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शुक्रवार, 31 अगस्त, 2007 को 09:38 GMT तक के समाचार
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मसला

चित्रांकनः हरीश परगनिहा
चित्रांकनः हरीश परगनिहा

कहानी

घर के बाहर गाय बाँ-बाँ कर रही थी और आँगन में औरतों ने कोहराम मचा रखा था.

तब रांका गाँव में बिजली नहीं आई थी. दिया-बाती का समय हो चुका था मगर उस घर में किसी को इसका ध्यान ही नहीं था. आले में रखा दिया भी शायद कोलाहल से सहम गया था. अंधेरे और हल्ले से गैया भी घबरा सी गई थी. हल्ला था कि बढ़ता ही जा रहा था. घर के आंगन में एक औरत पर दमादम मार पड़ी थी. मारने वाली मारती कम थी गालियाँ ज़्यादा देती थी. एक मुक्का मारे और बके,‘‘ कमजात, किसबिन, मेरे रोज़गार को तू छीनेगी, तो मुझे क्या तेरा भतार खिलाएगा. पेट तो कुतिया भी भरती है रे! दूसरे का बाना मारने आई है बेशरम’’

मार खाने वाली औरत प्रतिकार नहीं कर रही थी. बल्कि रो-रो कर क्षमा सी माँग रही थी, ‘‘दाई, बचा दो. तुम्हारी गोद में नहीं बैठूंगी तो कहाँ समाऊँगी. अब घर तो छोड़ चुकी. तुम्हारा बेटा बाहर बैठा है. उसे भी तो पूछ लो.’’

मारने वाली औरत शब्दों के इस प्रहार को झेल न सकी. वह उसे मारना छोड़कर झपटते हुए बाहर आई और लगी चिल्लाने,‘‘ कौन है बे, खसम बना है तो चेहरा भी तो दिखा. तुम्हारी औरत भीतर पिट रही है और तू मजे से यहाँ छिपा बैठा है...’’

शायद वह कुछ और बकती-झकती कि दुबले से एक नवजवान ने सामने आकर कहा, ‘‘पांयलागी तुरकिन दाई. तुम मारोगी और तुम्हीं खानादाना दोगी! तुम्हारे सहारे ही तो आए हैं.’’

तुरकिन ने जो यह जवाब सुना तो उसका सारा गुस्सा छू हो गया. अब उसे कुछ सूझ ही नहीं रहा था. वह वापस घर के भीतर चली गई. आँगन में जाकर उसने घर की बहू से कहा, ‘‘बिंदा, बेटा रोशनी तो करो. अंधेरे में तो इन नानजातों के चेहरे तक पढ़ने में नहीं आ रहे. बोली तो इनकी कबूतरों जैसी है. ज़रा उजाला हो तो चेहरा भी देखूँ.’’

बिंदा तब तक लालटेन जला चुकी थी.

लालटेन लेकर बुढ़िया तुरकिन फिर बाहर आई. उसने नौजवान को लालटेन की रोशनी में देखा. छह फुटा दुबला पतला जवान. मुरमुंदा के साप्ताहिक बाज़ार में डोकरी ने इस नौजवान को मेहरुन्निसा के चूड़ी पसरे के पास कपड़ा बेचते देखा था. दोनों को अक्सर बोलते-बतियाते, हँसते-मस्तियाते देख डोकरी आशंकित भी हुई थी. लेकिन हँसने-हँसाने की उमर के लोग तो मस्तियाएंगे ही उसने यह सोचकर कभी टोका भी नहीं.

यहाँ उसी जवान को देखकर डोकरी दहाड़ने लगी, ‘‘अरे कोस्टे, तू है रे हरामी. भगा के लाया है क्या रे मासूम सी लड़की को ?’’

‘‘हम दोनों रजामंदी से भाग आए हैं दाई. अब तुम्हारा सहारा चाहिए.’’ जवान ने झुककर जवाब दिया.

‘‘ सहारे के बच्चे मुझसे पहले पूछा था क्या? तू हिंदू, लड़की मुसलमान.’’ ऊपर से मेरे जजमानों के गाँव में चूड़ी बेचवाने ले आया है. मैं क्या खाऊंगी रे नानजात.’’

बुढ़िया को गुसियाते देख नौजवान ने झुककर पाँव छू लिया. बुढ़िया दो कदम पीछे हट गई. उसने कहा, ‘‘हरामी मुसलमान लड़की के साथ आया है तो सलाम कर, परनाम-सरनाम को भूल जा. और चल भीतर. बाकी बातें तो होती रहेंगी.’’

