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नरेश कात्यायन की ग़ज़लें | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
एक
सनम भी चश़्मेतर होने लगा है, करिश्मा जो मोहब्बत का इधर था, उसके अफ़साने में गाहे-बगाहे, अज़ब सा दर्द है जो मेरे दिल में, शरीक़े ज़िंदगी तो हो न पाया, मेरा दिल एक रेगिस्तान सा था, दो मुझे देखकर छुपे हुए हैं घर में बड़े लजीले लोग, जान बचाकर भागो, तक्षक बोला अपनी नागिन से, यह वसंत के ठेकेदारों की कैसी मनमानी है, चमक लग गई है आँखों में कल बुधुआ के बेटे के, शोषण की जोंकों ने इनका रस पहले ही चूस लिया, प्रतिभा के मजबूत करों में बेकारी है, चिंता है, कुछ दिन से मेरी बस्ती में ये अजीब पागलपन है, तीन
तुझको करके तलाश देखूँगा, बन के विग्रह जिया हूँ मैं सदियों, जिससे डरता है हरेक व्यक्ति यहाँ, वो मेरी प्यास के मुक़ाबिल है, सारी दुनियाँ में तलाशा ख़ुद को, ये अंधेरा मिटे, मिटे न मिटे, अपनी दुनिया से तेरी दुनिया में, * * * * * * * * * * |
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