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लिज़-अरुण की शादी में लोक संगीत | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
हॉलीवुड अदाकारा लिज़ हर्ली और अरुण नायर की शादी पर जोधपुर के ऐतिहासिक मेहरानगढ़ किले में मरुस्थल के मांगणियार लोक गायक संगीत की महफ़िल सजाएंगे. लिज़ हर्ली और अरुण नायर की शुक्रवार को विवाह की योजना है. इसमें पारंपरिक आयोजनों पर विवाह गीतों की गूँज सुनाई देगी और गीतों के बोल में लिज़ और अरुण के प्रणय संबंधों का उल्लेख किया जाएगा. मांगणियार कलाकार समूह का नेतृत्व कर रहे ग़ाज़ी ख़ान कहते हैं, " इसमें मारवाड़ के प्रसिद्ध प्रेम गीतों का बानगी पेश की जाएगी. साथ ही मरुस्थल में प्रियतम के स्वागत में गाया जाने वाला केसरिया बालम भी प्रस्तुत किया जाएगा. " पचास सदस्यों के इस दल ने कोई 10 दिन तक इन विवाह गीतों का रियाज़ किया है. ग़ाज़ी ख़ान वो कलाकार हैं जो 90 बार विदेशों में भी अपनी गायकी का प्रदर्शन कर चुके हैं. ग़ाज़ी ख़ान कहते हैं, " विवाह के पारंपरिक गीतों में कुछ परिवर्तन कर लिज़ और अरुण को नायक-नायिका के बतौर शामिल किया गया है. " सौंदर्य बखान इन कलाकारों ने लिज़ को कभी देखा भी नहीं है. लेकिन गीतों में उनके रूप सौंदर्य का बखान किया है. साथ ही उनके हमसफ़र अरुण नायर के व्यक्तित्व का भी बखान किया गया है.
इन गीतों में विवाह की बेला में बहिन बेटियों के लिए आशीर्वचनों का ज़िक्र है जिनमें गायक कहता है, ' लिज़ शील संकोच से युक्त हैं, लाड़-प्यार में पली-बढ़ी हैं, ननिहाल भी जाएगी, लोग प्यार डालेंगे, इसका ख़्याल रखना.' इन कलाकारों के मीठे बोल में अरुण नायर को हज़ारां गुल फूल के रूप में पेश किया गया है. लोक कलाकार मेहरानगढ़ किले की महफ़िल में जब गीतों को स्वर देंगे तो उनके हाथों में हारमोनियम, कमायचा, भपंग, अलग़ोज़ा, खड़ताल और मोरचंग जैसे वाद्य यंत्र भी होंगे. दरअसल इन गीतों की रचना रियासत काल में राजपूत नायक-नायिकाओं की प्रशस्ति में की गई थी. वक्त बदला तो पात्रों में थोड़ा परिवर्तन किया गया है मगर सौंदर्य वही है. |
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