भीतर उजाला था. कमरों में दिए जल रहे थे. आँगन का तुलसीचौरा भी रोशन था. मिट्टी का दिया वहाँ भी दिपदिपा रहा था. अब लड़की भी संभल गई थी. गाय अपने कोठे में पगुराती खड़ी थी. बुढ़िया ने घर की बहू से लोटे में पानी मंगवाया. फिर पास बिठाकर कहा, ‘‘बिंदा तुम्हारे हाथ की चूड़ी तो बेटा ठीक-ठाक है मगर यह तो जवान तुरकिन-तुरका तुम्हारे आँगन में आए हैं ये तुम्हें अब से चुड़ी पहनाएँगे. मैं जान गई कि ये जीवनभर के लिए एक होकर आए हैं. सुन तो रही थी काफ़ी दिनों से लेकिन इतनी जल्दी इश्क की आग में ये कूद मरेंगे यह नहीं जानती थी.’’

 मगर इस बार वह मेहरुन्निसा से हार गई. वह भला क्या हारती. दो बरस पहले उसकी जवान बिटिया का इंतकाल हो गया तब से जमीला बी टूट सी गई. मेहरुन्निसा नहीं जानती थी मगर गाँव वाले जो वहाँ खड़े थे समझ गए थे जमीला बी ‘दाई’ कह देने से ही पस्त हो गई. जब से उसकी बेटी मरी है तब से जमीला बी का रंग-ढंग बदल गया है

बिंदा ने कहा, ‘‘दाई, चुड़ी तो ठीक है. महीने भर बाद पहन लूंगी.’’

बुढ़िया ने फिर कहा, ‘‘पहन ले बेटी, मैं अपना गाँव-गंवई बेटी जानकर इसे आज से देना चाहती हूँ. तू भी बेटी यह भी बेटी. चल हाथ बढ़ा.’’

बुढ़िया के आदेश को टाला भी नहीं जा सकता था. उसके कहने पर बिंदा ने हाथ बढ़ा दिया. मेहरुन्निसा ने बिंदा के हाथ को हलके से पकड़ा. यह हाथ नहीं रोज़ी-रोज़गार पाने का फ़रमान था जो उसने बुढ़िया की मेहरबानी से हासिल कर लिया था. वह ख़ुशी दबा नहीं पा रही थी. उसका पति रामलाल भी मुच-मुच हँस रहा था. चूड़ी पहन लेने के बाद घर की बहू बिंदा ने बुढ़िया को दोनों हाथ से झुककर प्रणाम किया. छन्नर-छन्नर चूड़ियाँ बजती रही. बुढ़िया ने जी भर आशीष दिया फिर बिंदा नई जवान तुरकिन को प्रणाम करने झुकी. मेहरुन्निसा ने उसके हाथों को चूमकर कहा, ‘‘भाभी मुझे प्रणाम मत करो. केवल मया दो ताकि मैं तुम्हारे भाई के साथ जिनगी ठीक-ठाक काट सकूँ. तुम सबकी गुलामी करुं और यही मरुँ.’’ यह कहकर वह फिर सुबक उठी.

बुढ़िया ने कहा, ‘‘अब क्यों रोती है रे. अब तो तुम्हें हँसना है. चल आज मेरे घर चल. कल फिर आ जाना इस गाँव में. मैं भी आऊंगी. किसी से कहकर तुम्हें आसरे के लिए खोली भी दिला दूंगी. चल उठ.’’

*********

रावां गाँव की तुरकिन बुढ़िया जमीला बी का इस इलाके में कई कारणों से ख़ूब मान-सम्मान था. वह कठिया, ढाबा, पहंदा गाँवों की मालकिन थी. पिछले 50 बरसों से इन गाँवों में जमीला बी ही चूड़ी पहनाती थी. दूसरी तुरकिन उसके गाँव-गंवई में आई तो दिया तीन लात जमीला बी ने. जमीला पिछले बरस ही बेवा हुई. उसके शौहर का कम जलवा नहीं था इस इलाके में. सब उसे उस्ताद पीर अली के नाम से जानते थे. पीर अली मुहर्रम की वो मजलिस जमाते कि पचासों गाँवों के लोग देखने आते. पीर अली शेर ही नहीं बनते थे बल्कि शेर दिल इन्सान भी थे. आधा तो पीर अली के डर से कोई उधर रोज़ी-रोज़गार पर डाका नहीं डाल पाया. आधे की कसर जमीला बी अपनी गाली और लतमारी से निकाल लेती.

