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शुक्रवार, 03 अगस्त, 2007 को 04:19 GMT तक के समाचार
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एक लड़की का नाम इच्छामती

चित्रांकनः हरीश परगनिहा
चित्रांकनः हरीश परगनिहा

क्वाँर का महीना और तीसरे पहर की धूप थी. क्वाँर महीने की धूप का रंग पीला पड़ रहा था और बदन सीझ रहा था. छूप की छाया छरहरी थी और रंगत साँवली.

दूर पर एक लड़की थी और अकेली थी. अकेली लड़की सांवली थी और उसकी काया छरहरी.

वह किसी का रास्ता देख रही थी. समय काटने के लिए वह धूप के साथ कौतुक करने लगी और अपनी छाया के साथ खेल रचाने लगी. पहले, वह कुछ कदम तिरछी चाल चली फिर ताड़ की आड़ लेकर छिपने लगी. तीसरे पहर की धूप उसके कपड़े पकड़ कर खींच रही थी और वह अपने हाथ ऊँचे करके खिड़की को छू रही थी.

खिड़की के साथ वाली टेबल पर एक कब्जा करके दो दोस्त वहाँ देर से बैठे थे. एक ने अपने साथ वाले वृद्ध को भी वह कौतुक दिखाना चाहा और उससे कहा-‘देखो.’

वृद्ध एकाएक समझ नहीं पाया. उसकी उम्र उसे अपनी गिरफ्त में ले चुकी है. अब बातें उसकी समझ में देर से आती है. वृद्ध ने अकचका कर धूप की उस परछाँई पर अपना हाथ रखा, उसे खिड़की की काँच से लौटकर उनकी टेबल पर पड़ रही थी. अब वह टेबल से नीचे की तरफ सरक रही थी. वृद्ध ने धूप की परछांई पर अपना हाथ कुछ इस तरह रखा, जैसे वह उसे बीच में रोक लेगा. हमवयस ने उसे समझाया-‘यहाँ नहीं. वहाँ, खिड़की से बाहर देखो.’

बाहर बगीचा था. तीसरे पहर के इस समय में बगीचा अकेला और सुनसान था. ताड़ के ऊँचे पेड़ उदास लग रहे थे. दिन भर की थकी-मांदी धूप ताड़ के बड़े-बड़े पत्तों पर ठहर कर सुस्ता रही थी. वृद्ध को लगा कि हमवयस अपनी और उसकी उम्र की तरफ इशारा कर रहा है.

‘हाँ, अपनी उम्र अब थकने लगी है. कहीं ठहर कर सुस्ताने का मन करता है.’ वृद्ध ने अपने मन की बात बताई. इस समय उसके मन में उसकी पत्नी थी. वह और उसकी पत्नी, जब दोनों घर पर होते हैं तो शाम के ऐसे समय में साथ बैठकर पीछे छूट गए दिनों की बातें किया करते हैं.

 अभी वह प्रेम करने की भरपूर उम्र में थी. पेड़ के साथ टिक कर खड़े होने से उसका छरहरापन और उभर आया था. क्वाँर महीने के तीसरे पहर की धूप में उसकी छाया दूर तक निकल रही थी. लड़की का ज़ोर न अपनी काया पर था और न उसकी छाया पर

पीछे छूट गए वे दिन सर्दियों की खिलती हुई धूप की तरह मुलायम हैं और अब स्मृतियों में खिलखिलाते हैं. उनका स्पर्श मुलायम होता है. इस समय उसकी पत्नी अपनी बेटी के घर गई हुई है. वहाँ, वह अपनी बेटी के बच्चों की जतन कर रही होगी. और वृद्ध, यहाँ इंडियन कॉफी हाउस में खिड़की के साथ वाली टेबल पर कब्जा जमाए, हमवयस के साथ अकेला बैठक कॉफी पी रहा है. हमवयस ने उसे वापस खींचा और अभी के समय के साथ जोड़ा- ‘ आजकल थकने और सुस्ताने की बातें नहीं की जातीं. आजकल तो, लाइफ बिगिंस आफ्टर सिक्सटी.’

