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'रूहानी काम से कोई नहीं थकता' | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
पिछली बार मैंने कहा था कि मैं अपने काम से सदाबहार कहलाता हूँ और सदाबहार होने का मतलब काम करते रहने की इच्छा है. मैं लगातार काम करता रहता हूँ. बिना थके. दरअसल मैं थकता ही नहीं हूँ. जब फ़िल्म पर काम चल रहा होता है तो मैं बिना रुके शूटिंग करता रहता हूँ जब तक सब कुछ मेरी मर्ज़ी के अनुसार और परफैक्ट नहीं हो जाता. कई बार तो मुझे शूटिंग इसलिए रोकनी पड़ जाती है क्योंकि मेरी टीम के लोग थक जाते हैं. लेकिन जब आप किसी काम को अचानक रोक देते हैं तो एक सिलसिला रुक जाता है, रिदम टूट जाता है. जिसे आप मूड कहते हैं वह बदल जाता है. अगले दिन या अगली बार बहुत सारा समय उस मूड को वापस पाने में लग जाता है. जब मैंने 'हरे रामा-हरे कृष्णा' की स्क्रिप्ट लिखी तो मैं नेपाल में था. मैं लगातार 20 दिनों तक काम करता रहा. उस समय ऐसा लगता था कि सब कुछ मेरे अनुसार ढल गया है और मैं मगन होकर काम करता रहा. तो मैं डूब कर काम करता हूँ और चाहता हूँ कि सभी लोग इसी तरह डूबकर काम करें. जो करें उसमें बिल्कुल रम जाएँ. जब आप अच्छा काम करते हैं या तो पता ही नहीं चलता कि समय किस तरह बीत गया और आपके भीतर की सकारात्मक ऊर्जा बढ़ती ही जाती है. तय है कि अच्छा और रूहानी काम करके कोई नहीं थकता. न देवानंद थकता है और न कोई और थक सकता है. | इससे जुड़ी ख़बरें 'अपने काम से सदाबहार कहलाता हूँ'26 अक्तूबर, 2006 | पत्रिका कोशिश तो सबको करनी चाहिए19 अक्तूबर, 2006 | पत्रिका बड़ा आदमी आसमान से नहीं टपकता12 अक्तूबर, 2006 | पत्रिका दुनिया से आगे चलना06 अक्तूबर, 2006 | पत्रिका सृजनात्मकता एक तरह की बेचैनी होती है29 सितंबर, 2006 | पत्रिका 'विकल्प की कोई कमी नहीं'22 सितंबर, 2006 | पत्रिका ठहरा हुआ नहीं दिखना चाहिए14 सितंबर, 2006 | पत्रिका यह भी एक चुनौती है08 सितंबर, 2006 | पत्रिका | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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