी हैं और नजीब जैसे ग़रीब लोग भी. नगमा बाई की तरह असहाय औरतें भी.’’

‘‘ नजीब ग़रीब हो पर उसमें ईमानदारी की गहराई है. वैसे यह शहर सिनेमाओं का शहर है.’’

कुछ सोचते हुए पूछता हूँ, ‘‘यही काम क्यों पकड़ा छोकरे ने?’’

‘‘ दिन में बाप को बनाकर खिलाता है. कपड़े धोता है. खोली साफ़ करता है. माँ नहीं है तो उसकी जगह ले रखी है छोकरे ने.’’

चित्रांकन -हरीश परगनिहा
चित्रांकन -हरीश परगनिहा

‘‘ आप क्या अपाहिज है!’’

मुस्कराई थी सुलक्षणा, ‘‘दारुबाज़ है. शराब नहीं मिले तो लोटा-थाली बेच नौसादर की थैली पी जाता है. मरते वक़्त माँ नजीब से कह गई थी, इसका देखभाल करना. तेरा बाप है यह, क्योंकि मेरा आदमी है. लौटते में नजीब अपनी कमाई से देशी अद्धा और नानबाई से गोश्त रोटी लेता जाता है.’’

‘‘अजीब लड़का है जो बाप को शराब पिलाता है.’’

‘‘नगमा बाई कहती है कि मुसलमान के यहाँ हिंदु श्रवण कुमार पैदा हो गया है.’’

अनायास किसी का कंधा मुझे छू जाता है और मैं वर्तमान में लौट आता हूँ. चारों तरफ निगाह दौड़ाता हूँ पर नजीब और उसके गुब्बारे नज़र नहीं आते हैं.

खरामा-खरामा टहलने लगता हूँ तो अनायास दृष्टि एक डस्टबिन से पीठ टिकाए लड़के पर पड़ती है. पास पहुँच, मैं उसे पुराकता हूँ तो वह अचकचाके उठता है और फफक के रो पड़ता है. रुदन कम हुआ तो बताता है कि इधर का सिपाही 15 रुपया लेता है. तीन दिन पहले था, आया नहीं फिर भी 60 रुपया माँगता था. मेरा कमाई कितना हुआ अभीच. बीस रुपया! पाकेट से पैशा निकाल सारा बेलून फाड़, डंडा तोड़ दिया...कल बाक़ी का रोकड़ लाना तब बेलून बेचना.

हिचकी बाँधकर नजीब रो पड़ता है. मैं पर्स से निकाल, ढाई सौ रुपए देता हूँ तो सतर्क हो जाता है, ‘‘भीख नाई पाहिजे साहिब !’’

मैं नोट उसकी नेकर में डाल कहता हूँ,‘‘ भीख नहीं. जब कमा लो तो लौटा देना.’’

मैं आगे बढ़ जाता हूँ और नजीब मुझे देखता रहता है. रास्ते में सोचता हूँ कि मंत्रालय में बैठकर हम बाल श्रम के ख़िलाफ़ क़ानून तो बनाते रहते हैं मगर वह क़ानून नजीब जैसे खुद्दार बच्चे की कोई मदद नहीं करते हैं.

घर लौट आता हूँ. नग्मा बाई खाना बनाकर जा चुकी थी. तीसरे दिन रवि और सुलक्षणा लौट आते हैं.

मैं नहीं बताता हूँ पर नगमा बाई सुलक्षणा को बता देती है और कहती है कि छोकरा साहब को हारूं रशीद बोलता था. एक महीने बाद नजीब के भेजे सौ रुपए जबरदस्ती वापस करती है, ‘‘ बड़ा खुद्दार छोकरा है. कर्ज उतारे बिना नहीं मानेगा.’’

दो महीने हम लोग कहीं बाहर घूमने नहीं जा सके क्योंकि मंत्रालय में बेहद काम थे. वैसे भी वर्षा के दिनों में समुद्र उतना आकर्षक भी नहीं रहता है.

ईद से पहले नगमा बाई को कपड़े और इनाम दिया तो सुलक्षणा ने नजीब के लिए भी जींस, टी शर्ट और इक्यावन रुपए की ईदी भेजी.