‘ज़िंदगी मुहावरे से नहीं चलती.’ वृद्ध ने साठ-पार की शुरुआत में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई. हमवयस ने फिर भी वृद्ध को उकसाया-ये मुहावरा नहीं, आज की ग्लोबल सोसायटी का सच है. आजकल बड़ी कंपनियाँ अपने यहाँ साठ-पार के अनुभवी लोगों को कांट्रैक्ट पर रखना अधिक पसंद कर रही हैं.’

लेकिन वृद्ध अपनी पेंशन से संतुष्ट था. उसकी ज़रूरतें उसकी पेंशन से पूरी हो जाती हैं. फिर भी इच्छाएँ तो होती हैं. इच्छाएँ ज़रूरतों से अलग होती हैं. हमवयस के साथ रहते हुए वह इन इच्छाओं का जीवन जी लेता है. इतनी देर में उसकी उत्सुकता जागी और उसने हमवयस से पूछा-‘खिड़की से बाहर तुम क्या दिखा रहे थे?’

तब तक लड़की खिड़की से हट चुकी थी. अब वह पेड़ के तने के साथ टिक कर कोई पुस्तक पढ़ रही थी. और बीच-बीच में सर उठाकर आकाश को देख रही थी. हमवयस ने अनुमान किया कि वह कोई प्रेम-कविता पढ़ रही है और आकाश को सुना रही है. अभी वह प्रेम करने की भरपूर उम्र में थी. पेड़ के साथ टिक कर खड़े होने से उसका छरहरापन और उभर आया था. क्वाँर महीने के तीसरे पहर की धूप में उसकी छाया दूर तक निकल रही थी. लड़की का ज़ोर न अपनी काया पर था और न उसकी छाया पर. हमवयस ने अपने मन की बात वृद्ध को बताई -‘यह लड़की किसी के प्रेम में डूबी हुई है. उसी से मिलने के लिए इस सूने समय में यहाँ आई है.’

चित्रांकन-हरीश परगनिहा
चित्रांकन-हरीश परगनिहा

‘इसके स्तन कितने भरे-भरे हैं?’ वृद्ध ने अपनी लोलुपता जताने में कोई संकोच नहीं किया. फिर उसने अपने अनुभव की बात हमवयस को बताई- पुरुष का स्पर्श पाकर स्त्री पृथ्वी की तरह खिलती है.’

हमवयस हैरान था कि वृद्ध एक पराई लड़की को किस नज़र से देख रहा है. क्या, मेरा यह दोस्त अपनी बेटी के शरीर को भी ऐसे ही देख सकेगा? वृद्ध को हमवयस के मन की बात समझने में कोई परेशानी नहीं हुई. उसने हमवयस को समझाया-‘आदमी अपनी औरत के बदन को जैसे देखता है, अपनी बेटी को उस नज़र से नहीं देखता.’

यह घर-गृहस्थी के अनुभव से समझ में आने वाली बात है. तुम नहीं समझोगे. वृद्ध बेखयाली में ही हमवयस के अकेलपन पर चोट कर बैठा. जब उसे इस बात का अहसास हुआ तो वह अपने कहे पर लीपा-पोती करने लगा-एक पराई लड़की के साथ हमारा क्या लेना-देना?

लेकिन हमवयस उस पराई लड़की के साथ एक अनजान किस्म का अपनापा पालने लगा था. अब वह इस अपनापा को अभी के बाद भी बनाए रखाना चाहता था. वह उस लड़की को कोई एक नाम देना चाहता था.

‘किसी नदी का नाम कैसा रहेगा? ’ उसने वृद्ध की राय माँगी.

‘गंगा, यमुना या सरस्वती. कुछ भी रख लो.’ वृद्ध ने बेमन से कहा. फिर भी हमवयस ने एक अलग सा नाम उसके सामने रखा ‘इच्छामती क्यों नहीं? एक लड़की का नाम इच्छामती.’

