|
सड़कों पर रिक्शे से कैनवस पर कूची तक | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भला रिक्शे के हैंडल व कूची में क्या समानता है? आपको यह सवाल कुछ अजीब और बेतुका लग सकता है लेकिन पश्चिम बंगाल के हावड़ा ज़िले के बाली के विश्वनाथ नाग के लिए यह कतई अजीब नहीं है. लगे भी क्यों? वो आज भले ही इस इलाके में कला शिक्षक के तौर पर मशहूर हों और लगभग 500 बच्चों को चित्र बनाना सिखाते हों पर छह वर्ष पहले तक अपनी रोजी-रोटी चलाने के लिए वो रिक्शा खींचते थे. एक रिक्शा चालक से कला शिक्षक बनने तक का सफ़र उनकी लगन व निष्ठा की कहानी है. अपने पाँच भाई-बहनों में सबसे बड़े विश्वनाथ का संघर्ष तब शुरू हुआ जब उनकी पाँचवीं कक्षा की पढ़ाई के दौरान ही उनके पिता प्रिय कुमार की नौकरी चली गई. उसके बाद से ही विश्वनाथ रिक्शा चलाने लगे. लगन हाँ मगर, ऐसे प्रतिकूल हालातों में भी विश्वनाथ का किताबों और कूची से लगाव ख़त्म नहीं हुआ. विश्वनाथ रोज़ सुबह स्कूल जाते थे, दिन के बाक़ी समय रिक्शा चलाते थे और रात को चित्र बनाते थे. विश्वनाथ के पूर्व शिक्षक बासुदेव तलापात्र उनके बारे में बताते हैं, "विश्वनाथ बहुत मेहनती था. आर्थिक दिक्कतों के चलते उसने सातवीं के बाद पढ़ाई छोड़ दी लेकिन पेंटिंग के प्रति उसका लगाव बना रहा." विश्वनाथ कहते हैं कि कुछ स्थानीय कलाकारों ने उनको मुफ्त में पेंटिंग सिखाई. ऐसे ही एक पेंटर प्रकाश कर्मकार बताते हैं, "विश्वनाथ की लगन के कारण उसे मना करना मुश्किल था. वह घंटों मुझे चित्रकारी करते देखता रहता था." विश्वनाथ कहते हैं, "मेरे साथी रिक्शाचालक शाम ढलते ही शराब की बोतल खोलकर बैठ जाते थे लेकिन मैं सड़क पर लगे बिजली के खंभों के नीचे बैठ कर चित्र बनाता था. कई बार वे लोग मुझसे भी पीने को कहते थे लेकिन मैं जानता था कि एक बार यह लत लग गई तो चित्र नहीं बना सकूँगा." प्रयास नाग ने वर्ष 1988 में अपना एक कला विद्यालय खोला और उसे नाम दिया-'तुलीर संसार' यानी कूची का संसार. हालांकि इसके बाद भी उनका रिक्शा चलाना जारी रहा. विश्वनाथ अब इलाके में चार-पाँच स्कूलों में चित्र बनाना सिखाते हैं. उनके विद्यार्थियों की तादाद भी 500 तक पहुंच गई है. उन्होंने 'सहज आंका' यानी आसान चित्रकारी शीर्षक से एक पुस्तक भी लिखी है. इसमें बांग्ला, अंग्रेज़ी व हिंदी में चित्रकारी के गुर बताए गए हैं. विश्वनाथ को कई सम्मान भी मिल चुके हैं लेकिन वो अपने पुराने दिनों को भूले नहीं हैं. विश्वनाथ कहते हैं, "रिक्शावालों के बच्चों के लिए एक स्कूल खोलने की योजना है जहाँ मुफ्त में चित्रकारी सिखाई जा सके. मैं स्थानीय लोगों से चंदा लेकर इन बच्चों को कूची और रंग भी मुहैया कराउंगा." फिलहाल कूची का यह जादूगर अपनी दूसरी पुस्तक की तैयारियों में जुटा है. | इससे जुड़ी ख़बरें हुसैन ने जनता से माफ़ी माँगी08 फ़रवरी, 2006 | मनोरंजन हुसैन की पेंटिंग को लेकर फिर विवाद07 फ़रवरी, 2006 | मनोरंजन कूची से कपड़े उतारने की कला08 अक्तूबर, 2004 | मनोरंजन 'मेरे चित्रों में मौत की छाया उभर आती है'16 जनवरी, 2006 | मनोरंजन मिकी माउस बनाने वाले चित्रकार की मौत06 फ़रवरी, 2004 | मनोरंजन | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
| ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||