नगमा बाई ईद के बाद जब काम पर आई तो उसकी आँखे सूजी और मुँह सूखा हुआ था. सुलक्षणा ने पूछा कि क्या हुआ तो वुक्का फाड़ कर रो पड़ी. मैं शेव बना रहा था. दौड़ कर आता हूँ और पूछता हूँ, ‘‘क्या हुआ? ’’

नग़मा बाई रोते हुए सुलक्षणा को बता रही थी, ‘‘कापुड़ और ईदी का पैसा पाकर बहुत ख़ुश था नजीब. कह रहा था...साब हांरुरशीद तो मेम साब का दिल दरिया है. अम्मी ऐसी ही थी...प्यार की झील. अपुन नवा कापुड़ डाल अक्खा मुंबई घूमेगा.’’

‘‘फिर? ’’

‘‘बाप पैसा और कापुड़लेकर गायब हो गया. उदास सा बैठा रहा नजीब खोली का बाहर. रात्रि अंदर चला गया. कोई 11 बजा होगा, एक औरत लेकर आया बाप...अपन आज ईद मनाएगा. तू बाहिर जा. पर नजीब नहीं माना तो बाप थप्पड़ मारा.’’

‘‘फिर? ’’

‘‘फिर क्या, बड़ा दगड़ (पत्थर) उठाके मारा नजीब बाप के, ये औरत मेरा अम्मी नहीं है तो तू मेरा वालिद नहीं. हम लोग दौड़कर गया. बाप छटपटा रहा था. किराए का औरत भाग गया था. नजीब चीख रहा था...ये औरत मेरा अम्मी नहीं तो तू वालिद नहीं.’’

‘‘फिर? ’’

‘‘ मर गया था बाप. हम लोग असलियत समझ गया था. पड़ोसी नजीब को समझाया...बोल देना कि औरत दगड़ मारके भाग गया जब पुलिस आए मगर नजीब तो ख़ुद पुलिस ठाणे पहुँच गया और सब बता दिया.’’

मैंने वकील कर दिया मगर बाल सुधार गृह में बंद नजीब ने कह दिया...जब कत्ल मैं किया तो झूठ क्यों बोले? वकील ने मुझे बताया कि लड़का राजा हरिश्चंद्र है. पर आप घबराएँ नहीं. 15 साल से छोटा है. तीन साल से ज़्यादा की सज़ा नहीं होगी. वह भी रिमांड हाउस में रहेगा.

नजीब जब बाल सुधार कारावास में था तभी मेरा स्थानांतर पुणे हो गया. मुंबई के समुद्र और नजीब को हम भूल से गए थे कि एक दिन डेढ़ सौ रुपए का मनीऑर्डर मुंबई से आ गया. भेजने वाला नजीब था जो अभी बाल कारावास में था. वहीं की कमाई से बाकी का उधार चुकाया था उसने.

सुलक्षणा रुपए हाथ में थामें अतीत में खो जाती है. स्कूल से लौटा रवि माँ से पूछता है, ‘‘ किसने रुपया भेजा?’’

सुलक्षणा के मुँह से निकल पड़ता है, ‘‘श्रवण कुमार ने, सत्यावादी हरिश्चंद्र ने.’’

‘‘ कौन थे वे?’’ रवि पूछता है.

‘‘ शायद मुसलमान! नहीं शायद इन्सान.’’

सुलक्षणा का जवाब रवि को चकित कर देता है मगर वह फुटबाल खेलने के लिए बाहर निकल जाता है.

दफ़्तर से घर आता हूँ तो सुलक्षणा बताती है कि नजीब ने काराबास से बाक़ी के डेढ़ सौ रुपए वापस किए हैं. फिर अपन मुँह से निकले अनर्गल संबोधनों की बात माँ बताती है.

अंदर से भींग जाता हूँ मगर घर का वातावरण भी तो सहज करना था, इसलिए हँसकर कहता हूँ, ‘‘वाह! मौलाना श्रवण कुमार. सैयद हरीशचंद्र नहीं.’’

तब सहज होकर बताती है सुलक्षणा, ‘‘ हरीशचंद्र नहीं, हरिश्चंद्र! और मैं हो-होकर हँस पड़ता. मगर सोते में चारों ओर गुब्बारे उड़ते रहते हैं.’’

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विजय
115 बी, पॉकेट - जे एंड के
दिलशाद गार्डन
दिल्ली-110095

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