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गली के मोड़ पे सूना-सा कोई दरवाज़ा | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
कहानी बचपन का अपना ही नाज़-ओ-अंदाज़ होता है और जवानी का अपना ही सुरूर! मगर ये बेचारे बीच वाले क्या करें जिनका बचपन उनसे छूट चुका है और जवानी अभी आई नहीं होती. गला मादा कोयल की तरह फट कर बेसुरा हो जाता है और तन के बिना पके ही मन का पकना शुरू हो जाता है. मैं उन दिनों उम्र के उसी फ़ालतू दौर से गुज़र रहा था. वे सन् 60-61 के साल थे. मैंने 13 वर्ष से भी कम उम्र में ही मैट्रिक पास कर लिया था और कॉलेज जाने लगा था. यह कोई साधरण बात न थी. शेखी में पूँछ कुछ अकड़ी-अकड़ी, गर्दन मुर्गे की तरह फूली-फूली लिए डोला करता. मुझे लगता, इस उपलब्धि को सीढ़ी बना कर लड़कियों तक पहुँचा जा सकता था. मुझे लगता हर नज़र विस्मय से भर उठेगी और कोई-कोई बालिका तो मुझे आदर से लपेट कर कलेजे में रख लेगी ‘इस्स! ऐसा! देखो-देखो, कितना तेज़ लड़का है.’ मेरी यह मासूम इच्छा पूरी नहीं हो रही थी और ख़ुद आगे बढ़कर किसी लड़की से दोस्ती गाँठने का जिगरा मेरे पास न था. लेकिन अंदर ही अंदर मैं ख़ुद को किसी महानायक से कम नहीं आँकता था. मूलतः मैं एक शर्मीला और डरपोक लड़का था. प्रकट में कुछ करते नहीं बनता था, सो बस में लड़कियों के सामने खड़े होने पर अपनी कॉपियाँ-किताबें ऐसे रखता कि मेरा नाम और क्लास लड़कियों की निगाहों में पड़ जाए-‘कुमारियों, अब तो देखो, जो लड़का तुम्हारे सामने खड़ा है, वह कोई साधारण लड़का नहीं है.’ कोटि जतन कर हारे लेकिन उधर से न ‘इस्स,’ न ‘उफ’ न ‘आह’ न ‘वाह’! इत्ती बड़ी बात हो गई और किसी को इसमें इंटरेस्ट नहीं! ये लड़कियाँ होती ही हैं सेल्फिश. मैं मन मसोसकर रह जाता. शायद वे मुझे अभी ‘बबुआ’ ही समझ रही थीं. अब उन्हें कैसे बताता बाहर से कमज़ोर भले दिख रहा हूँ, अंदर से काफ़ी कुछ जान चुका हूँ. बस ज़रा-ज़रा सी ही कसर बाक़ी रह गई थी जैसे उस समय तक मुझे ठीक-ठीक पता न था कि प्यार की मुकम्मिल परिभाषा क्या है (पता तो वैसे आज भी नहीं है) यानी कि मुहब्बत क्या शै है-कुछ चाहत, कुछ शर्म, कुछ कशिश, कुछ दूरी, कुछ खुमार, कुछ मदहोशी, पता नहीं, कितना कुछ और भी कुछ-कुछ शायद यह किसी एक लड़की से किया जाता था. मानों सरासर ज़्यादती हो..... सिर्फ़ एक से ही...और बाकी सारी सुंदर लड़कियों को किसके लिए छोड़ दें! मुझे तो ढेरों लड़कियाँ अच्छी लगती थीं. मैं सबसे प्यार करना चाह रहा था. लेकिन हाय रे मेरी तक़दीर, एक भी लड़की मुझे भाव नहीं दे रही थी. शायद यही विफलता मुझे उस लड़की की ओर खींच ले गई जो मेरे रास्ते में पड़ने वाले जी ब्लॉक वाले क्वार्टरों के पाँचवें रो के तीसरे मकान के दरवाज़े पर खड़ी थी. वह गोरी थी, सलोनी थी, जवान थी. उम्र में मुझसे चार-पाँच साल बड़ी रही होगी. बड़ी...! ऊँह, हुआ करे. 