कॉन्सटैंटीन कवाफ़ी ग्रीक कवि 1863-1933  | | | चित्रांकन - हरीश परगनिहा |
उकताहट एक ऊबाने वाला दिन लाता है दूसरा बिलकुल वैसा ही उबाऊ. एक सी चीज़ें घटेंगी, वे घटेंगी फिर... वही घड़ियाँ हमें पाती हैं और छोड़ देती हमें. गुज़रता है महीना एक और दूसरे में आता. कोई भी सरलता से घटनाएँ भाँप ले सकता है आने वाली; वे वही हैं बीते दिन की बोझिल वाली. और ख़त्म होता है आने वाला कल बिना एक आने वाला कल लगे * * * * * एक रात कमरा सस्ता और गंदला था. जारज शराबखाने ऊपर छिपा. खिड़की से तुम गली देख सकते थे सँकरी और कूड़े-कचरे से भरी. नीचे से आती कुछ कामगारों की आवाज़ें. पत्ते खेलते और शराब के दौर चलते हुए. और वहाँ काफ़ी बार बरते, निचले बिस्तर पर मेरे पास प्यार की देह थी, मेरे पास होंठ थे, आनन्द के गुलाबी होंठ और विलासभरे... गुलाबी होंठ ऐसे आनंद के, कि अब भी ज्यों ही मैं लिखता हूँ, इतने बरसों बरस बाद! अपने अकेले घर में, फिर से हूँ धुत्त नशे में.  | | | चित्रांकन - हरीश परगनिहा |
* * * * * मकान की शरण में बीते कल हवाखोरी करते एक सीमावर्ती पड़ोस में, मैं गुजरा उस मकान के नीचे जहाँ अक्सर जाता था जब बहुत जवान था मैं. वहाँ प्रेम ने अपनी अचंभित करती मजबूती से जकड़ ली मेरी देह. और बीते कल ज्यों मैं गुजरा पुरानी सड़क के बगल से दुकानें, बाज़ू-पटरियाँ, पत्थर, दीवालें, बाल्कनियाँ और खिड़कियाँ बनी थी सुंदर एकाएक प्रेम के जादूजोर से; वहाँ असुंदर कुछ भी नहीं बचा था. और ज्यों मैं खड़ा रहा वहाँ, और दरवाज़े को देखा, और खड़ा रहा, और झुका मकान तले, मेरे होने ने लौटा दिया वापस सारा जमारखा आनंदमय ऐन्द्रिय जज़्बा. * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * अनुवाद - पीयूष दईया |