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रविवार, 24 जून, 2007 को 09:48 GMT तक के समाचार
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रंगों में ढलते संगीत के सुर

शमीला
भारतीय मूल की कमलजीत ने विभिन्न रागों के आधार पर पेंटिंग बनाई हैं
ब्रिटेन के शहर शेफ़ील्ड में इनदिनों पेंटिंग की एक विशेष प्रदर्शनी लगी हुई है. ये विशेष इस मायने में है कि दोनों प्रदर्शनियों में कलाकारों ने संगीत को अपने-अपने हिसाब से रंगों में उतारने की कोशिश की है.

शास्त्रीय संगीत से जुड़ी कलाकार कमलजीत ने अपने चित्र क्लासिक हिंदी फ़िल्म बैजू बाँवरा के संगीत से प्रेरणा लेकर बनाए हैं. जबकि पाकिस्तानी मूल की शमीला हुसैन ने मिर्ज़ा ग़ालिब की ग़ज़लों पर रचे हिंदी गानों से प्रभावित होकर अपनी पेंटिंग की प्रदर्शनी लगाई है.

शेफ़ील्ड में रहने वाली भारतीय मूल की कमलजीत की दुनिया रंगों और संगीत के इर्द-गिर्द घूमती है. वे पिछले पंद्रह वर्षों से संतूर बजा रही हैं और पंडित शिव कुमार की शागीर्द हैं.

लेकिन उनका हुनर संगीत तक ही सीमित नहीं हैं. रंगों की दुनिया से भी कमलजीत का गहरा वास्ता है और वे बाकायदा चित्रकारी करती हैं.

 मैं भारतीय शास्त्रीय संगीत से जुड़ी रही हूँ. नौशाद जी ने बैजू बाँवरा में इतना सुंदर संगीत दिया था. मैने सोचा कि ये संगीत मेरे काम से जुड़ा हुआ है. मैं संतूर बजाती हूँ और चित्रकारी भी करती हूँ, मुझे लगा कि क्यूँ न मैं इन दोनों चीज़ों को एक साथ लाऊं. इसी ख़्याल ने इन पेंटिंग की शक्ल ली
कमलजीत

जब उनके पास भारतीय सिनेमा पर आधारित कुछ पेटिंग बनाने का प्रस्ताव आया तो उनके अंदर का चित्रकार और संगीतज्ञ मानो एक हो गए और उन्होंने बैजू बाँवरा के संगीत को कैनवस पर उकेरते हुए कई पेंटिंग बना डाली.

कमलजीत कहती हैं, “ मैं भारतीय शास्त्रीय संगीत से जुड़ी रही हूँ. नौशाद जी ने बैजू बाँवरा में इतना सुंदर संगीत दिया था. मैने सोचा कि ये संगीत मेरे काम से जुड़ा हुआ है. मैं संतूर बजाती हूँ और चित्रकारी भी करती हूँ, मुझे लगा कि क्यूँ न मैं इन दोनों चीज़ों को एक साथ लाऊं. इसी ख़्याल ने इन पेंटिंग्स की शक्ल ली.”

कमलजीत मानती हैं कि रंगों और संगीत का हमारी भावनाओं पर गहरा असर होता है. वे कहती हैं, “मैने फ़िल्म का संगीत सुना, राग सुने और उनसे जुड़ी भावनाओं की परिकल्पना कर उनमें रंग भरने की कोशिश की है.”

ग़ालिब और चित्रकारी

अगर कमलजीत ने अपनी प्रेरणा भारतीय शास्त्रीय संगीत और हिंदी फ़िल्मों से ली है तो कलाकार शमीला हुसैन मिर्ज़ा ग़ालिब पर फ़िदा हैं और बॉलीवुड की भी बड़ी प्रशंसक है.

शमीला कहती हैं, “ मेरे पास बॉलीवुड से जुड़ा कुछ काम करने का प्रस्ताव आया था. मैने सोचा कि बॉलीवुड के साथ चित्रकारी को कैसे जोड़ा जा सकता है है.फिर मुझे लगा कि एक रिश्ता तो पहले से ही मौजदू है. मैं जब चित्रकारी करती हूँ तो संगीत बहुत अहम होता है मेरे लिए. बॉलीवुड की भी फ़ैन हूँ मैं. मिर्ज़ा ग़ालिब की ग़ज़लें मुझे बहुत पसंद हैं. मैने सोचा कि मिर्ज़ा ग़ालिब की ग़ज़लों पर काम करना अच्छा रहेगा.”

शमीला के माता-पिता पाकिस्तान से आकर ब्रिटेन में आकर बसे हैं.

शमीला का कहना है, “मैने मिर्ज़ा ग़ालिब की कुछ ग़ज़लें पढ़ीं- जैसे 'आह कि मेरी जान को क़रार नहीं हैं', मुझे लगा कि मैं सिर्फ़ इस ग़ज़ल के शेर पर एक पेंटिंग बनाऊँ. मैं केवल इसे दोहराती थी और फिर इसी पर पेंटिंग बनाई. पेंटिग में कुछ ग़ज़लें इस्तेमाल भी की हैं- ऊर्दू कैलिग्राफ़ी स्टाइल में.”

‘लोगों का जुड़ाव ही उपलब्धि’

इस प्रदर्शनी में लगे कई चित्र कुछ हद तक अमूर्त या ऐबस्ट्रेक्ट पेंटिंग जैसे हैं. तो क्या भारतीय शास्त्रीय संगीत या ग़ालिब की ग़ज़लों जैसे विषयों पर की गई चित्रकारी प्रर्दशनी देखने आए सभी लोगों की समझ में आएगी?

इस पर कमलजीत कहती हैं कि भारतीय सिनेमा या बॉलीवुड से यहाँ के लोग वाकिफ़ हैं और उससे जुड़ी किसी भी चीज़ में लोगों की दिलचस्पी रहती है.

वही शमीला का कहना है, “लोगों को जानकर अच्छा लगता है कि ये पेंटिंग मिर्ज़ा ग़ालिब की भावनाओं पर आधारित है. और अगर उन्हें मिर्ज़ा ग़ालिब के बारे में न भी पता हो तो भी क्या. मेरी चित्रकारी में कोई एक ख़ास वस्तु नहीं होती. सब कुछ तो केवल रंगों के ज़रिए दर्शाया गया है. ऐबस्ट्रेक्ट पेंटिंग होती है, पेंटिंग देखकर लोगों के मन में शायद ख़ुद की एक कहानी बन जाती है, मुझे अच्छा लगता है जब देखने वाले मेरी पेंटिंग से जुड़ाव महसूस करते हैं. यही मेरी उपलब्धि है.”

शेफ़ील्ड में लगी ये ख़ास प्रदर्शनी 29 जून तक चलेगी. प्रदर्शनी का आयोजन यॉर्कशायर इलाक़े में काम करने वाली मानसमित्रा संस्था ने किया है जो पारंपरिक एशियाई संगीत और नृत्य को बढ़ावा देने के लिए बनाई गई है.

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