11-12 साल की लड़कियाँ भी कोई लड़कियां हैं सूखी, चीमड़...हवा निकली हुई ट्यूब! अरे लड़की माने औरत! भरी-भरी, नरम-नरम, गदबदी-सी, सीने से लग जाओ तो कुछ लगे कि हाँ... अब ये क्या कि... ख़ैर मेरे हिसाब से वह बिल्कुल फिट बैठती थी मेरे लिए. सबसे बड़ी ख़ूबी यह कि वह मुझे प्यार से तक रही थी. बल्कि ताके जा रही थी. मनचाही मुराद को इतने क़रीब पाकर मैं अप्रस्तुत सा हो उठा और इस हड़बड़ी में सामने पड़े स्टोन चिप्स पर जा चढ़ा, फिर शरमा कर नाक की सीध में मिलिट्री मार्च कर गया ताकि वह भी समझ ले, ‘मैं कोई लफंगा-वफंगा नहीं हूँ जो लड़की देखते ही लाइन मारने लग जाता है. स्टोन चिप्स पर तो मैं यूँ ही स्वेच्छा से चढ़ गया था!’ अंदर कहीं जलतरंग बज रहे थे और मैं अपने गुमान में उन्हें अनसुना कर रहा था. दूसरे दिन, गली में पहुंचते ही अपने आप जलतरंग बज उठे. वह अपने दरवाज़े पर खड़ी थी. वही प्यार भरी चितवन, जिसमें मेरा अनुमान था कि मेरे लिए निश्चय ही ‘इस्स’, ‘उफ़’, ‘वाह’ रहा होगा. छोटा सा शहर है. पास-पड़ोस से मेरी चर्चा फैलते-फैलते निश्चय ही इस लड़की तक पहुँची होगी. ...कहीं मैं जान-बूझ कर तो इधर से नहीं गुज़रा? यह लाइन मारना नहीं तो और क्या है? नहीं नहीं ऐसा नहीं है. मैंने एक नज़र देखने के बाद अपनी महानता की छवि बनाए रखने के लिए दोबारा उसकी तरफ नहीं ताका पर अंदर ही अंदर मैं समझ रहा था. उसकी दो कजरारी पलकें मेरी पीठ पर नेह की अल्पना रच रही होंगी. मेहदी के फूलों की ख़ुशबू में तैरता हुआ मैं गली पार कर गया.
फिर तो यह मेरी रोज़ की दिनचर्या में शामिल हो गया. सदा-सर्वदा उसके दीदार हो ही जाए, यह ज़रूरी न था लेकिन जिस दिन वह न दिखती, मेरा मन खाली-खाली सा बना रहता. उस दिन किसी काम में जी न लगता. उस पर मेरा ध्यान केंद्रित होने का एक फायदा ज़रूर हुआ कि उसके आकर्षण ने दूसरी लड़कियों की चिंता से मेरा पीछा छुड़ा दिया. इच्छा तो बहुत थी कि उसके दरवाज़े पर रुक कर उससे बात करने का कोई बहाना मिल जाए, कि मैं उसे बता सकूँ कि मेरा नाम अमुक है. फिर शायद वह कहे,‘मुझे मालूम है.’ मैं पूछूं,‘और क्या-क्या मालूम है?’ कह कहे,‘तुम बड़े तेज़ लड़के हो, इत्ती-सी उम्र में मैट्रिक पास कर ली और कॉलेज जाने लग गए.’ मैं तनिक बड़प्पन से शरमा कर कहता, ‘वो तो मामूली बात है.’ वह प्रशंसा की नज़रों से मुझे सेंकती, ‘क्लास में भी फर्स्ट आते रहे, सिर्फ़ इस बार...कोई बात नहीं मुझे तुम बहुत अच्छे, बल्कि सबसे अच्छे लगते हो.’ मन में गोसांई जी की चौपाई नाचती, सच! कुछ दिनों बाद ऐसा मौक़ा मिल गया. उसके दरवाज़े के ऐन सामने ही मेरे चप्पल का फीता टूट गया और मैं औधे मुँह जा गिरा. शुकर था हाथ खाली थे. मेरी झेंप भरी नज़र दरवाज़े की ओर गई. मैने उसके दोनों हाथों को फैलते और चेहरे पर घबराहट के रंग को पसरते देखा. पर मैं गिर कर उठ खड़ा हुआ और चप्पल हाथ में लिए हुए उसकी ओर बिना देखे आगे बढ़ गया, जैसे यह एक मामूली बात हो और मुझ जैसे ‘जवान’ ऐसी चीज़ों की कतई परवाह नहीं करते, देख लो. अपनी ही गढ़ी महानता की नकली टाँगों पर सरकस के पुतले सा चलते हुए आगे बढ़ जाना मुझे आज तक याद है, हालांकि छिल जाने से घुटनों में दर्द तो हो ही रहा था. उस रात पहली बार वह सपनों में आई. मैं उसके इस तरह आने पर अंदर से पुलकित हुआ, मगर बाहर से उसे नज़रअंदाज करता रहा. वह क़दम-क़दम चल कर मेरे और मेरी किताब के बीच आ खड़ी हुई फिर आँखें नचाते हुए उसने तंज़ कसा, ‘हाँ-हाँ, मालूम है, तुम बड़े महान हो, लड़कियों की ओर आँख उठाकर देखते तक नहीं.’ वह आधा सपने से और आधा सपनों के बाहर से बोल रही थी जैसे, ‘देख कर नहीं चला करते? देखो तो, दोनों घुटने छिल गए हैं कैसे!’ उसने मेरी खुनाई चोट पर हल्दी-प्याज़ पीस कर लगाई, मैं गरम हल्दी की छौंक से ‘आह-ऊह’ करता रहा. उसने पट्टी बाँधी फिर मुझे पुचकारने लगी, ‘मुझसे बोलते क्यों नहीं, आंsss?’ फिर मुझे थपकी देते-देते कलेजे से लगा कर सो गई. सुबह बाहर जाने के लिए पैंट पहन ही रहा था कि माँ ने डाँटा,‘कहाँ चल दिया? पट्टी तो खोलता जा, पैंट में दाग लग जाएंगे.’ ‘पट्टी...?’ ओह! आँखों में रात का सपना था और आँखों के ऐन सामने माँ. तो क्या रात पट्टी माँ ने बाँधी थी, उसने नहीं? न माँ ने नहीं, उसी ने बाँधी होगी. लेकिन ऐसा भला कैसे हो सकता था? वह तो सपना था! पट्टी तो सपने के अंदर से बाहर तक बंधी है. वैसे माँ ने यह दावा भी तो नहीं किया कि पट्टी उन्होंने ही बाँधी थी सिर्फ़ पट्टी की बाबत पूछा भर. पट्टी बंधी दिख गई होगी, सो, पूछ लिया होगा. यह सोचते ही मन को पंख लग गए. मैं माँ के पास से उड़कर उसके कंघे पर जा बैठा. मैं नहीं, वह, उसका ख़्याल! लेकिन... जी को अभी भी चैन न था. क्या सच था और क्या सपना...इस पर गौर करने के लिए कायदे से मुझे एकांत चाहिए था घर में एकांत था नहीं. गौतम को घर छोड़ना पड़ा था, बड़े-बड़े ऋषि-मुनि हिमालय की कंदराओं में तपस्या करने चले जाते थे. मगर मेरा हिमालय कहाँ था? काफ़ी भटकने के बाद आख़िर मुझे एक जगह मिल गई जहाँ चैन से दो पल बैठा जा सकता था. वह रेलवे की एक एबंडंड गुमटी थी-आबादी से काफ़ी दूर. आस-पास कोई न था. अंदर झाँकने पर मुझे लगा, यहाँ मुझसे पहले भी कोई रह रहा था. तमाम अल्लम-गल्लम चीज़े थीं, गंदे-फटे