‘उसे मैं नहीं जानता’ वृद्ध इच्छामती नाम की नदी को नहीं जानता था. अब उसका मन भी इस खेल से उचट रहा था. पेड़ के तने के साथ टिकी हुई वह लड़की अब दूर थी, फिर भी नज़दीक लग रही थी. उसका भराव यहाँ से दिख रहा था और भरी-भरी सी वह साँवली लड़की इच्छा जगा रही थी. लेकिन वृद्ध की इच्छा अब थकने लगी थी.

तभी उस साँवली लड़की ने पेड़ का तना छोड़ा और तेजी से उधर दौड़ी, जिधर थोड़ी सी धूप अभी बची हुई थी. जैसे वह उस बची हुई धूप को पकड़ लेगी. वृद्ध ने अनुमान किया कि उधर से उसका प्रेमी आया होगा.

हमवयस उस साँवली लड़की के साथ एक अजब तरीके से अपना मन जोड़ चुका था और अभी यह उसमें डूबा हुआ था. उसने वृद्ध से पूछा-‘क्या तुमने नदी को समुद्र से मिलते देखा है? वह दिव्य होता है.’

वृद्ध ने नदी को समुद्र से मिलते नहीं देखा था. उसके मन में आया कि इसके जवाब में यह हमवयस से पूछे-‘क्या तुमने जाना है कि औरत कैसे आकर अपने आदमी से मिलती है? वह अपार तृप्तिदायक होता है.’

लेकिन उसने मन की बात मन में दबा ली और वही बात अलग तरीके से कही-‘तुम ठहरे छड़े-छरहरे आदमी. जहाँ चाहो, जाओ. जो चाहो, देखो. घर-परिवार का आदमी तो एक खूंटे से बंधा होता है.'

चित्रांकन-हरीश परगनिहा
चित्रांकन-हरीश परगनिहा

वृद्ध को अब हमवयस की बातों में रस नहीं आ रहा था. जिस पेड़ के साथ टिककर वह साँवली लड़की खड़ी थी, वहाँ अब सूनापन था. अब धूप और छाया का खेल भी वहाँ नहीं बचा था. क्वांर महीने के तीसरे पहर की धूप एकदम से शाम की तरफ झुकी और डूबने लगी.

‘अब दिन छोटे होने लगे.’ दोनों ने एक साथ कहा. वृद्ध ने कहा-‘दिया-बत्ती का समय हो रहा है. अब घर चलना चाहिए.’

अब वृद्ध को घर बुला रहा था. लेकिन हमवयस समझ नहीं पा रहा था कि वह कहाँ जाए. उसने वृद्ध से कहा-‘तुम चलो. मैं अभी, यहीं रुकूंगा.’

वृद्ध के जाते ही एक उदास किस्म का सूनापन वहाँ व्यापने लगा. इससे बचने के लिए वहाँ से बाहर निकल कर वह सड़क पर आ गया. लेकिन बाहर भी वही सूनापन था, जो भीतर था. सारे का सारा शहर इस समय घरों की तरफ भागा जा रहा था और सड़क पर कोई नहीं था.

हमवयस ने अनुमान किया कि वृद्ध घर पहुंच चुका होगा. वह भरा-पूरा घर होगा. घर में आंगन होगी. आंगन में तुलसी. तुलसी का चौरा होगा और उस पर सांझाबाती करती घर की बहू होगी. इस समय घर का मुखिया घर में झूले पर बैठा धर्मपदों का पाठ कर रहा होगा.

वृद्ध घर पहुंच चुका था. लेकिन घर पर उसकी पत्नी नहीं थी. वह अपनी बेटी के घर गई हुई है. वृद्ध के मन में सांवली लड़की बनी हुई थी, जिसने उसे ललचाया था. वृद्ध को अपने अनुभव पर भरोसा है कि इस समय वह लड़की अपने प्रेमी के साथ होगी और उसकी काया पृथ्वी की तरह खिल रही होगी.

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सतीश जायसवाल
बृहस्पति चौक
बिलासपुर, छत्तीसगढ़, 495001

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