मगर इस बार वह मेहरुन्निसा से हार गई. वह भला क्या हारती. दो बरस पहले उसकी जवान बिटिया का इंतकाल हो गया तब से जमीला बी टूट सी गई. मेहरुन्निसा नहीं जानती थी मगर गाँव वाले जो वहाँ खड़े थे समझ गए थे जमीला बी ‘दाई’ कह देने से ही पस्त हो गई. जब से उसकी बेटी मरी है तब से जमीला बी का रंग-ढंग बदल गया है. किसी जवान लड़की के मुँह से अपने लिए दाई, माई, अम्मा संबोधन सुन भर ले जमीला, ऐसी घुलने सी लग जाती है जैसे हवा पाकर रुई से बनी बम्बई की मिठाई पिघलती है.

जमीला ने मेहरुन्निसा से सारा क़िस्सा सुना. मेहरुन्निसा और रामलाल दोनों महीने भर पहले अपने गाँव देवकर से भागे हैं. उड़ती ख़बर जमीला और गाँव के दूसरे लोगों को भी लगी थी. मगर वे कहाँ है यह पता नहीं चला था. पता तो आज चला जब एक टुकना भर चूड़ी लेकर जमीला बी के गाँव में मेहरुन्निसा अपने शौहर के साथ आ धमकी. पूछने पर मेहरुन्निसा ने बताया कि दोनों ने जब तय कर लिया कि जीना मरना साथ-साथ ही है तो एक दिन दोनों रायपुर भाग चले. वहाँ मदरसे में मुफ्ती साहब ने निकाह पढ़वा दिया. बैजनाथ पारा में मेहरुन्निसा के दूर के मामू रहते थे. उन्होंने ही आसरा दिया. बीच में गाँव वालों ने बवाल मचाया तो मामू ने ही आगे बढ़कर संभाला. उन्होंने कह दिया कि अब ज़िंदगी भर के लिए दोनों एक हो गए हैं. अपना जिए मरें. किसी को बीच में आने की ज़रूरत नहीं है. हाँ अगर ये मदद माँगते, तो रौब जमाता जो है जमाना अपना. लेकिन अपना हाथ जगन्नाथ वाला मामला है. टोकरी भर चूड़ी मैं दे दूंगा. छोकरा मेहनती है. हुनर भी सीख लेगा. जी-खा लेंगे किसी तरह.

मामू का दिया हुआ एक टुकना ही अब मेहरुन्निसा के लिए जीवन का सहारा बन गया. हिम्मत कर रांका में आई. जमीला बी के जासूसों ने तुरत-फुरत ख़बर दे दी. लोग ऐसी नौटंकी कई बार देख चुके हैं. मगर यह पहली बार हुआ कि जमीला बी रोज़गार पर डाका डालने वाली मेहरुन्निसा को ख़ुद अपने घर लेकर चली गई.

सब इस बदलाव से अकबका गए थे. गाँव में सुखराम दाऊ ने कहा कि अब मुझे लगा कि जमीला बी अकेली हो गई है. वर्ना पीर अली के रहते जमीला बी रे कहने वालों को चांटा रसीद करती और हाथ उठते देख हँसिया उठा लेती थी. मगर बदलना तो सबको पड़ता है. चलो अच्छा हुआ.

*********

रांका गाँव में सबको जगह मिली. यहाँ मेहमान बनकर जाने कितने लोग आए और यहीं के बासिंदे हो गए. एक पूरा मुहल्ला ही है आन गाँव से आकर बस गए लोगों का.

मुहल्ले को सगा मुहल्ला के नाम से आस-पास के गाँवों के लोग जानते हैं. अब तो यहाँ सगा-तरिया भी बन गया है. सगा-तरिया बना अकाल के दिनों में. तालाब के पास ही मेहरुन्निसा को घर मिला. संतू यादव ने गायों के लिए बने अपने कोठे को उसे दे दिया. गाय उसकी बकरी कोठे में बंध गई.

चित्रांकन -हरीश परगनिहा
चित्रांकन -हरीश परगनिहा

रामलाल को नया नाम भी मिल गया था. रहीम मियाँ. लेकिन गाँव वाले उसे रामलाल ही कहते. इतने दिनों में रामलाल की दाढ़ी भी बढ़ आई थी.