गूदड़, सूखे, खुनाए खैरी और लाल बैंडेज, टूटा संदूक, चंद चिट्ठियाँ जिनकी इबारत धुंधली पड़ गई थी. चिंदियां और सांप की एक झूलती केंचुला केंचुल देखते ही मेरी रूह फना हो गई. मैं लौटने को ही था कि तभी गूदड़ के अंदर से झांकती एक किताब मुझे दिख गई. जिज्ञासा हुई, क्या है, साहस कर खीच ली सचित्र कोकशास्त्र! पन्ने पलटते ही देह में सनसनी मच गई. किताब मैंने आधी ही देखी थी कि वाहर कोई आहट हुई. घबराकर किताब वहीं छोड़कर मैं गुमटी से बाहर निकल आया. बाहर आस-पास यूँ तो कुछ भी न था, फिर भी मेरा तत्काल दोबारा जाने का साहस न हुआ. दिन भर किताब के चित्र मेरे दिमाग में छाए रहे. कॉलेज से वापस आते ही किताब के आकर्षण ने मुझे फिर खींचा. उस वक़्त शाम गहरा रही थी. डरते-डरते मैंने गुमटी में प्रवेश किया. पर यह क्या! वे सूखे, खुनाए बैंडेज, गूदड़, टिन का टूटा संदूक सॉप की केंचुल सभी कुछ तो था, बस एक किताब के सिवा. किताब मिली रात को सपने में उसी गुमटी में. ‘इतने मन से तो तुम्हें पढ़ते देखा नहीं कभी!’ अरे बाप वह यहाँ कैसे चली आई, ‘क्या किताब है देखें!’, ‘छी!’ लड़कियों को यह सब नहीं देखना चाहिए.’ मैने कहा, ‘ऐसा?’ उसने आँखें फैला दीं. अचानक झट से उसने किताब मेरे हाथ से खींच ली, ‘सुनों भाइयों सुनो, ऐसी किताब लड़कियों को नहीं देखनी चाहिए...सुनो, ये देखो, ये...ये...आजकल के लड़के क्या पढ़ते हैं, ये!’ ‘अरे बाप!’ मैं किताब लेने को उसकी ओर लपका लेकिन मैं छोटा था, वह बड़ी; लाख उछल-कूद की लेकिन किताब उससे न छीन सका?’ नींद टूट गई. माँ बर्रा रही थीं, ‘कल से तू अलग कमरे में सोया करेगा. रात भर बर्राता है-दे दो, दे दो! क्या दे दें? दिन भर खटी और रात को भी दो घड़ी सोने को न मिले? अच्छी-ख़ासी फटकार पिला दी माँ ने.
सुबह मैं फिर उस रास्ते निकला. वह अब भी खड़ी थी अपने दरवाज़े पर उसी तरह मुस्कराते हुए. इसी ने चुराई होगी, इसी ने! मैंने कनखियों से उसे दोबारा देखा, चेहरे पर महमहाती मुस्कुराहट यथावत थी. हुंह, ऐसे देख रही है जैसे कुछ जानती ही नहीं. सपनों से निकलकर चोरी करके फिर सपनों में समा जाती है. उसे देखकर लगता था जैसे अभी-अभी वह सपनों से निकल कर आई थी. धुंध विजड़ित-सी उसकी आँखे सपनीली थीं, सम्मोहन का एक मायालोक आँखों के उजले कायों में पड़ाव डाले पड़ा था. अजीब आँख मिचौली थी. उसका एक पाँव फ्रेम के अंदर था, एक बाहर. कभी-कभी हाल ही का पढ़ा हुआ एक वाक्य याद आता-यह सारा कुछ मनुष्य के अवचेतन का इजहार मात्र है, कभी लगता नहीं सच है. एक अजीब-सी मनोवैज्ञानिक क्राइसिस थी, जिसके बॉटलनेक में मैं आ फंसा था. जितना ही मैं उससे दूर भागता, उतना ही वह घेरती रहती मुझे. अपने नकचढ़े अहं के चलते आईने में अपना चेहरा जब भी देखता, वहाँ सदा एक गुम्मी मनहूसियत तारी रहती...