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क्योंकि स्मृति ही कभी तुलसी थी... | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
हिंदी टेलीविज़न के सबसे लोकप्रिय धारावाहिकों में से एक क्योंकि सास भी कभी बहू थी के दर्शक अब गुरुवार से स्मृति ईरानी को तुलसी के रूप में नहीं देख पाएँगे. स्मृति ने सात साल इस भूमिका को जिया है. एक नवयुवती से पत्नी, माँ, सास और अब दादी के रूप में उन्होंने अपने चरित्र के साथ पूरा न्याय किया. स्मृति मल्होत्रा से स्मृति ईरानी तक की यात्रा में हालाँकि उन्होंने अनेक भूमिकाएँ निभाईं लेकिन तुलसी का किरदार दर्शकों के मन में उतर गया. वह बा या तुलसी का रिश्ता हो या मिहिर और तुलसी के संबंधों का उतार-चढ़ाव, स्मृति ने इस यात्रा को बख़ूबी जिया. कुछ समय पहले उन्होंने अपने प्रोडक्शन हाउज़ की शुरुआत की और उनके नए धारावाहिक विरुद्ध को भी दर्शकों ने हाथोंहाथ लिया. काफ़ी समय से इस तरह की ख़बरें आ रही थीं कि स्मृति के इस नए प्रयास से उनके और बालाजी टेलीफ़िल्म्स की एकता कपूर के बीच तनाव पैदा हो गया है. ख़ैर, वजह जो रही हो, स्मृति अब तुलसी के रूप में नज़र नहीं आएँगी. उनकी ख़ाली जगह को भरने के लिए कई नाम सामने आए जिनमें पद्मिनी कोल्हापुरे, पूनम ढिल्लों, जूही चावला और गौतमी गाडगिल के नाम शामिल थे. अब सुना जा रहा है कि गौतमी के नाम पर सहमति हो गई है और अब क्योंकि सास भी कभी बहू थी कि नई तुलसी गौतमी ही होंगी. दर्शकों ने इसी सीरियल में मिहिर की भूमिका में अमर उपाध्याय के बाद रौनित रॉय को भी स्वीकार कर लिया था और बालाजी टेलीफ़िल्म्स के अधिकारियों का मानना है कि इस बार भी ऐसा ही होगा. स्मृति ने कुछ समय पहले राजनीति में क़दम रखा था और वह भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर लोकसभा का चुनाव भी लड़ चुकी हैं. हालाँकि उन्हें हार का मुँह देखना पड़ा था. अब क्योंकि...से नाता तोड़ने के बाद हो सकता है स्मृति ईरानी को अपने कुछ अधूरे कामों को अंजाम देने के लिए ज़्यादा समय मिल सके. |
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