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हिंदी सम्मेलन में ग़ैर भारतीय हिंदी भाषी | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारतीय मूल के हिंदी भाषी तो करोड़ों की संख्या में विश्व भर में मिल जाएंगे. लेकिन हिंदी भाषा का यह भी कमाल है कि हज़ारों की संख्या में ग़ैर भारतीय हिंदी भाषी भी आपको विश्व के कोने कोने में मिल जाएंगे. ऐसे ही कुछ हिंदी के विद्वान जो विदेशी मूल के हैं न्यूयॉर्क में विश्व हिंदी सम्मेलन में पधारे हुए हैं. प्रोफ़ेसर हरमन वैन ऑल्फन ऑस्टिन शहर के टेक्सास विश्वविद्यालय में हिंदी के प्रोफ़ेसर हैं. ख़ुद डच मूल के हैं लेकिन अब अमरीकी हो गए हैं. प्रोफ़ेसर ऑल्फन ने कई दशक पहले हिंदी सीखी और उसके लिए उन्होंने भारत तक का सफ़र किया. अपनी हिंदी की शिक्षा और उसके साथ ज़िंदगी के सफ़र के बारे में प्रोफ़ेसर हरमन वैन ऑल्फन कहते हैं, “ चालीस साल पहले मैंने टेक्सास विश्विद्यालय में एक विद्यार्थी की हैसियत से हिंदी सीखी और फिर वहीं आज तक हिंदी पढ़ा रहा हूँ.” हालैंड के एम्स्टरडैम शहर में पैदा हुए प्रोफ़ेसर हरमन वैन ऑल्फन 12 साल की उम्र में ही अमरीका आ गए थे. वो कहते हैं कि यह संयोग ही था कि उन्होंने विश्वविद्यालय में पढ़ाई के दौरान एक विदेशी भाषा चुने जाने का जब मौक़ा आया तो हिंदी ही चुनी. उनका कहना है, “ संयोग ही कहेंगे क्यूंकि जीवन में तो ऐसा होता है न. मैं यह तो नहीं बता सकता कि मुझे हिंदी में क्यूं ज़्यादा दिल्चस्पी होने लगी, मैंने क्यूं हिंदी चुनी, इसका विश्लेषण आसानी से नहीं हो सकता.” विश्वविद्यालय की ओर से ही उन्हे छात्रवृत्ति मिली और उन्होंने भारत जाकर दो साल तक विभिन्न शिक्षण संस्थानें में हिंदी की पढ़ाई की और अब वह अमरीका में ही छात्रों को हिंदी सिखाते हैं. इनकी एक बेटी का जन्म भी भारत में ही हुआ था. वह कई बार भारत भी जा चुकी हैं. लेकिन प्रोफ़ेसर ऑल्फन को यह मलाल है कि उनके बच्चों में से किसी ने हिंदी सीखने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई. वो कहते है, “यह बड़ी मुश्किल बात है अब बच्चों को तो आप ज़ोर डालकर नहीं कह सकते कि हिंदी सीखो.” ऑस्टिन शहर के टेक्सास विश्विद्यालय में इस साल से प्रोफ़ेसर ऑल्फन ने हिंदी और उर्दू को साथ पढ़ाने की एक नई योजना शुरू करवाई है. प्रोफ़ेसर ऑल्फन का कहना है कि भारत में हिंदी की तरफ़ और ध्यान दिया जाना चाहिए तब उसे संयुक्त राष्ट्र की भाषा बनाए जाने की मांग की जानी चाहिए. कोरिया की हिंदी विद्वान इसी तरह एक और विदेशी मूल की हिंदी की प्रोफ़ेसर वू जो किम दक्षिण कोरिया की रहने वाली हैं और वहां के हानकूक विश्वविद्यालय में हिंदी पढ़ाती हैं. प्रोफ़ेसर वू जो किम पिछले 35 साल से हिंदी से ही जुड़ी हुई हैं. उन्होने दक्षिण कोरिया में उस समय हिंदी सीखने की शुरूआत की जब वहां पहली बार हिंदी के विभाग की स्थापना हुई.
वो कहती हैं, “मैंने सोचा कि जो नई भाषा है उसको सीखते हैं क्यूंकि वह चुनौती देने वाली चीज़ थी. हिंदी लेने का मतलब भारत की ओर कोई लगाव या हिंदी से प्रेम ऐसा कुछ नहीं था बस यह नई भाषा थी.” प्रोफ़ेसर किम कहती हैं कि शुरू में बहुत कठिनाई हुई थी. वो कहती हैं कि शुरू शुरू का मामला था इसलिए कोई मार्गदर्शन करने वाला भी नहीं था. अब प्रोफ़ेसर वू जो किम हिंदी की विद्वान हैं. उन्होंने भारत में जेएनयू में पढ़ाई करने के बाद विश्वभारती विश्वविद्यालय से पीएचडी भी की है. वो कहती हैं कि दिल्ली और बंगाल में रहने के दौरान उनको हिंदी फ़िल्मों से ज़्यादा नाटक देखना पसंद थे और वो अब भी जब भारत जाती हैं तो नाटक ज़रूर देखने जाती हैं. कोरिया में हिंदी की पाठ्य पुस्तकें तैयार करने के अलावा वह हिंदी साहित्य से संबंधित काम में ही लगी रहती हैं और मूल पात्रों पर आधारित हिंदी साहित्य के इतिहास पर काम कर रही हैं. वो कहती हैं, '' चार साल पहले से मैंने साखी, पदमावत, सूरसागर, रामचरित मानस जैसे मूल स्रोतों को पढ़ना शुरू किया है. यह पढ़कर जो कुछ मुझे लगा है उसके आधार पर साहित्य का इतिहास लिख रही हूँ.'' आजकल वह भारत में सांप्रदायिकता पर भी लेखन का काम कर रही हैं. वो अभ्रंश साहित्य पर भी काम कर रही हैं. इसके अलावा वो कोरियाई भाषा को हिंदी में अनुवाद करने वाला शब्दकोष भी बना रही हैं. |
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