और वह? सदा उल्लसित. उल्लास धवल हिम हास लिए अधरों पर वह इतना शोर करती कि मेरी पूरी पढ़ाई प्रभावित होने लगती. मसलन, मैं कोई ‘सम’ बना रहा होता तो वह मेरे साथ-साथ होती, पूछती‘थोड़ा टफ है न? बना लोगे?’ ‘देखते हैं.’ ‘इसे वैसे नहीं, ऐसे बनाओ तो बन जाय.’ राह चल रहा होता तो वह कदम-दर-कदम टोंकती चलती, ‘जरा देख के चलो...’ वह मुझे हर घड़ी हर पल नियंत्रित और संचालित करने लगी थी. बिना उसके साक्ष्य के मेरा कोई भी काम पूरा न होता. उसे डाँटना भी पड़ता, ‘काम नहीं करने दोगी, क्या?’ ‘लो करो.’ वह मुंह फुला कर मेरी ओर पीठ करके बैठ जाती. लेकिन उसकी यह नाराज़गी ज़्यादा देर तक न रह पाती, जैसे ही मैं उसे चिढ़ाता? कब तक हुजूर रूठे रहोगे, भटके गुस्से में प्यार... !’ वह मेरी पीठ पर आ चिपकती और झूला झूलने लगती. वह मेरे आनंदलोक का अपना एकांत था, जहाँ वह भी और मैं था, बाकी कोई नहीं. मैं अपनी इस उपलब्धि का राज किसी के सामने न खोलता, डर था, जिस दिन उसने मेरे सपनों से बाहर कदम रखा, कोई उसे छीन ले जाएगा. और यही हुआ. एक दिन अंदर का डर उछल कर बाहर आ गया. उसका ग़ायब होना एकाएक ही हुआ था. उसकी एक झलक पाने को मैं अब भी उस गली से गुजरता, मगर दरवाज़ा सूना और गली वीरान हो चुकी थी. एक दिन, दो दिन...एक महीना-दो महीना...! इतना गहरा खालीपन इतने दिन में नहीं झेल सकता था. मैंने उसे सपनों के बाहर से आवाज़ दी और यहीं वह हादसा हो गया. गली के मोड़ पर पान की दुकान पर मैंने यूँ ही चर्चा छेड़ी, ‘‘पाँचवीं गली के तीसरे घर में कौन रहता है अब?’’ ‘‘कोई नहीं. महीनों से बंद पड़ा है.’’ पान वाले ने बताया.
‘‘पहले?!’’ ‘‘पांडेजी रहते थे, गाँव चले गए.’’ ‘‘लौटे ही नहीं गाँव से?’’ ‘‘अब क्या लौटेंगे! शोक समा गया, शोक!’’ ‘‘शोक?’’ उनकी एक जवान बेटी थी न, उनो.... ‘‘जो दरवाज़े पर अक्सर खड़ी रहती थी?’’ ‘‘हाँ.’’ ‘‘क्या हुआ उसे?’’ ‘‘गाँव के मकान में आग लगी, जलकर मर गई.’’ ‘‘अरे!’’ मेरा कलेजा धक सा रह गया. ‘‘चीखती-चिल्लाती, तो भी लोग उसे बचा लेते, सो भी नहीं. गूंगी थी न बेचारी.! आह! मेरे सारे छंद छिन्न-भिन्न हो गए. वह दिन है और आज का दिन. जी ब्लॉक की पाँचवी गली के तीसरे मकान के दरवाज़े से अब भी कभी-कभी गुज़रता हूँ. मकान खंडहर बन चुका है. आश्चर्य! उस रूक्ष खंडहर पर अभी भी श्मशानी चुप-सी उसकी छाया खड़ी दिख जाती है. वह मुझे आज भी ज़िंदगी की एक बहुत बड़ी भूल लगती है. न मैंने सपनों के बाहर से उसे आवाज़ दी होती न वह सपनों के बाहर निकलती, न गूंगी होती, न मारी जाती. * * * * * * * * * * |
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