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जयकृष्ण राय तुषार की ग़ज़लें | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
एक वो अक्सर फूल परियों की तरह सजकर निकलती है
कँटीली झाड़ियाँ उग आती हैं लोगों के चेहरों पर बदलकर शक्ल हर सूरत उसे रावण ही मिलते हैं सफ़र में तुम उसे ख़ामोश गुड़िया मत समझ लेना ज़माने भर से इज़्ज़त की उसे उम्मीद क्या होगी जो बचपन में घरों की ज़द हिरण सी लाँघ आती थी ख़ुद जिसकी कोख़ में ईश्वर भी पलकर जन्म लेता है छुपा लेती है सब आँचल में रंज़ो-ग़म के अफ़साने ****** दो कहीं भी सुब्ह करो या कहीं पे शाम करो हमारे दौर के सूरज में रोशनी ही नहीं चमन में फूल खिला दे समय पे जल बरसे गवाह बिकते हैं डरते हैं क्या सज़ा होगी ****** तीन समस्याओं का रोना है क्यों उनका हल नहीं होता
समय के पंक में उलझी है फिर गंगा भगीरथ की सहन में बोन्साई हैं, न साया है, न ख़ुश्बू है नशे में तुम जिसे संगीत का सरगम समझते हो प्रतीक्षा में तुम्हारी हम समय पर आके तो देखो सफ़र में हम भी तनहा हैं सफ़र में तुम भी तनहा हो जिसे तुम देखकर ख़ुश हो मरुस्थल की फ़िज़ाओं में ************************ |
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