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गुरुवार, 19 अक्तूबर, 2006 को 11:24 GMT तक के समाचार
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कोशिश तो सबको करनी चाहिए

कहने को मैं कह सकता हूँ कि सफलता-असफलता कुछ नहीं होती. लेकिन मैं जानता हूँ कि सफलता-असफलता दुनियावी लिहाज़ से बहुत मायने रखती है.

सफल आदमी को दुनिया मानती है और असफल आदमी को वह स्वीकार नहीं करती.

यह ठीक है कि कोशिश करते रहने से आख़िर सफलता मिल ही जाती है और असफलताओं से निराश नहीं होना चाहिए. लेकिन यह भी कम बड़ा सच नहीं है कि कई बार सफलता इतनी देर से मिलती है कि आदमी टूट जाता है. हताश हो जाता है और अपने आपको तबाह कर लेता है.

ठीक उसी तरह यह भी सच है कि कई बार जीवन में सफलता इतनी जल्दी मिल जाती है कि उसे संभालना मुश्किल होता है.

 मैंने पीछे मुड़कर नहीं देखा क्योंकि मेरे कंधे पर सफलता थी और पीछे मुड़कर देखने की ज़रुरत ही नहीं थी. आज मुझे भी अच्छा लगता है कि मैं पीछे मुड़कर नहीं देखता

मैं आज जो कुछ भी कर पा रहा हूँ, यह कहने में हिचक नहीं कि उसके पीछे मुझे मिली सफलता है. अगर मुझे अपने शुरुआती दिनों में इतनी सफलता न मिली होती तो नहीं मालूम कि मैं इतनी ही शिद्दत से और इतनी मुद्दत तक काम कर भी पाता.

आज लोग कहते हैं कि देवानंद ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा. सच है कि मैंने पीछे मुड़कर नहीं देखा क्योंकि मेरे कंधे पर सफलता थी और पीछे मुड़कर देखने की ज़रुरत ही नहीं थी. आज मुझे भी अच्छा लगता है कि मैं पीछे मुड़कर नहीं देखता.

हालांकि मैंने हाल ही में एक क्षण के लिए रुककर अपने जीवन के पन्ने पलटकर देखे हैं क्योंकि मुझे अपनी जीवनी लिखनी थी. पर वह पीछे मुड़कर देखने जैसा नहीं था.

लेकिन एक बात तय है कि मैं जो कुछ करता हूँ पूरी लगन के साथ करता हूँ, उसमें डूबकर करता हूँ. उस क्षण के अलावा, उस एक काम के अलावा क्या हो रहा है, मुझे पता ही नहीं चलता.

लेकिन इस तरह डूब जाने के बाद मैं अपनी ज़िम्मेदारी को भुला नहीं देता. मैं दिन भर के काम का विश्लेषण करता हूँ कि क्या किया और क्या नहीं कर पाया. तब जाकर मैं सोता हूँ.

मैं याद रखता हूँ कि मैं अपने आपमें संपूर्ण नहीं हूँ, परफ़ेक्ट नहीं हूँ. वह कोई भी नहीं हो सकता. लेकिन संपूर्ण होने की कोशिश की जानी चाहिए और ईमानदारी से की जाने चाहिए.

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