मेहरुन्निसा अब रामलाल ऊर्फ रहीम मियाँ को साथ लेकर करीब के गाँवों में भी चूड़ी पहनाने जाती. और तो और जमीला बी के गाँव में भी वह चूड़ी पहनाने लगी. जमीला बी वैसे भी थक गई थी. इस क्षेत्र में जमीला बी के गाँव कठिया में ही दस घर के मुसलमान थे. वहीं मोहर्रम की मजलिस लगती. आसपास के गाँव के लोग शामिल होते. रामलाल भी जाता था. वह ताजिए के लिए काटी गई सनपने की पन्नियों को चिपकाने में मदद करता था. रांका गांव के छत्तरासिंह ताजिया बनाने में माहिर थे. छत्तरसिंह तो तीन में से बीच वाले हाल को भी उठाते थे. मगर रामलाल से कोई हाल नहीं उठा. उसने प्रयास तो किया मगर सफल नहीं हुआ. सगा-तरिया बना तो तालाब किनारे एक छोटी सी ज़मीन मेहरुन्निसा को भी आबंटित कर दी गई. चार पैसे आए तो उसने दो कमरों का मिट्टी का मकान भी बना लिया.

जिस दिन वह अपने नए मकान में गई उस दिन रामलाल ने तालाब के किनारे एक बड़ का तीन फिट ऊँचा पौधा रोप दिया. उसने पहले तीन फीट गहरा गड्ढा खोदा. गड्ढे की गहराई से चकित होकर जब रामू मंडल ने पूछा तब रामलाल ने कहा कि जितने ऊपर हो भाईजी उतने ही नीचे रहोगे तब जियोगे. जहाँ ऊपर-ऊपर बड़े होकर लहराते रहे और नीचे गहराई ही न रही तो समझिए कि आपको सूखना ही है.

रामू मंडल ने रामलाल की पीठ पर धौल जमाते हुए कहा, ‘‘वाह भाई, तभी मैं कहता था कि मेहरुन्निसा ने आख़िर अपना धरम तुम्हारे लिए क्यों बिगाड़ा. तुम हो ही नजूमी.’’

‘‘इसमें धरम बिगाड़ने की कौन सी बात हो गई भई. वो मेहरुन्निसा मैं रहीम. धरम कहां बिगड़ा उसका.’’

रामू मंडल ने कहा, ‘‘बड़ लगा रहे हो बाबू तो हो तो हिंदू ही. बिगड़ा कि नहीं उसका धरम. बिचारी है मुगालते में कि तुम रहीम हो गए. हो तो असल में राम ही न...’’

उसका इतना कहना था कि पास में खड़े लोग हो-हो कर हँसने लगे.

रामलाल ने पेड़ को कुछ इस तरह प्यार से पानी-खाद दिया कि साल भर में वह अच्छा खासा छतनार हो गया. रामलाल तालाब में नहाने के बाद बिना पाँच लोटा पानी डाले घर नहीं आता था. गर्मियों में तो सुबह-शाम बड़ को बाल्टी-बाल्टी पानी देता.

थोड़े ही दिनों बाद रामू मंडल ने सोच-विचार कर एक पत्थर उस बड़ पेड़ के नीचे रख दिया. पत्थर पर चंदन लगाते समय रामू ने साथियों से कहा अब देखते हैं कि साला पानी डालता है कि नहीं.

देखते ही देखते ही बड़ पेड़ के नीचे देवता आ बिराजे. दूसरे दिन ताका-पासा चला. रामू मंडल साथियों सहित तालाब में ठीक उसी समय पहुँचा जब रामलाल नहाने गया. रामलाल ने रोज़ की तरह पाँच लोटा पानी पेड़ की जड़ों में और एक लोटा पत्थर को चढ़ाया.

सब देखते ही रह गए.

*********

मेहरुन्निसा गाँव-गाँव चूड़ी पहनाने रामलाल के साथ ही जाती. शाम ढले दोनों गाँव आते. एक दिन दोनों गाँव लौट रहे थे तो रास्ते में 10-12 लड़कों का झुंड गाँव से निकलता हुआ दिखा. सबके हाथों में भगवा झंडा था. सब जय श्रीराम जय श्रीराम का नारा लगा रहे थे.

एक नौजवान कुछ अलग ही नारा लगा रहा था

‘‘मारेंगे, मर जाएंगे, मंदिर वहीं बनाएँगे, मस्जिद तोड़ गिराएँगे.’’

चित्रांकन -हरीश परगनिहा
चित्रांकन -हरीश परगनिहा

मेहरुन्निसा को अटपटा लगा. गाँव पहुँचकर उसने दरयाफ़्त किया. पता लगा कि गाँव में स्वयं सेवकों को लेकर अयोध्या जाने के लिए तैयारी बैठक हुई है.

रांका गाँव में राम मंडल दल प्रमुख बना था. उसने कहा कि धर्म पर संकट आया है. मैं ज़रूर जाऊँगा मस्जिद गिराने. अब राम के देश में रहीम का राज नहीं चलेगा.

