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ज्ञान प्रकाश विवेक की गज़लें... | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
ज्ञान प्रकाश विवेक की ग़ज़लें तमाम घर को बयाबाँ बना के रखता था बुरे दिनों के लिए तुमने गुल्लक्कें भर लीं, वो तितलियों को सिखाता था व्याकरण यारों- न जाने कौन चला आए वक़्त का मारा, हमेशा बात वो करता था घर बनाने की मेरे फिसलने का कारण भी है यही शायद, ***********************
बुरे दिनों का आना-जाना लगा रहेगा मैं कहता हूँ मेरा कुछ अपराध नहीं है लाख नए कपड़े पहनूँ लेकिन ये सच है, मेरे हाथ परीशां होकर पूछ रहे हैं- महानगर ने इतना तन्हा कर डाला है युद्ध हुआ तो खाने वाले नहीं बचेंगे- ***********************
तेरा शो-केस भी क्या खूब ठसक रखता था आपने गाड़ दिया मील के पत्थर-सा मुझे- वो शिकायत नहीं करता था मदारी से मगर- मुझको इक बार तो पत्थर पे गिराया होता- ज़िंदगी! हमने तेरे दर्द को ऐसे रक्खा- मर गया आज वो मेरे ही किसी पत्थर से *********************** |
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