रहीम उर्फ रामलाल को लगा जैसे उसे चिढ़ाने के लिए रामू मंडल ऐसा कुछ कह रहा है. चलते-फिरते लोगों को लटारा मारना उसे अच्छा लगता था. लोग अपना दामन बचाकर सरक लेते. इसीलिए धीरे-धीरे रामू का हौसला भी बढ़ा. अब तो वह एक जवान शेर पर सवार होने के नशे में चूर हो रहा था. गाँव भर में दिनरात अल्ल-बल्ल बकता. आख़िर एक दिन रामू मंडल आसपास के गाँवों के कारसेवकों के साथ अयोध्या के लिए निकला. गाँव में रामसत्ता दल के गवैयों ने उसे तालाब तक गाते-बजाते हुए विदा किया. गवैए ढोलक बजा-बजा कर गा रहे थे.

‘‘संत मिलन को जाइए, तज माया अभियान हो
ज्यों-ज्यों पग आगे बढ़े, कोटिन यज्ञ समान हो
राम राम भजन बोलो...’’

तालाब के पास आकर रामू मंडल रुक गया. वह बड़ पेड़ के पास गया. पेड़ के पास स्थापित सिंदूर पुते देव को उसने जल चढ़ाया फिर जय श्रीराम कहते हुए बढ़ चला.

दस दिन बाद रामू मंडल गाँव लौटा. उसके झोले में ईटों के टुकड़े थे. एक बड़ा टुकड़ा उसने तालाब में जाकर पानी के भीतर उछाल दिया. फिर कुछ टुकड़ों को गाँव वालों में बाँट दिया. उसी दिन लोगों ने जाना रामू मंडल बाबरी मस्जिद को तोड़कर लौटा है. ईटों के टुकड़ों को उसी विजय की याद में वह ले आया था. तब से रामू मंडल जाने क्या-क्या सूत्र वाक्य फेंकता था. धर्म है तो संसार है. आन देस का धर्म हिंदुस्थान में नहीं चलेगा. आन गाँव के लोग अनगैंहा ही रहेंगे. दुश्मन को चाहे जितना मिलाकर रखो रहेगा वह बैरी ही...आदि-आदि बयान वह फेंकता. गाँव वालों पर बयानों का कोई असर नहीं हो रहा था.

अचानक एक घटना कुछ ही दिनों में उसी बड़ पेड़ के पास घट गई.

रामलाल उर्फ रहीम को रात के अंधेरे में तीन-चार लाठीधारियों ने मारकर वहीं गिरा दिया.

मेहरुन्निसा को पता चला तो वह विलाप करती हुई घर-घर घूमी. रांका कठिया और सभी गाँव के लोग मरणासन्न रामलाल को देखने आए. तीन दिन ही वह किसी तरह जी सका.

चौथे दिन रामलाल की साँसे उखड़ गईं.

मेहरुन्निसा का जग अंधियार हो गया. जमीला बी चारों दिन उसके साथ रही. लाश को दफनाने का इंतज़ाम होने लगा. तभी रामू मंडल और उसके साथी आ धमके. आसपास के गाँवों के लोग भी आ जुटे थे.

रामू मंडल ने दहाड़ते हुए कहा, ‘‘ लाश को दफनाया नहीं जाएगा. हिंदू की लाश है, जलेगी.’’

सन्नाटा खिंच गया. ऐसा दुख का समय और ऐसी नंगई.

सबको चुप देखकर रामू ने फिर कहा- ‘‘बड़ पेड़ पर पानी देता था, देवता तक में जल चढ़ाता था. इसे जलना होगा.’’

जमीला बी से रहा न गया. उसने फुफकारते हुए कहा, ‘‘अरे लाश पर तो दावा मत करो रे शैतानों.’’ हो गया सो हो गया. अब तो सुकून से उसे जाने दो. यह तो सरासर नंगई है.’’

मेहरुन्निसा सुबकती रही. रामू पर इसका कुछ भी असर नहीं हुआ. उसने फिर कहा कि ‘‘नंगई है तो नंगई ही सही. मगर होगा वही जो धर्म के लिहाज से सही होगा. हमारे रहते किसी हिंदू की लाश दफ़नाई नहीं जा सकती. चाहे इस मसले को हल करने में और भी लाशें क्यों न गिर जाएँ.’’

जमीला बी ने दबे स्वर में पूछा, ‘‘तो क्या लाश यूँ ही सड़ जाएगी.’’

रामू ने जवाब दिया, ‘‘विधर्मी का तो जीवन ही सड़ जाता है लाश की क्या बात है. मसला है, हल हो तो लाश ठिकाने लगे.’’

**********
परदेशीराम वर्मा
एलआईजी -18, आमदी नगर
हुडको, भिलाई, छत्तीसगढ़

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